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हादसे में गंवा दिए हाथ और पैर, दसवीं में हासिल किए 89% अंक

शिवम सोलंकी दिव्यांग हैं और तीन साल पहले एक हादसे में अपने दोनों हाथ और एक पैर गंवा चुके हैं। शिवम ने ये सफलता अपने कटे हाथ पर मोजा पहनकर उसमें पेन फंसाकर कॉपी लिखने के बाद हासिल की है। शिवम ने अपनी कॉपी लिखने के लिए किसी से भी मदद लेने से इंकार कर दिया।

बेटे शिवम को सफलता की बधाई देते पिता मुकेश सोलंकी। फोटो- ANI

गुजरात के वड़ोदरा जिले के रहने वाले शिवम सोलंकी पूरी दुनिया के लिए नजीर हैं। शिवम ने गुजरात माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की एसएससी (10वीं) की परीक्षा 89% अंकों के साथ उत्तीर्ण की है। जबकि उनका परसेंटाइल 98.53 रहा है। शिवम सोलंकी दिव्यांग हैं और तीन साल पहले एक हादसे में अपने दोनों हाथ और एक पैर गंवा चुके हैं। शिवम ने ये सफलता अपने कटे हाथ पर मोजा पहनकर उसमें पेन फंसाकर कॉपी लिखने के बाद हासिल की है। शिवम सोलंकी तीन साल पहले बिजली का करंट लगने से अपने दोनों हाथ और एक पैर गंवा चुके हैं। शिवम ने अपनी कॉपी लिखने के लिए किसी से भी मदद लेने से इंकार कर दिया। शिवम इस तरीके से कॉपी लिखने के लिए पिछले तीन सालों से तैयारी कर रहे थे। शिवम ने बताया,”ये मेरी मां थी, जिसने मुझे इस तरीके से लिखने का आइडिया दिया था। हादसे के वक्त मैं ग्यारह साल का था। जब हाईटेंशन लाइन में उलझी पतंग को निकालने की कोशिश में मुझे करंट का झटका लगा और डॉक्टर ने मेरे दोनों हाथ और एक पैर काट दिया।”

शिवम अब 16 साल के हो चुके हैं। शिवम की मां हंसाबेन और पिता मुकेश सोलंकी उसकी सफलता से बेहद खुश हैं। ये दोनों ही वड़ोदरा म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन में बतौर ‘सफाई कामदार’ काम करते हैं। शिवम वड़ोदरा के ही जीवन साधना स्कूल का छात्र है। शिवम बड़े होकर डॉक्टर बनना चाहता है। वड़ोदरा के बरनपुरा इलाके के रहने वाले शिवम का कहना है,”10वीं कक्षा के बाद अब मैं साइंस स्ट्रीम से पढूंगा और कक्षा 12 के बाद डॉक्टर बनने की तैयारी करूंगा।”

शिवम ने अपने क्षतिग्रस्त हाथ पर मोजा पहनकर और उसमें बॉल पेन फंसाकर परीक्षा में कापियां लिखी थीं। फोटो- ANI

शिवम की मां हंसाबेन ने बताया,”हादसे के बाद मैंने उसे साहस बंधाया। मैंने उसे उसकी कटी हुई बांह पर मोजा पहनकर उसमें बॉलपेन डालकर लिखने के लिए कहा। शिवम ने इस तरीके से लिखने के लिए करीब तीन साल तक रोज पांच से छह घंटे तक मेहनत की। उसने कभी भी लिखने के लिए किसी की मदद नहीं मांगी। उसने अपनी परीक्षा में भी लेखक का विकल्प मौजूद होने के बावजूद किसी की भी मदद नहीं ली थी।

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