Gujarat Government's 'Vibrant Summit' to be held next month, 100 Trees cut down To Death - गुजरात: अगले साल होने वाली वाइब्रेट समिट के लिए काट डाले गए 100 से ज्‍यादा पेड़ - Jansatta
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गुजरात: अगले साल होने वाली वाइब्रेट समिट के लिए काट डाले गए 100 से ज्‍यादा पेड़

दो साल में हरित क्षेत्र में तेजी से गिरावट हुई कि 2011 में 152 पेड़ प्रति हेक्‍टेयर से गिरकर यह 2013 में सिर्फ 63 प्रति हेक्‍टेयर हो गया।

वाइब्रेंट गुजरात ग्लोबल समिट का लोगो।

गुजरात के गांधीनगर में वैश्चिक निवेशकों को आकर्षित करने के लिए ‘वाइब्रेंट समिट’ जनवरी 2017 में होनी है। मेगा इवेंट के दौरान, शहर को खूबसूरत दिखाने के लिए सड़कें चौड़ी की जा रही हैं और राजधानी का नक्‍शा बदला जा रहा है। हालांकि इस पूरी कवायद में हरे-भरे पेड़ाें की भेंट चढ़ा दी गई। इंडियाटाइम्‍स की रिपोर्ट के अनुसार, सर्गासन से महात्‍मा मंदिर तक कम से कम 100 पेड़ काट दिए गए हैं, इसी एरिया में समिट होनी है। एक समय इन्‍हीं पेड़ों की वजह से गांधीनगर को देश की सबसे हरी-भरी राजधानी होने का गौरव मिला था। वन विभाग के अधिकारी ने भी पहचान गुप्‍त रखने की शर्त पर बताया कि इतनी संख्‍या में पेड़ काटे गए हैं। शहरीकरण के चलते तेजी से पेड़ काटे जा रहे हैं और हरित एरिया कम होता जा रहा है। कंक्रीट बिल्डिंगें ज्‍यादा गर्मी पैदा करती है, इसवजह से तापमान बढ़ गया है। गांधीनगर वसाहत मंडल के अध्‍यक्ष अरुण बूच ने टाइम्‍स से कहा, ”सड़क चौड़ी करने के लिए कम से कम 100 पेड़ काट दिए गए हैं। रेलवे स्‍टेशन को विकसित करने के लिए और पड़े काटे जाएंगे।”

पर्यावरणशास्‍त्री महेश पांड्या ने कहा कि ‘विकास ठीक है, ऐसा पर्यावरण की कीमत पर नहीं होना चाहिए। पिछले कुछ सालों से लगातार कम होता हरित क्षेत्र ही तापमान के बढ़ोत्‍तरी की वजह है। पिछले साल प्रधानमंत्री के दौरे के समय, सारी सुरक्षा जांच की गई थी और ताजी सड़कें बनाई गई थीं जो इतनी चौड़ी थीं कि भीड़ संभाल लेतीं, फिर अब उन्‍हें क्‍यों चौड़ा किया जा रहा है।”

2011 में राज्‍य सरकार द्वारा पेड़ों की जनगणना कराई गई जिसे 2012 में प्रकाशित किया गया। इसके अनुसार, 5,700 हेक्‍टेयर में से 53.9 प्रतिशत हिस्‍सा पेड़ों से घिरा था। यानी शहर में हर 100 लोगों पर 416 पेड़ थे, जो कि देश के किसी अन्‍य शहर से ज्‍यादा था। लेकिन दो साल में हरित क्षेत्र में तेजी से गिरावट हुई कि 2011 में 152 पेड़ प्रति हेक्‍टेयर से गिरकर यह 2013 में सिर्फ 63 प्रति हेक्‍टेयर हो गया।

एडिशनल प्रिंसिपल चीफ कंजर्वेटर ऑफ फॉरेस्‍ट फॉर सोशल फॉरेस्‍ट्री, जगदीश प्रसाद कहते हैं, ‘शहरी क्षेत्रों के लिए आखिरी जनगणना 2011 में हुई थीं और हर पांच साल में यह होती है। लेकिन ऐसा बिना कॉर्पोरशन के समर्थन नहीं हो सकता। हम अधिकारियों से संपर्क कर रहे हैं। हम सैटेलाइट मैपिंग की भी मदद ले रहे हैं।’

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