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गुजरात चुनाव: इस बार हिंदू-मुस्लिम की लड़ाई नहीं, कांग्रेस भी नहीं दिखना चाहती मुस्लिमों का हमदर्द

अहमदाबाद से सैयद खालिक अहमद की रिपोर्ट: कांग्रेस की कोशिश है कि पटेल, दलित, आदिवासी और ओबीसी समुदाय के साथ सियासी समीकरण साधकर चुनावी वैतरणी पार करे।

Author November 28, 2017 2:17 PM
अहमदाबाद में मुस्लिम महिला मतदाताएं अपनी बारी का इंतजार करते हुए। (फोटो- जावेद रजा)

सैयद खालिक अहमद

गुजरात विधान सभा चुनाव में दोनों चरणों के लिए नामांकन का काम पूरा हो चुका है। सभी राजनीतिक दल पूरे जोश-ओ-खरोश के साथ मतदाताओं को रिझाने में लगे हैं। सामाजिक ध्रुवीकरण की कोशिशें भी जारी हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी ताबड़तोड़ रैलियां कर रहे हैं। बीजेपी जहां हिन्दू वोटों को लामबंद करने के पुराने फार्मूले पर अडिग है, वहीं कांग्रेस भी इस बार कई समुदायों को साधने में जुटी है। कांग्रेस की कोशिश है कि इस बार बीजेपी से छिटके पटेल समुदाय के अलावा दलित, आदिवासी और ओबीसी समुदाय के साथ सियासी समीकरण साधकर चुनावी वैतरणी पार करे। मगर इस कोशिश में कांग्रेस ने इस बार अपने परंपरागत मुस्लिम वोटरों के लिए कोई स्पष्ट राजनीतिक रणनीति नहीं बनाई है। कांग्रेसी मुस्लिम नेताओं का दावा है कि पार्टी को अपने इस परंपरागत वोट बैंक पर भरोसा है। लिहाजा, चुनावी रणनीति के तहत कहीं भी मुस्लिमों का जिक्र करने से बच रही है ताकि बीजेपी को इसका फायदा न मिल सके। नेताओं का कहना है कि मुस्लिमों की बात आते ही बीजेपी हिन्दू मतदाताओं का ध्रुवीकरण कर सकती है।

बता दें कि गुजरात के चुनावों में ऐसा पहली बार हो रहा है जब सियासी दल धार्मिक गोलबंदी की जगह जातीय गोलबंदी में जुटे हैं। पाटीदार समुदाय के नेता हार्दिक पटेल कांग्रेस को समर्थन देने का एलान कर चुके हैं, जबकि ओबीसी नेता अल्पेश ठाकोर और दलित कार्यकर्ता-नेता जिग्नेश मेवानी पहले ही कांग्रेस का हाथ थाम चुके हैं। इनके अलावा आदिवासी नेता छोटू वासावा के साथ भी कांग्रेस सीटों का बंटवारा कर चुकी है। इनके अतिरिक्त कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में भी इन समुदायों को लुभाने के लिए कई घोषणाएं की हैं। हालांकि, कांग्रेस ने घोषणा पत्र में मुस्लिम तुष्टिकरण से बचने के लिए उनके लिए किसी तरह की घोषणा नहीं की है।

दरअसल, 22 सालों से गुजरात की सत्ता से दूर रही कांग्रेस नहीं चाहती है कि मुस्लिमों के नाम पर हिन्दू वोटर्स पार्टी से बिदके या बीजेपी उन्हें भड़काए। इसलिए पार्टी के रणनीतिकारों ने गुजरात फतह की योजना बनाते समय इन बातों पर काफी मंथन किया और अंतत: पार्टी के मुस्लिम नेताओं को यह समझाने में कामयाब रही कि मुस्लिम समुदाय के प्रति पार्टी का नजरिया जस का तस रहेगा मगर वह चुनावी रणनीति का हिस्सा नहीं होगा। यानी मुस्लिम इस चुनाव में पर्दे के पीछे रहेंगे।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता बदरुद्दीन शेख ने इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में कहा, “हमारी पहली प्राथमिकता है कि हम यह चुनाव जीतें और पार्टी को फिर से गुजरात की सत्ता में वापस लाएं न कि यह सोचना कि मुसलमान पार्टी में पर्दे के पीछे क्यों चले गए?” पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ बैठकों में बदरुद्दीन साफ-साफ तौर पर कहते नजर आ रहे हैं कि पार्टी के लिए पहले जीत जरूरी है। अन्य चीजें बाद में देखी जाएंगी। हालांकि, मुस्लिम नेता इस बात को लेकर आश्वस्त हैं कि उन्हें मुस्लिम वोटरों की जरूरत है और वो कांग्रेस के साथ ही रहेंगे।

बता दें कि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी पिछले दो महीनों से जब-जब गुजरात दौरे पर आ रहे हैं वो अक्सर किसी न किसी मंदिर में जाकर पूजा-अर्चना करते नजर आते हैं लेकिन उन्हें इस बार किसी खास मुस्लिम बहुल इलाके में चुनाव प्रचार करते हुए नहीं देखा जा सका है। हालांकि, गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रुपाणी ने अहमदाबाद के मुस्लिम बहुल इलाके जमालपुर-खादिया में भी रोड शो किया। पार्टी के मुस्लिम मोर्चा के नेता सूरत में भी मुस्लिम वोटरों को लुभाते नजर आए। यह अलग बात है कि बीजेपी ने किसी भी मुस्लिम चेहरे को चुनावी मैदान में नहीं उतारा है, जबकि कांग्रेस ने छह मुस्लिमों को उम्मीदवार बनाया है। गौर करने वाली बात है कि साल 2011 की जनगणना के मुताबिक गुजरात में मुस्लिम आबादी करीब 9.6 फीसदी है। बता दें कि गुजरात में 1980 में जहां 12 मुस्लिम विधायक होते थे, उसकी संख्या घटकर 2012 के विधानसभा चुनाव में 2 रह गई है।

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