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हाईकोर्ट ने गुजरात सरकार से पूछा- केवल हिंदू धर्मस्थलों को ही क्यों दिया पैसा?

बोर्ड की स्थान के करीब दो दशक के बाद अब इस लिस्ट में 358 मंदिरों को शामिल किया गया है। खास बात यह है कि लिस्ट में किसी गैर हिंदू धार्मिक स्थल को शामिल नहीं किया गया।

गुजरात हाई कोर्ट का भवन।

गुजरात हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा है कि आखिर क्यों ‘गुजरात पवित्र यात्राधाम विकास बोर्ड’ के जरिए हिंदू धार्मिक स्थलों के विकास के लिए ही पैसा दिया गया? हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस आरएस रेड्डी और जस्टिस वीएम पंचौली की बेंच ने सरकार के वकील से एक पीआईएल के जवाब यह सवाल पूछा है। दरअसल याचिकाकर्ता मुजाहिद नफीस ने बोर्ड के उस फैसले पर आपत्ति की जिसमें सिर्फ हिंदू तीर्थयात्रा स्थलों के विकास के लिए फंड आवंटित किया गया। याचिकाकर्ता के मुताबिक बोर्ड ने 358 हिंदु तीर्थस्थलों के लिए फंड आवंटित किया है जबकि इस्लाम, ईसाई, जैन, सिख, बौद्ध और यहूदी धार्मिक स्थलों को इससे बाहर रखा गया है। मामले में मुजाहिद नफीस के वकील ने तर्क दिय है कि बोर्ड ने सिर्फ एक धर्म के मानने वालों के लिए फंड आवंटित किया है और अन्य धर्मों की अनदेखी की गई है। ऐसा करना ना सिर्फ गैरकानूनी है बल्कि भारत के संविधान का उल्लंघन भी है।

याचिका में आगे तर्क दिया गया कि सरकार से धर्मनिरपेक्ष होने की उम्मीद है, ना की किसी विशेष समुदाय के धार्मिक स्थानों को बढ़ावा देने की। चूंकि टैक्स और अन्य तरीकों से जमा पूंजी सभी नागरिकों से इकट्ठा की जाती है। जिनका पैसा सिर्फ किसी विशेष धार्मिक स्थल के रखरखाव के लिए खर्च नहीं किया जाना चाहिए। याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि राज्य सरकार द्वारा केवल हिंदू धार्मिक स्थानों पर किए गए खर्च, बोर्ड के नियमों के खिलाफ है। इसका उद्देश्य धार्मिक स्थानों पर तीर्थयात्रियों के लिए आवास और अन्य सुविधाएं बनाना है। सिर्फ मंदिरों के रखरखाव के लिए नहीं है।

यहां बता दें कि गुजरात पवित्र यात्राधाम विकास बोर्ड का गठन साल 1995 में किया गया था। इसके गठन के दो साल बाद अंबाजी मंदिर, डाकोर मंदिर, गिरनार मंदिर, पालीताना मंदिर के अलावा सोमनाथ और द्वारका मंदिर को ‘पवित्र यात्राधाम’ घोषित कर दिया गया था। बोर्ड की स्थान के करीब दो दशक के बाद अब इस लिस्ट में 358 मंदिरों को शामिल किया गया है। खास बात यह है कि लिस्ट में किसी गैर हिंदू धार्मिक स्थल को शामिल नहीं किया गया। इसके सरकार के धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों पर सवाल खड़े हो गए हैं।

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