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गुजरात में स्ट्रीट चिल्ड्रन का हाल: 56% बच्चे नहीं जा पाते हैं स्कूल, शौच और हाथ धोने के बारे में भी जागरूक नहीं

एक सर्वे में पाया गया कि वडोदरा शहर में 61 फीसदी बच्चे अपने परिवार को आर्थिक रूप से समर्थन देने के लिए सड़क पर सामान बेचने (स्ट्रीट वेंडर) का काम करते हैं। जबकि 56.25 फीसदी बच्चे ऐसे हैं जो कभी स्कूल ही नहीं गए।

Author Published on: May 15, 2019 12:21 PM
प्रतीकात्मक चित्र फोटो सोर्स- इंडियन एक्सप्रेस

आधुनिक भारत में जहां एक ओर आज-कल के बच्चे खेलने के लिए ‘हल्क’ और ‘हथौड़ा मैन’ (थॉर) जैसे सुपर हीरोज का नाम लेते हैं तो वहीं गुजरात के वडोदरा में एक बड़े मॉल के बाहर कुछ बच्चे की-चेन, स्टिकर्स और ड्राइंग बुक्स बेंचकर अपने परिवार आर्थिक मदद देने के लिए दिन-भर मेहनत करते हैं। एमएस विश्वविद्यालय के एक छात्र द्वारा किए गए एक सर्वे में पाया गया कि वडोदरा शहर में 61 फीसदी बच्चे अपने परिवार को आर्थिक रूप से समर्थन देने के लिए सड़क पर सामान बेचने (स्ट्रीट वेंडर) का काम करते हैं। जबकि 56.25 फीसदी बच्चे ऐसे हैं जो कभी स्कूल ही नहीं गए। शेष बच्चे जो स्कूल गए हैं, उनमें से 53.33 फीसदी बच्चे कक्षा 4 और 6 के बीच में ही स्कूल जाना छोड़ दिया।

दरअसल, एमएस विश्वविद्यालय में फैमिली एंड डिपार्टमेंट ऑफ़ एक्सटेंशन एंड कम्युनिकेशन एट द फैकल्टी ऑफ़ फैमिली एंड कम्युनिटी साइंसेज में मास्टर्स की छात्रा निधि सरदार द्वारा किए गए अध्ययन में वडोदरा शहर के 12 अलग-अलग जगहों में 80 ऐसे बच्चों का सर्वेक्षण किया गया, जो परिवार की आर्थिक मदद करने के लिए सड़कों पर सामान बेचते हैं। इन 61 फीसदी स्ट्रीट वेंडर्स बच्चों में से 56.25 फीसदी ने कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा। सर्वे के मुताबिक ये बच्चे नंगे पैर और फ़टी टी-शर्ट और पैंट पहने हुए दिन में लगभग 12 घंटे (सुबह 8 बजे से रात 8 बजे तक) मॉल के बाहर सामान बेचते हुए देखे जा सकते हैं।

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मॉल के नजदीक सामान बेचते दो बच्चे रोहित और राहुल अपनी दादी के साथ पांडया पुल के पास सड़क के किनारे रहते हैं। उनकी दादी जीवनयापन के लिए भीख मांगने का काम करती हैं जबकि उसके दो बड़े भाई-बहन शहर के ही दूसरे मॉल के पास ऐसे ही सामान बेचते हैं। दोनों का कहना है कि वे एक सरकारी स्कूल में पढ़ते हैं और नियमित रूप से स्कूल जाते हैं। वे केवल गर्मी की छुट्टी के दौरान, अतिरिक्त पैसे कमाने के लिए यहां छोटे आइटम बेचते हैं। दोनों बच्चे दो वक्त का भोजन पास के एक मंदिर में करते है, जो कि फ्री में मिलता है। इसके अलावा सार्वजानिक शौचालय का प्रयोग करते हैं।

सर्वे के मुताबिक, कुल सैम्पल के 33 प्रतिशत लोग सड़क के किनारे खुले में शौच करते है, 15 प्रतिशत लोग पुलों के नीचे जबकि 28 प्रतिशत लोग सार्वजनिक शौचालयों का उपयोग करते हैं। इसके अलावा 8 प्रतिशत तालाबों और झीलों में जाते हैं। शौच के बाद अपने हाथों को धोने के लिए साबुन का उपयोग करने वाले सिर्फ 2.5 प्रतिशत हैं। जबकि 8.75 प्रतिशत लोग राख, 11.25 प्रतिशत मिट्टी जबकि करीब 41.25 प्रतिशत बच्चों का दावा है कि वे शौच के बाद अपने हाथ ही नहीं धोते हैं। इसके अलावा, 25 प्रतिशत बच्चे स्नान के लिए सार्वजनिक शौचालय का उपयोग करते हैं, जबकि 42 प्रतिशत का कहना है कि वे सड़क के किनारे लगे पानी के पंपों या फुहारों में स्नान करते हैं। 10 में से एक व्यक्ति तालाबों और झीलों में स्नान करने का दावा करता है, जबकि 1.25 प्रतिशत लोग शॉपिंग मॉल के अंदर इन सुविधाओं का उपयोग करते हैं। सर्वे में 16 प्रतिशत बच्चों का कहना है कि वे नियमित रूप से स्नान ही नहीं करते हैं।

श्रम और रोजगार मंत्रालय के तहत वडोदरा में राष्ट्रीय बाल श्रम परियोजना (एनसीएलपी) सोसायटी द्वारा आयोजित 2016 के सर्वेक्षण के अनुसार, 6 से 14 आयु वर्ग के कुल 1,611 बच्चे शहर की सड़कों पर रहते थे। हालांकि उनमें से कितने सड़क पर सामान बेचकर कमाई करने में शामिल थे, इसका कोई हिसाब नहीं था। संचार विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर और गाइड अवनी मनियार कहती हैं कि ऐसी बात जो इन बच्चों को ऐसी निविदा उम्र में सड़कों पर सामान बेचने के लिए प्रेरित करती है वह पैसा है। वे बच्चे पैसा की ताकत समझने लगते हैं। उनके माता-पिता भी अपने बच्चे की सराहना करते हैं और सोचते हैं कि स्कूल जाने के बजाय उनका बच्चा पैसे कमाता है या नहीं। बता दें कि वर्तमान में NCLP नौ प्रशिक्षण केंद्र चलाती है जहां ऐसे बच्चों को लाया जाता है और उन्हें बुनियादी शिक्षा और व्यावसायिक प्रशिक्षण के लिए चयनित किया जाता है। डॉ मनियार कहती हैं कि सिर्फ बच्चे ही नहीं, माता-पिता को भी बाल अधिकारों के बारे में शिक्षित किया जाना चाहिए।

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