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गुजरात: मिड डे मील योजना को लेकर CAG का खुलासा, लाभार्थियों के आंकड़ों में हेराफेरी सहित कई खामियां

गुजरात में मिड डे मील में शामिल एक प्रमुख ‘दूध संजीवनी योजना’ है, जिसे 2014-15 में शुरू किया गया था। इसे शुरू करने का उद्देश्य स्कूली बच्चों में कुपोषण की समस्या को दूर करना था।

mid-meal, CAG report, Gujarat, mid-day meal, Comptroller and Auditor General of India,वलसाड और वड़ोदारा के दौरे पर ऑडिट टीम ने पाया कि ‘‘भोजन गर्म नहीं था।’’

नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने केंद्र सरकार की मिड-डे-मील योजना के क्रियान्वयन में गुजरात में कई खामियां पाई हैं। इनमें लाभार्थी विद्यार्थियों के गलत आंकड़े से लेकर खाना बनाने के सामान का उपयोग नहीं किया जाना तक शामिल है। राज्य विधानसभा के सामने शुक्रवार को कैग ने अपनी रिपोर्ट रखी। कैग ने रिपोर्ट में इस बात का जिक्र किया है कि ‘विद्यार्थियों की संख्या केंद्र सरकार को बढ़ा-चढ़ा कर बताई गई।’ कैग ने इस बात का जिक्र इसलिए किया है कि चूंकि राज्य सरकार ने योजना के दायरे में लाये गये विद्यार्थियों की वास्तविक संख्या से कहीं अधिक संख्या दिखाई, ‘‘ऐसे में खाद्यान्न और उन्हें पकाने में आने वाली लागत वास्तविक जमीनी स्थिति की जरूरत से कहीं अधिक आवंटित की गई, इससे वहां अतिरिक्त खाद्यान्नों का भंडार बढ़ा।’’

गुजरात में एमडीएम योजना को चलाने पर 2017-18 के लिए अनुपालन ऑडिट रिपोर्ट विधानसभा के मॉनसून सत्र के आखिरी दिन सदन के सामने रखी गई। गुजरात में मध्याह्न भोजन में  शामिल एक प्रमुख ‘दूध संजीवनी योजना’ है, जिसे 2014-15 में शुरू किया गया था। इसे शुरू करने का उद्देश्य स्कूली बच्चों में कुपोषण की समस्या को दूर करना था। इस योजना के तहत स्कूली बच्चों को अमूल दूध दिया जाता है। बनासकांठा में कैग ने पाया कि योजना के तहत ‘‘ विद्यार्थियों की प्रतिदिन की औसत संख्या 2016 के सवा लाख से घट कर 2018 में 91,489 रह गई है।’’

कैग ने यह भी कहा कि आदिवासी बहुल पंचमहल जिले में भी लाभार्थी विद्यार्थियों की संख्या में इसी तरह की गिरावट दर्ज की गई। रिपेार्ट में कहा गया है कि पंचमहल जिले के सेहरा तालुका के दौरे के दौरान यह पाया गया कि पांच स्कूलों को दी गई दूध की 270 थैलियां में से 142 को उपयोग में नहीं लाया गया था और स्कूल के पास उसे सुरक्षित रखने की कोई सुविधा नहीं थी ताकि उसे अगले दिन उपयोग में लाया जा सके।

केंद्र सरकार के नियमों के मुताबिक गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) द्वारा संचालित केंद्रीकृत रसोइयों से स्कूलों को आपूर्ति की गई भोजन सामग्री को परोसने के समय न्यूनतम 65 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान पर रखना चाहिए। कैग ने कहा कि हालांकि वलसाड और वड़ोदारा के दौरे पर ऑडिट टीम ने पाया कि ‘‘भोजन गर्म नहीं था।’’

कैग ने इस बात का जिक्र किया कि मार्च 2018 में वड़ोदरा के स्कूलों का दौरा करने वाले ‘‘संयुक्त समीक्षा मिशन’’ की एक रिपोर्ट में इस बात का जिक्र किया कि एनजीओ द्वारा दिए गए भोजन में मिड-डे-मिल के तहत निर्धारित पोषक तत्वों की मात्रा नहीं थी। राज्य शिक्षा विभाग ने रसोई को सुविधाओं से लैस करने के लिये 2014-15 के दौरान 756 स्कूलों को और 2015-16 में 500 स्कूलों को 53.42 करोड़ रुपया मूल्य के उपकरण मुहैया किये थे।

हालांकि, कैग ने कहा है कि जांच किए गए सात तालुका के 64 स्कूलों में उपलब्ध कराए गए रसोई उपकरणों को उपयोग में नहीं लाया गया और वे आपूर्ति किए जाने के बाद से बेकार पड़े हुए हैं। उल्लेखनीय है कि केंद्र ने मध्याह्न भोजन योजना स्कूलों में दाखिला, उपस्थिति बढ़ाने और बच्चों के बीच में स्कूली शिक्षा छोड़ने से रोकने के लिये शुरू किया था। इसे हर सरकारी एवं सरकार से सहायता प्राप्त प्राथमिक विद्यालयों में लागू किया गया है।

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