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नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव का 2022 वाला महागठबंधन कैसे 2015 वाले गठजोड़ से है अलग, जानें

Bihar Row, Grand Alliance: पिछली बार जिस बात से महागठबंधन में बिखराव हुआ, वह थी सरकार पर राजद का, खासकर पुलिस अधिकारियों और निचली नौकरशाही के तबादले को लेकर, खींचतान और दबाव का रवैया।

नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव का 2022 वाला महागठबंधन कैसे 2015 वाले गठजोड़ से है अलग, जानें
Bihar Row, JDU and RJD Alliance: मंगलवार, 9 अगस्त, 2022 को संवाददाता सम्मेलन के दौरान पटना में राजद नेता तेजस्वी यादव और अन्य के साथ जदयू नेता नीतीश कुमार। (फोटो- पीटीआई)

“नीतीश कुमार को राजद में वापस क्यों आना पड़ा।” तेजस्वी यादव ने इसको स्पष्ट किया। राजद नेता ने मंगलवार को कहा, ‘अब आप पंजाब से लेकर महाराष्ट्र से लेकर बिहार तक बीजेपी के पुराने सहयोगियों को देखें। उन्होंने इन सभी स्थानों पर अपने सहयोगियों को खत्म करने की कोशिश की। अब पूरे हिंदी बेल्ट में भाजपा का कोई सहयोगी नहीं है। बीजेपी जदयू को भी अपने कब्जे में लेने की कोशिश कर रही थी, लेकिन हम समाजवादी हैं। नीतीश कुमार हमारे पूर्वज हैं और हमें ही उनकी विरासत को संभाल कर रखना चाहिए।”

यह शायद 2015 के महागठबंधन और 2022 के बीच सबसे महत्वपूर्ण और स्पष्ट अंतर है। 2014 के लोकसभा चुनाव में हार के बाद अगर नीतीश को अपने राजनीतिक वर्चस्व को फिर से हासिल करने के लिए सात साल पहले गठबंधन की जरूरत थी, तो उन्हें अब राजनीतिक दीर्घायु के लिए, 2025 के विधानसभा चुनावों से परे एक हितधारक बने रहने की जरूरत है।

2014 में जनता दल यू के सांसदों की संख्या घटकर दो हो गई थी

जब पहली बार उन्होंने जून 2013 में भाजपा से नाता तोड़ा, तो नीतीश को शायद विश्वास था कि वह अपने दम पर अपना विस्तार कर सकते हैं। उन्होंने पहले से ही नरेंद्र मोदी के खिलाफ एक बहुत ही सार्वजनिक रुख अपना लिया था, और बाद में उनके लगातार आगे बढ़ने से उन्हें महसूस हो गया कि एनडीए में अपने लिए बहुत कम जगह है। हालांकि, यह विश्वास, जो उनके बिहार के विकास पुरुष होने की उनकी छवि पर आधारित थी, को तोड़ दिया गया था। 2009 एनडीए के हिस्से के रूप में लोकसभा चुनावों में 20 सीटें जीतने वाले नीतीश कुमार का जनता दल (यू) 2014 में घटकर 2 पर आ गई थी।

मोदी के प्रति दुश्मनी, साथ ही यह अहसास कि जद (यू) के वोट बैंक को बहुमत के निशान तक पहुंचाने के लिए एक अतिरिक्त सहयोग की जरूरत है, ने नीतीश को लालू प्रसाद और राजद के साथ गठजोड़ करने के लिए प्रेरित किया। कांग्रेस और वाम दलों को मिलाकर महागठबंधन के साथ बिहार विधानसभा की 243 में से 178 सीटों पर जीत मिली। जबकि मोदी के चौतरफा अभियान के बावजूद भाजपा को केवल 53 सीटें ही मिल सकीं, जो उसके 2010 के 91 के आंकड़े से कम है।

नीतीश को यह समझ में आ गया कि चुनाव में कम से कम बिहार में एक ऐसा शिखर पुरुष, जिसके साथ देशभक्ति और हिंदुत्व का नाम भी जुड़ा हो कि तुलना में क्रम परिवर्तन और संयोजन से ज्यादा फायदा होता है।

जिस बात से महागठबंधन में बिखराव हुआ, वह थी सरकार पर राजद का, खासकर पुलिस अधिकारियों और निचली नौकरशाही के तबादले को लेकर, खींचतान और दबाव का रवैया। लालू, जब वह स्वस्थ थे, ने भी शासन के मामलों में गहरी दिलचस्पी दिखाई थी। ऐसा माना जाता है कि राजद नेता द्वारा नीतीश को अपने “छोटे भाई” के रूप में लगातार बताने से जद (यू) नेता पक गए थे, जिन्होंने खुद को बड़े जाल में फंसते हुए महसूस किया। आखिरकार, आईआरसीटीसी मामले में लालू के आवास पर सीबीआई के छापे से नीतीश को एक बड़ा मौका हाथ लग गया, और उन्होंने “भ्रष्टाचार” पर राजद के साथ संबंध तोड़ लिए। 2017 के मध्य तक, वह एनडीए में लौट आए।

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