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छतरपुर का परेई गांव बना मध्य प्रदेश का पहला जलग्राम, जल संरक्षण के लिए जलदूतों का संकल्प- सूखे पत्थरों के बीच बारिश की एक-एक बूंद बचाएंगे

नीति आयोग की प्रेरणा से ऋषि कुल आश्रम समिति का प्रयास। आसपास के गांवों-क्षेत्रों में परंपरागत विधि और जखनी मॉडल से सूख रहीं नदियों, तालाबों काे पानीदार बनाया जाएगा।

WATER CONSERVATION, WATER MANAGEMENTमध्यप्रदेश के पहले जलग्राम परेई का उद्घाटन (ऊपर) और नीति आयोग के सलाहकार अविनाश मिश्र और केंद्रीय भूजल मध्य प्रदेश के निदेशक पीके जैन का स्वागत करते डॉ. शिवपूजन अवस्थी (नीचे)।

‘जल ही जीवन है, जल में कल है’ ऐसा शास्त्रों में कहा गया है। मानव शरीर, समाज और संसार सब कुछ जल से ही निर्मित एक रूप है। अगर जल न होता तो ये भी न होते। तीसरा विश्व युद्ध पानी को लेकर लड़े जाने की भविष्यवाणी की जा चुकी है। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेई जी ने कहा था कि तीसरा विश्व युद्ध पानी को लेकर होने की आशंका है, पर हम प्रयास करें कि वह भारत में ना हो। बेवजह पानी बहाते लोगों को यह जानना और समझना आवश्यक है कि यह भविष्यवाणी लोगों ने यूं ही, बिना तथ्यों के नहीं कर दी, अपितु इसके पीछे वो आंकडे़ हैं जो सभी को चौंका देने वाले हैं। जल संरक्षण और जल प्रबंधन के लिए भारत समेत दुनिया भर में तमाम योजनाएं चल रही हैं। यूपी-एमपी की सीमा पर स्थित बुंदेलखंड क्षेत्र में मध्य प्रदेश के पहले जल ग्राम का शुभारंभ के लिए छतरपुर जिले के ब्लॉक गौरिहार की ग्राम पंचायत परेई को चुना गया।

इसका उद्घाटन नीति आयोग के जल सलाहकार अविनाश मिश्र ने किया। इस मौके पर उन्होंने कहा कि समुदाय के आधार पर बगैर किसी सरकारी सहायता के परंपरागत तरीके से इस गांव में जल संरक्षण किया जाएगा। केन नदी के किनारे बसे मध्य प्रदेश के अंतिम गांव में जल का संकट है, लेकिन परंपरागत पुराने तालाब कुआं नाले हैं। इन्हें पुनर्जीवित कर वर्षा जल को रोका जाएगा इस अवसर पर केंद्रीय भूजल मध्य प्रदेश के निदेशक पीके जैन ने कहा कि इस गांव को पानीदार बनाने के लिए पुरखों की विधि का इस्तेमाल किया जाएगा। नवीन तकनीक से स्थानीय किसानों को नौजवानों को शिक्षित प्रशिक्षित किया जाएगा। जल का संकट पूरी दुनिया में है, हम सबको मिलकर इसके लिए पहल करनी होगी।

कार्यक्रम जल योद्धा उमा शंकर पांडे ने कहा कि जल संरक्षण सरकार का नहीं समाज का विषय है। हम सबको मिलकर वर्षा की एक-एक बूंद को रोकना होगा। अपने खेत में गांव में तालाब में जंगल में आने वाले समय में यदि हमें तीसरा विश्व युद्ध रोकना है तो जल संरक्षण करना होगा। ऋषि कुल आश्रम समिति के सचिव डॉ. शिवपूजन अवस्थी ने कहा कि मेरा प्रयास अपने गांव को पानीदार बनाना है। उन्होंने कहा कि समिति पूरे गांव के लोगों को जागरूक कर जल संरक्षण के लिए विशेष अभियान चलाएगा। ऋषि कुल आश्रम समिति के जलदूतों ने गांव में पत्थरों के बीच बारिश की एक-एक बूंद को बचाने का संकल्प लिया। जहां हमेशा सूखा रहता है वहां नदी बहाएंगे।

नदियों को तप से धरा पर लाया गया। नदियां, तालाब, कुएं, बावड़ियां और जलस्रोत पूजनीय और जन-समाज की आस्था और सहभागिता से जीवंत थे, लेकिन आज हमारा जनमानस जलस्रोतों से दूर है, उनके प्रति उदासीन है, उन्हें प्रदूषित कर रहा है। जीवनदायी जल को व्यर्थ में बहाता लापरवाह मनुष्य कल पीने वाले जल की समाप्ति की भयावहता से अनभिज्ञ है। मनुष्य यदि आज जल संरक्षण के प्रति सचेत नहीं हुआ तो निश्चित ही आने वाले समय में बूंद-बूंद पानी के लिए तरसेगा।

सनातन वैदिक भारतीय संस्कृति के अनेक ग्रंथों में जल की विभीषिका का वर्णन मिलता है। सतयुग, त्रेता, द्वापर की घटनाएं तो प्रमाण हैं, परन्तु वर्तमान कलियुग में प्रत्यक्ष सुनने और देखने के बाद प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। दुनियाभर के अलावा भारत के अनेक क्षेत्रों में प्रतिवर्ष पीने योग्य जल के बिना अकाल-दुर्भिक्ष से तो लोग अभिशप्त हैं ही, मृत्यु के भय से अपनी जन्मभूमि से पलायन करने के लिए भी मजबूर हो जाते हैं। जल के बिना सामाजिक और आर्थिक ताना-बाना भी तब टूटता नजर आता है। गड़बड़ी कहां है, जानना अति आवश्यक है। मानवता के हित में निशुल्क पानी पिलाने वाले भारत में जल का बाजारीकरण जल समस्या का समाधान नहीं है। l बोतल बंद पानी 15 रुपए से 150 रुपए बोतल तक बिक रहा है। आने वाले समय में जिसका कारोबार 160 बिलियन को छू जाने वाला है। गरीब जल कहां से पिएगा, किसान कहां से खेत को पानी देगा?

ये बड़े ज्वलंत प्रश्न हैं। बांधों में नदियों को बांध कर जल को अपने अधीन करने का कार्य हो रहा है, तो किसान को खेती के लिए पानी कहां से मिलेगा, भू-जल कहां से रीचार्ज होगा। जल के लिए पराधीन किसान फिर आत्महत्या नहीं करेगा तो क्या करेगा। कृषि प्रधान भारत का किसान पानी के बिना खेत छोड़ देगा, गांव छोड़ देगा या फिर पानी को गहरे बोर करके प्राप्त करेगा जिससे खेती-किसानी महंगी तो होगी ही साथ ही भूमि का जल स्तर निरंतर गिरता चला जाएगा और बोर के महंगे खर्चे के कारण जो लंब समय तक चल भी नहीं पाएगा। यही नही कम भूमि का छोटा किसान पानी की कमी और महंगी, खर्चीली खेती के कारण स्वत: ही समाप्त हो जाएगा और अन्न देने वाला खुद ही दाने-दाने का मोहताज हो जाएगा।

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