दिलजीत दोसांझ अभिनीत फिल्म ‘सतलुज’ को लेकर बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ को मिली जानकारी के अनुसार, एक सरकारी पैनल ने फिल्म की समीक्षा के बाद सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को सिफारिश की है कि इसे भारत में जनता के लिए ब्लॉक रखा जाए। 3 जुलाई को रिलीज होने के महज दो दिन बाद ही यह फिल्म ओटीटी प्लेटफॉर्म ZEE5 से हटा दी गई थी।

हनी त्रेहान के निर्देशन में बनी और दिलजीत दोसांझ अभिनीत यह फिल्म 1990 के दशक में पंजाब में उग्रवाद के उथल-पुथल भरे दौर पर आधारित है। यह मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर बनी है और उग्रवाद के वर्षों के दौरान सैकड़ों लोगों के लापता होने के मामलों की जांच के उनके अभियान के बाद पुलिस हिरासत में उनकी मौत को दिखाती है।

सूत्रों ने बताया कि इंटर-डिपार्टमेंटल कमेटी (आईडीसी) नाम के इस पैनल ने राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए मंत्रालय से कहा है कि इस फिल्म से राज्य की सुरक्षा को खतरा हो सकता है। पता चला है कि आईडीसी ने कहा है कि यह फिल्म आईटी एक्ट की धारा 69ए के दायरे में आती है।

जानकारी के अनुसार, कमेटी का तर्क है कि यह फिल्म देश की संप्रभुता और अखंडता के खिलाफ है और विरोधी तत्वों को बढ़ावा देती है। बताया जा रहा है कि कमेटी ने सिफारिश की है कि ZEE5 और फिल्म निर्माता ऑनलाइन मौजूद फिल्म के पायरेटेड वर्जन की पहचान करें और उन्हें हटाने के लिए कदम उठाएं। टिप्पणी के लिए त्रेहान उपलब्ध नहीं थे।

आईडीसी, इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (इंटरमीडियरी गाइडलाइंस एंड डिजिटल मीडिया एथिक्स कोड) रूल्स, 2021 के तहत गठित एक सरकारी निगरानी पैनल है। यह स्ट्रीमिंग और डिजिटल न्यूज प्लेटफॉर्म पर जनता की शिकायतों तथा कंटेंट से जुड़े नियमों के उल्लंघन की जांच करता है और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को अपनी सिफारिशें भेजता है।

इसमें सूचना एवं प्रसारण, गृह, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी, महिला एवं बाल विकास, विदेश, रक्षा तथा कानून एवं न्याय मंत्रालयों के प्रतिनिधि शामिल होते हैं। इसके अलावा, जरूरत के अनुसार अन्य मंत्रालयों के प्रतिनिधि और संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ भी इसमें शामिल किए जा सकते हैं।

खालड़ा की जांच के बाद हिरासत में मौत हुई थी

खालड़ा, जो पंजाब में उग्रवाद के दौर में “लावारिस” शवों के कथित गैर-कानूनी अंतिम संस्कार का रिकॉर्ड जुटा रहे थे, उन्हें हफ्तों तक प्रताड़ित करने के बाद पुलिस हिरासत में मार डाला गया। उनकी जांच में पहले यह अनुमान लगाया गया था कि पूरे पंजाब में लगभग 25,000 लोगों का गुप्त रूप से अंतिम संस्कार किया गया था।

खालड़ा के लापता होने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने उनके अपहरण और कथित गैर-कानूनी अंतिम संस्कारों की सीबीआई जांच का आदेश दिया। 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने उनकी हत्या के लिए पांच पुलिसकर्मियों को सुनाई गई उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा।

इंडियन एक्सप्रेस ने रिपोर्ट किया था कि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने आईटी एक्ट की धारा 69ए का इस्तेमाल करते हुए ZEE5 को एक अंतरिम आदेश जारी किया था। इसमें सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए ओटीटी प्लेटफॉर्म से फिल्म हटाने के लिए कहा गया था। इसके बाद ZEE5 ने आदेश का पालन किया।

इस बीच, सरकार ने फिल्म को आईडीसी के पास भेज दिया था। सूत्रों के मुताबिक, अपनी सिफारिश को अंतिम रूप देने से पहले आईडीसी की इस सप्ताह कम से कम दो बैठकें हुईं।

पता चला है कि पैनल ने यह भी गौर किया कि फिल्म सच्ची कहानियों और वास्तविक घटनाओं पर आधारित है। इससे निर्माताओं का यह दावा कमजोर पड़ता है कि यह पूरी तरह काल्पनिक कहानी है, खासकर तब जब मामला राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा हो। सूत्रों का कहना है कि सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (सीबीएफसी) ने भी लगभग चार साल पहले फिल्म की समीक्षा के दौरान यही मुद्दा उठाया था।

सूत्रों के मुताबिक, आईडीसी का मानना था कि फिल्म में दिखाए गए दौर के दौरान पंजाब की घटनाओं को एकतरफा नजरिए से पेश किया गया है। कमेटी का मानना था कि फिल्म में विद्रोहियों और आतंकवाद को पर्याप्त रूप से नहीं दिखाया गया, जबकि विद्रोह-विरोधी कार्रवाई को आतंकवाद के खिलाफ कानूनी प्रतिक्रिया के बजाय सरकारी ज्यादती और क्रूरता के रूप में चित्रित किया गया तथा सरकारी एजेंसियों को नकारात्मक रूप में पेश किया गया।

सूत्रों से पता चला है कि आईडीसी ने एक ऐसे दृश्य पर भी आपत्ति जताई है, जिसमें एक सरकारी अधिकारी ऐसे बयान देता है जो किसी समुदाय के खिलाफ बड़े पैमाने पर अत्याचारों के आरोपों को सही ठहराते हैं। कमेटी का मानना है कि इससे अलगाववादी अभियानों, विचारधारा और प्रोपेगैंडा को बढ़ावा देने वाले तत्वों को आधार मिल सकता है।

आईडीसी ने यह भी देखा कि फिल्म में एक मुख्यमंत्री की हत्या को पुलिस द्वारा की गई कथित गैर-न्यायिक हत्याओं के बदले की कार्रवाई के रूप में दिखाया गया है।

आईडीसी का मानना है कि इस तरह का चित्रण हत्या को नैतिक रूप से उचित ठहराने का प्रयास प्रतीत होता है, न कि इसे खालिस्तानी उग्रवादी आंदोलन से जुड़े आतंकवादी कृत्य के रूप में प्रस्तुत किया गया है। साथ ही, इसमें जानी-मानी आतंकवादी संस्थाओं की भूमिका को भी नजरअंदाज किया गया है।

आईडीसी ने कहा कि इस तरह का चित्रण राज्य की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था के लिए खतरा पैदा कर सकता है। साथ ही, ऐसे कंटेंट का इस्तेमाल विदेशों में सक्रिय अलगाववादी और चरमपंथी संगठन अपने प्रचार के लिए कर सकते हैं। पता चला है कि पैनल ने फिल्म रिलीज होने से पहले उसके कुछ हिस्सों में संपादन कराने का विकल्प नहीं चुना।

ZEE5 पर रिलीज होने से पहले “सतलुज” के निर्माताओं ने 2022 में “पंजाब 95” नाम से सीबीएफसी प्रमाणन के लिए आवेदन किया था। हालांकि, निर्माताओं ने सेंसर बोर्ड द्वारा सुझाए गए 127 कट और नाम बदलने के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया तथा बॉम्बे हाई कोर्ट में कानूनी चुनौती दी, लेकिन बाद में अपनी याचिका वापस ले ली।

ZEE5 द्वारा फिल्म हटाए जाने के बाद इस पर व्यापक बहस छिड़ गई थी। राजनीतिक दलों और शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) ने फिल्म को दोबारा उपलब्ध कराने की मांग की, जबकि दोसांझ ने कहा कि उन्हें “पहले से ही लग रहा था कि ऐसा कुछ हो सकता है।”

ओटीटी कंटेंट सीबीएफसी के नियमों के दायरे में नहीं आता, बल्कि यह ‘सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021’ के प्रावधानों के तहत आता है। आईटी नियमों के तहत ओटीटी प्लेटफॉर्म के लिए यह अनिवार्य है कि वे कानून द्वारा प्रतिबंधित कंटेंट प्रकाशित न करें और कंटेंट का आयु-आधारित वर्गीकरण करें।

बॉम्बे हाई कोर्ट ने आईटी नियम, 2021 के नियम 9(1) और 9(3) पर पूरे देश में अंतरिम रोक लगा रखी है। इन नियमों के तहत डिजिटल न्यूज मीडिया और ऑनलाइन पब्लिशर्स के लिए आचार संहिता तथा तीन-स्तरीय शिकायत निवारण तंत्र का पालन करना अनिवार्य था।

आईटी एक्ट की धारा 69ए के बढ़ते इस्तेमाल को लेकर पिछले कुछ वर्षों में अभिव्यक्ति की आजादी और सेंसरशिप पर बहस होती रही है। सरकार जहां इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आवश्यक बताती है, वहीं आलोचकों का कहना है कि यह प्रक्रिया पर्याप्त पारदर्शी नहीं है, मुख्य रूप से कार्यपालिका द्वारा संचालित है और इसमें अत्यधिक सेंसरशिप की गुंजाइश रहती है। सरकार द्वारा संसद में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, जनवरी 2018 से अक्टूबर 2023 के बीच धारा 69ए के तहत 36,838 यूआरएल ब्लॉक किए गए।

धारा 69ए के अनुसार, केंद्र सरकार भारत की संप्रभुता और अखंडता, देश की सुरक्षा, राज्य की सुरक्षा, विदेशी देशों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध, सार्वजनिक व्यवस्था या किसी संज्ञेय अपराध के लिए उकसावे को रोकने के हित में किसी ऑनलाइन सामग्री को ब्लॉक करने का निर्देश दे सकती है। इसके लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन और लिखित कारण दर्ज करना आवश्यक है।

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जसवंत सिंह खालड़ा की बायोपिक सतलुज को भारत सरकार ने बैन कर दिया है और OTT प्लेटफॉर्म से हटा दिया है। इसमें दिलजीत दोसांझ हैं। एक मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा ने मिलिटेंसी के समय पंजाब पुलिस द्वारा किए गए सैकड़ों कथित ‘फर्जी एनकाउंटर’ की जांच की थी, जिसके कारण CBI जांच हुई और कई पुलिसवालों को दोषी ठहराया गया। नवकिरण कौर खालड़ा 10 साल की थीं और उनके भाई जनमीत आठ साल के, जब उन्होंने 6 सितंबर 1995 की सुबह अपने पिता जसवंत सिंह खालड़ा को आखिरी बार देखा था। जब वे स्कूल से लौटे, तब तक उन्हें पंजाब पुलिस उठा ले गई थी। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक