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गौरैया दिवस: होगी शहरों में लुप्त, पर चंबल में तो खूब चहचहा रही है गौरैया

बदलती जीवन शैली से इस चिड़िया के रहन-सहन और भोजन में कई दिक्कतेंं आ रही हैं

20 मार्च, गौरैया दिवस मनाया जा रहा है।

आज, 20 मार्च, गौरैया दिवस मनाया जा रहा है। हर ओर गौरैया की घटती तादात पर चिंता जताई जा रही है लेकिन इसके बावजूद एक ऐसा इलाका भी है जहां गौरैया भारी तादात में नजर आ रही है। यह इलाका कहीं और नही बल्कि कभी डाकुओं की शरण स्थली के रूप में विख्यात चंबल के बीहड़ों से सटे उत्तर प्रदेश का इटावा है ।भले ही गौरैया के बारे मे देश-दुनिया से विलुप्त होने की खबरें आती हों लेकिन चंबल घाटी से जुडेÞ इटावा में गौरैया चिड़िया खासी तादात में देखी जा रही है। गौरैया की मौजूदगी उन तमाम रिर्पाेटों को खारिज करती है, जो गौरैया के लुप्त होने के बारे में चिंता जता रही हैं।  हकीकत में इतनी गौरैया कम नही हुई हैं, जितनी इसकी कहानी पेश की जा रही है । ब्रिटेन की ‘रॉयल सोसायटी आॅफ प्रोटेक्शन आॅफ बर्ड्स’ ने भारत से लेकर विश्व के विभिन्न हिस्सों में अनुसंधानकर्ताओं द्वारा किए गए अध्ययनों के आधार पर गौरैया को ‘रेड लिस्ट’ में डाला है। इटावा की चंबल घाटी ने इस अध्ययन की पोल खोल करके रख दी हंै क्योंकि घाटी में हजारों की तादात में गौरैया को आज भी देखा जा रहा है।  कभी घरों की मुंडेरों पर चहचहाने वाली गौरैया नामक चिड़िया करीब-करीब विलुप्त होने के कगार पर आ खड़ी हुई थी। इसको लेकर जंगल विभाग अफसरों और तमाम पर्यावरणीय संस्थाओं की ओर से चिंता जताई जाने लगी थी। आम लोग गौरैया को देखने के लिए तरस गए थे। मगर अब एक उम्मीद बंधी है कि गौरैया लुप्त नहीं होगी।

शहरों के विस्तार और बदलती जीवन शैली से अब गौरैया के रहन-सहन और भोजन में कई दिक्कतेंं आ रही हैं। यही वजह है कि शहरों में अब गौरैया की आबादी कम होती जा रही है। माना जाता है कि बढ़ते शहरीकरण से गौरैया भी प्रभावित हुईं। गौरैया आबादी के अंदर रहने वाली चिड़िया है, जो अक्सर पुराने घरों के अंदर, छप्पर या खपरैल अथवा झाड़ियों में घोंसला बनाकर रहती हैं । घास के बीज, दाने और कीड़े-मकोड़े गौरैया का मुख्य भोजन है, जो पहले उसे घरों में ही मिल जाता था, लेकिन अब ऐसा नहीं है। दिन भर आंगन में मंडराने वाले गौरैया के झुंड अब दिखाई नहीं देते हैं। पहले हमारे घर में अगर 40-50 चिड़ियां आती थीं तो अब एक भी नहीं दिखती है। इटावावासी हाजी अखलाक कहते हैं कि गौरैया बहुत संवेदनशील पक्षी है और मोबाइल फोन तथा उनके टावर्स से निकलने वाली इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएशन से भी उसकी आबादी पर असर पड़ रहा है। पर्यावरणीय संस्था, सोसायटी फॉर कंजरवेशन आॅफ नेचर के सचिव डॉ.राजीव चौहान का कहना है कि अब से करीब 10 साल पहले तक गौरैया की खासी तादाद को हम लोग अपने घरों के साथ-साथ पड़ोसी के घरों में भी देखा करते रहे हैं, जो अब शहरी इलाकों से गायब हो गई है। डॉ.चौहान का कहना है कि शहरों के विस्तार और हमारी बदलती जीवन शैली से अब गौरैया के रहन-सहन और भोजन में कई दिक्कतेंं आ रही हैं। जिस तरह से इटावा के पास बड़ी संख्या में गौरैया नजर आई उससे उनके भविष्य को लेकर एक सुखद अनूभूति हो रही है।

उधर वन विभाग के अफसरों की भी खुशी का कोई ठिकाना नहीं है क्योंकि इतनी बड़ी तादाद में देश के किसी भी शहरी या फिर जंगली इलाकों में गौरैया चिड़ियों के मिलने की कोई भी रिपोर्ट नहीं मिली है।आज गौरैया एक संकटग्रस्त पक्षी है। भारत में ही नहीं यूरोप के कई बड़े हिस्सों में भी उनकी संख्या तेजी से कम हुई है। ब्रिटेन ,इटली ,फ्रांस ,जर्मनी जैसे देशों में इनकी संख्या में गिरावट आ रही है। नीदरलैंड में तो इन्हें दुर्लभ प्रजाति वर्ग में रखा गया है। गौरैया को बचाने की कवायद में दिल्ली सरकार ने गौरैया को राज पक्षी भी घोषित कर दिया है। एक अध्ययन के अनुसार भारत में गौरैया की संख्या करीब साठ फीसदी तक घटी है। चंबल सेंचुरी के वन्य जीव प्रतिपालक सुरेश चंद्र राजपूत का कहना है कि जब भी वह चंबल इलाके का भ्रमण करने के लिए जाते हैं तो उन्हें बड़ी तादाद में गौरैया दिखती है। यह बात सही है कि गौरैया शहरी इलाके में ना के बराबर दिखती है मगर चंबल के बीहडों में उनकी तादाद उत्साह पैदा करने के लिए काफी है। राजपूत कहते है कि असल में चंबल के बीहड़ में पेड़ों और हरियाली के कारण गौरैया सहज नजर आती हैं। अखिलेश सरकार में गौरैया संरक्षण कार्यक्रम पूरे प्रदेश में बड़े स्तर पर चलाया गया था । इसके तहत लोगों से घरों में लकड़ी के घोसले बनाने का आह्वान किया गया था।

 

 

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