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इस बार तप रहे हैं सर्दियों में बर्फ की चादर ओढ़े रहने वाले पहाड़

उत्तराखंड के पहाड़ों पर भी ग्लोबल वार्मिंग का असर दिखने लगा है। आमतौर पर इस मौसम में नैनीताल और आसपास की ऊंची पहाड़ियां बर्फ की सफेद चादर में लिपटी नजर आती थीं.

Author नैनीताल | January 4, 2016 11:15 PM

उत्तराखंड के पहाड़ों पर भी ग्लोबल वार्मिंग का असर दिखने लगा है। आमतौर पर इस मौसम में नैनीताल और आसपास की ऊंची पहाड़ियां बर्फ की सफेद चादर में लिपटी नजर आती थीं। लेकिन इस साल यहां चटख धूप खिल रही है। बर्फबारी और बारिश के दूर तक आसार नजर नहीं आ रहे हैं।

दिसंबर के आखिरी हफ्ते में नैनीताल में बारिश या बर्फबारी हो जाती थी। इस साल दिसंबर का आखिरी हफ्ता बेहद गर्म रहा। इस बार जाड़ों में बारिश और बर्फबारी नहीं होने से नैनीताल के तालाबों का जल स्तर नीचे आ गया है। 25 दिसंबर से पहले तक यहां का न्यूनतम तापमान ढाई डिग्री सेंटीग्रेड से नीचे था। क्रिसमस के दिन न्यूनतम तापमान एकाएक 14 डिग्री तक पहुंच गया। 29 दिसंबर को यहां का औसत तापमान 17 डिग्री से ऊपर जा पहुंचा। दो जनवरी को नैनीताल का अधिकतम तापमान 12 और न्यूनतम तापमान पांच डिग्री सेंटीग्रेड था। जबकि 2009 से 2014 के दरम्यान इन दिनों में नैनीताल का न्यूनतम तापमान एक से डेढ़ डिग्री सेंटीग्रेड दर्ज किया गया था।

हाड़ कंपा देने वाली सर्दी के इस मौसम में बारिश और बर्फबारी नहीं होने से नैनीताल की झील का जल स्तर करीब चार फुट रह गया है। बारिश और ठंड के अभाव में पहाड़ी इलाकों में गेहूं की फसल और बागवानी पर बुरा असर पड़ने की संभावनाएं बढ़ गई हैं। यह मौसम खासकर सेब के उत्पादन और गुणवत्ता के लिए बेहद नुकसानदेह है।

नैनीताल जिले के रामगढ़, मुक्तेश्वर, पहाड़पानी, धानाचुली और सूपी जैसे इलाकों को कुमाऊं की सबसे बेहतरीन फल पट्टी माना जाता है। कुमाऊं में सबसे ज्यादा सेब के बागान इसी इलाके में हैं। सेब के बेहतरीन उत्पादन और गुणवत्ता के लिए नवंबर से मार्च के बीच तकरीबन नौ सौ घंटे चिलिंग (ठंड) को जरूरी समझा जाता है। पर इस बार अभी तक ठंड गायब है।

पहाड़ों पर मौसम में अचानक आए इस बदलाव से मौसम विज्ञानी भी हैरत में हैं। आर्य भट्ट प्रेषण विज्ञान शोध संस्थान (एरीज) के मौसम विज्ञानी इस बदलाव की वजहों की पड़ताल में जुट गए हैं। एरीज के मौसम विज्ञानी डॉक्टर मनीष नाजा का कहना है कि मौसम में आ रहे इस बदलाव के पीछे अल नीनो और ला नीनो का असर और ग्रीन हाउस गैसों की बढ़ती मात्रा मुख्य वजह है।

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