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जब जॉर्ज फर्नांडिस को मिला था ‘जाइंट किलर’ का नाम, जानें कुछ किस्से

George Fernandes Death: मंगलवार को वाजपेयी सरकार में रक्षा मंत्री रहे जॉर्ज फर्नांडिस का निधन हो गया। 88 साल के जॉर्ज फर्नांडिस लंबे वक्त से बीमार चल रहे थे और व अलजाइमर से ग्रस्त थे। ऐसे में आपको बताते हैं कुछ किस्से...

Author Updated: January 29, 2019 12:24 PM
जॉर्ज फर्नांडिस, फोटो सोर्स- इंडियन एक्सप्रेस

वाजपेयी सरकार में रक्षा मंत्री रहे जॉर्ज फर्नांडिस का मंगलवार को निधन हो गया। 88 साल के जॉर्ज फर्नांडिस लंबे वक्त से बीमार चल रहे थे और व अलजाइमर से ग्रस्त थे। यही वजह है कि लंबे वक्त से वो सार्वजनिक जीवन से बाहर थे। वहीं राज्यसभा सांसद के तौर पर संसद में उनका आखिरी कार्यकाल अगस्त 2009 से जुलाई 2010 तक था। ऐसे में आपको बताते हैं कुछ किस्से…

फरवरी 1976 के लोकसभा चुनाव: दरअसल फरवरी 1967 में लोकसभा चुनाव होने वाले थे। ऐसे में बॉम्बे साउथ की सीट से सदाशिव कानोजी पाटिल थे कांग्रेस के उम्मीदवार। सदाशिव चार बार बॉम्बे के मेयर रह चुके थे। इसके साथ ही नेहरू और शास्त्री सरकार में केन्द्रीय मंत्री रह चुके थे। इसके चलते उनकी जीत तय मानी जा रही थी। वहीं सोशलिस्ट पार्टी टूट कर राम मनोहर लोहिया के नेतृत्व में नया दल बना था। इस पार्टी की ओर से उम्मीदवार बनकर उतरे जॉर्ज फर्नांडिस। जिन्होंने सदाशिव को धूल चटा दी। इसके बाद जॉर्ज फर्नांडिस को जॉर्ज दी जाइंट किलर के नाम से जाना जाने लगा।

पादरी बनने वाले थे जॉर्ज फर्नांडिस: जॉर्ज फर्नांडिस का जन्म 3 जून 1930 को मैंगलोर में हुआ था। वो अपने 6 भाइयों में सबसे बड़े थे। वहीं 16 साल की उम्र में उन्हें कैथलिक पादरी बनने के लिए बैंगलोर की सेमिनरी में भेजा गया। जहां वो दो साल तक रहे। लेकिन देश आजाद होने के साथ ही वहां से भाग निकले। एक टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि सेमिनरी से मेरा मन उचट गया था। मैं देखता था कि पादरी की कथनी और करनी में काफी फर्क है और ऐसा सिर्फ एक नहीं बल्कि तमाम धर्मों के साथ था।

1974 की हड़ताल में शामिल थे जॉर्ज फर्नांडिस: आजादी के बाद तीन वेतन आयोगों में भी रेल कर्मचारियों के वेतन में कोई दर्ज करने लायक बढ़ोत्तरी नहीं हुई थी। जॉर्ज फर्नांडिस 1973 नवंबर में ऑल इंडिया रेलवे मैन्स फेडरेशन के अध्यक्ष बने। जिसके बाद वेतन की मांग पर हड़ताल शुरू हुई। इसके लिए नेशनल कोऑर्डिनेशन कमेटी बनी और 8 मई 1974 को बॉम्बे में हड़ताल शुरू हुई। ऐसे में टैक्सी ड्राइवर, इलेक्ट्रिसिटी यूनियन और ट्रांसपोर्ट यूनियन भी इसमें शामिल हो गई। ऐसे में पूरा देश थम सा गया। सरकार ने इसको रोकने के लिए सैना की तैनाती के साथ ही साथ कई मजदूर नेताओं को जेल भी डाला। 27 मई को बिना कोई कारण बताए कोऑर्डिनेश कमेटी ने हड़ताल वापस लेने का ऐलान किया। इस हड़ताल से दो बड़े फर्क पड़े। जिसमें शामिल था जॉर्ज फर्नांडिस की बड़े मजदूर नेता के तौर पर मौजूदगी और इंदिरा गांधी को आपातकाल लागू करने के लिए जरूरी तर्क।

सरदार खुशवंत सिंह बन घुमते थे जॉर्ज फर्नांडिस: 25 जून 1975 को जॉर्ज फर्नांडिस उड़ीसा में थे। ऐसे में उन्हें आपातकाल की सूचना मिली जिसके बाद से वो फरार हो गए। कुछ ही वक्त में उनकी दाढ़ी और बाल बढ़ चुके थे। जिसके बाद उन्होंने सिख का भेष बना लिया और खुद का नाम खुशवंत सिंह बताने लगे।

फरार जॉर्ज फर्नांडिस हिंसा के राह पर: आपातकाल के दौरान इंदिरा विरोधियों के लिए गुजरात सबसे सुरक्षित ठिकाना माना जा रहा था। उस वक्त वहां जनता फ्रंट की सरकार थी और बाबू भाई पटेल वहां के उस वक्त मुख्यमंत्री थे। ऐसे में जुलाई 1975 में जॉर्ज फर्नांडिस की मुलाकात कीर्ति भट्ट और विक्रम राव से हुई। कीर्ति भट्ट उस वक्त बड़ौदा यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट के अध्यक्ष थे और विक्रम टाइम्स ऑफ इंडिया के स्टाफ रिपोर्टर। ऐसे में सभी ने मिलकर ये तय किया कि हिंसक प्रतिरोध के रास्ते पर आने का वक्त आ गया है। जिसके बाद विक्रम के जरिए जॉर्ज फर्नांडिस की मुलाकात विरेन जे शाह से हुई। जिन्होंने वादा किया कि वो डायनामाइट की व्यवस्था करवा देंगे। ऐसे में प्लान ये था कि इंदिरा गांधी की सभा के पास किसी सरकारी इमारत के टॉयलेट में धमाका किया जाए। जिससे अफरातफरी का माहौल बन जाए। लेकिन किसी भी जान नहीं जानी चाहिए। इसके बाद पटना पहुंचे जॉर्ज फर्नांडिस की सूचना पुलिस को मिल गई। हालांकि वो पुलिस के हाथ नहीं लगे लेकिन जिनके घर वो रुके थे यानी रेंवतीकांत सिंहा को पुलिस ने पकड़ लिया। जहां पूछताछ में उन्होंने बताया कि जॉर्ज फर्नांडिस अपने साथ डायनामाइट की पेटी लेकर आए थे। जो उनके घर में रखी है। इस घटना के भांडाफोड़ में कुल 25 लोग केस के आरोपी बने। वहीं सीबीआई ने इस मामले को अपने हाथ में ले लिया।

गिरफ्तार हुए जॉर्ज फर्नांडिस: 10 जून 1976 को कोलकाता से जॉर्ज फर्नांडिस को गिरफ्तार किया गया और रातोंरात कोलकाता से दिल्ली लाया गया। जेल के बाहर ये संदेह जताया जा रहा था कि जेल के अंदर ही जॉर्ज फर्नांडिस की हत्या करवाई जा सकती है। ऐसे में जब तीस हजारी कोर्ट में पेशी के लिए जॉर्ज फर्नांडिस जा रहे थे तब करीब पुलिस के 200 जवान उनकी वैन को घेर कर खड़े थे। इस ही दौरान हथकड़ी बंद हाथ उठाए उनकी तस्वीर खींची गई थी जो आज भी आपात्काल के खिलाफ प्रदर्शन का प्रतीक मानी जाती है। जॉर्ज फर्नांडिस की पेशी के वक्त जेएनयू और डीयू के छात्र कोर्ट परिसर के बाहर खड़े थे और नारे लगा रहे थे ‘जेल का दरवाजा तोड़ दो, जॉर्ज फर्नांडिस को छोड़ दो’। यहां से जॉर्ज फर्नांडिस विद्रोह का आइकन बन गए।

जॉर्ज फर्नांडिस जेल में और तस्वीरें कर रही थीं प्रचार: 1977 में आपातकाल हटने के बाद मुजफ्फरपुर से जॉर्ज फर्नांडिस ने चुनाव लड़ा। चूंकि डायनामाइट केस में जार्ज उस वक्त जेल में थे और उन पर देशद्रोह का आरोप था इसलिए उन्हें जमानत नहीं मिली। हालांकि उनके जेल में होने के बावजूद उनकी हाथ में हथकड़ी वाली तस्वीर हर जगह घुमाई जाने लगी। जनता ने खुद पैसा इकट्ठा करके प्रचार किया। इस चुनाव में जॉर्ज की तरफ से एक भी पैसा नहीं खर्च किया गया था। इसके बाद जब चुनाव का फैसला सामने आया तब वो तीन लाख से ज्यादा वोटों से चुनाव जीते। वहीं सत्ता में आई जनता सरकार ने बड़ौदा डायनामाइट केस को खत्म कर दिया और जॉर्ज फर्नांडिस को उद्योग मंत्री का पद दिया गया।

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