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शांति दूतों का स्वागत करने के लिए दिल्ली में जुटेंगे गांधीजन

पिछले तीन सितंबर को असम के कोकराझार से कश्मीर तक शांति और सद्भावना का संदेश देने के लिए यात्रा पर निकले साइकिल यात्रियों का स्वागत करने के लिए आगामी 8 अक्तूबर को देश भर के गांधीजन बड़ी संख्या में राष्ट्रीय राजधानी में जुटेंगे।

Author नई दिल्ली | September 17, 2016 1:19 AM

प्रसून लतांत
पिछले तीन सितंबर को असम के कोकराझार से कश्मीर तक शांति और सद्भावना का संदेश देने के लिए यात्रा पर निकले साइकिल यात्रियों का स्वागत करने के लिए आगामी 8 अक्तूबर को देश भर के गांधीजन बड़ी संख्या में राष्ट्रीय राजधानी में जुटेंगे। कोकराझार से निकली इस साइकिल टोली में पच्चीस युवा हैं, जो कोकराझार सहित आठ विभिन्न जिलों के हैं। इनमें तीन लड़कियां भी हैं। देश और दुनिया को मोहब्बत का पैगाम देने निकले साइकिल यात्रियों का नेतृत्व और संचालन वरिष्ठ गांधीवादी नेत्री राधा भट्ट और चंदन पाल कर रहे हैं। यात्रा को सर्व सेवा संघ सहित देश भर के विभिन्न गांधीवादी संगठनों और संस्थाओं का सहयोग और समर्थन मिला हुआ है।

कश्मीर तक की यात्रा पर निकले साइकिल यात्री इन दिनों असम से निकल कर बंगाल के क्षेत्रों से गुजर रहे हैं। बंगाल से निकलने के बाद उनका बिहार में प्रवेश होगा। फिर वे उत्तर प्रदेश होते हुए देश की राजधानी दिल्ली आएंगे, जहां देश भर के गांधीजन उनके स्वागत के लिए इकट्ठे होंगे और इस पहल को राष्ट्रव्यापी बनाने के लिए एक रणनीति को अंजाम देंगे। दिल्ली से निकल कर हरियाणा पंजाब के विभिन्न क्षेत्रों में पड़ाव डालते हुए कश्मीर तक जाएंगे। शांति और सद्भावना के लिए निकले साइकिल यात्रियों का जगह-जगह स्वागत किया जा रहा है और स्वागत करने वालों में विभिन्न स्कूल-कालेजों के विद्यार्थियों सहित गांधी विचार की संस्थाओं के लोग आगे आ रहे हैं। यात्रा के हरेक पड़ाव पर सभा-संगोष्ठियों का आयोजन होता है और इसमें भारी संख्या में नगरवासी भाग ले रहे हैं।

यात्रा के मकसद को उजागर करते हुए राधा भट्ट का कहना कि यह यात्रा यों ही नहीं निकली है। देश और दुनिया में बढ़ती हिंसा और नफरत की आग को बुझाने के लिए अब पहल जरूरी है। यह काम केवल बहस से संभव नहीं है। उन्होंने बताया कि चार साल पहले कोकराझार में बड़े पैमाने पर नस्लीय हिंसा हुई थी। जिसमें 114 लोग मारे गए थे। चार लाख से ज्यादा लोग बेघर होकर शरणार्थी शिविरों में पनाह लेने को मजबूर हुए थे। हजारों घर जला दिए गए थे। ऐसे समय में इस हिंसाग्रस्त क्षेत्र में बगैर सरकारी सुरक्षा लिए आहत लोगों तक उन्होंने अपने साथियों के साथ पहुंचने की हिम्मत दिखाई थी। दो कौमों के बीच जल रही बदले की आग से पूरा असम तनाव में था।

राधा भट्ट ने बताया कि तब उन्होंने थोड़े से लोगों के साथ ‘असम शांति यात्रा’ शुरू की थी। जिसका हिंसाग्रस्त क्षेत्र के लोगों नेभरपूर स्वागत और समर्थन किया। साथ ही यह स्वीकार भी किया कि वे आपस में कभी भी खून-खराबा नहीं करना चाहते। दूसरे लोग अपने निहित स्वार्थों के लिए हमें आपस में लड़ा देते हैं। लोगों की इस अभिव्यक्ति से गांधीजनों को शांति और सद्भावना का माहौल बनाने की उम्मीद जगी और उन्होंने शांति और सद्भावना के लिए विभिन्न गांवों में शिविरों और सभाओं का सिलसिला तेज किया। इससे कौमों के बीच आ गई दूरियों को पाटने में मदद मिली।

युवा एकजुट हुए और लोगों की सक्रिय भागीदारी से ‘गांधी शांति संघ’ नाम का एक संगठन उभर कर सामने आ गया। अपने प्रयासों से निकले इस नतीजे के बाद गांधीजनों को लगा कि कोकराझार जैसे क्षेत्र में हिंसा से मुक्ति के लिए लोग तैयार हो सकते हैं तो देश क्यों नहीं। यही अलख जगाने के लिए कोकराझार और इसके आसपास के सात अन्य जिलों के युवा साइकिल लेकर यात्रा पर निकल पड़े हैं। गांधीजनों के प्रयास का आलम यह हुआ कि जब साइकिल यात्रा के लिए बोडोलैंड और उसके आसपास के जिलों के युवाओं से अपील की गई तो शिरकत के लिए सैकड़ों युवा आगे बढ़ कर आ गए।

लेकिन आयोजकों के पास न्यूनतम संसाधन है इसलिए उनमें से केवल पच्चीस का ही चयन किया गया, जो बारिश और आंधी-तूफान का मुकाबला करते हुए अपनी मंजिल की ओर लगातार बढ़ते जा रहे हैं। हर पड़ाव पर साइकिल यात्री देश के आमजनों सहित विभिन्न धर्मों, संप्रदायों पंथों, जातियों और राजनेताओं और उनके दलों से अपील कर रहे हैं कि वे देश में भेदभाव मुक्त समानता, सद्भावना, मैत्रीभाव और एकता का वातावरण बनाएं।

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