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मुश्किलों ने मानी हार, खुद को जब आजमाया, जमाने को वजूद दिखाया

खेलों में हरियाणा की लड़कियों की ताकत और इच्छा शक्ति का लोहा तो पूरा देश मानता है। कुश्ती में लड़कियों में गीता फोगाट, बबीता फोगाट, विनेश फोगाट की कामयाबी सामने है। इसमें उनके पिता महावीर फोगाट का योगदान हर कोई जानता है लेकिन कुछ ऐसी भी लड़कियां हैं जो ऐसे किसी संबल के बिना आसमां चूम लेती हैं। ऐसी ही एक महिला पर्वतारोही हैं अनीता कुंडु। उन्होंने एवरेस्ट को फतह किया है, वह भी नेपाल और चीन के हिस्से में जाकर। यहां कि वे तीन चोटियां चूम चुकी हैं और अब उनका इरादा दुनिया की पांच और ऊंची चोटियों को फतह करने का है।

Author Published on: August 30, 2018 3:09 AM
महिला पर्वतारोही हैं अनीता कुंडु।

सुमन केशव सिंह

तीस साल की अनीता कुंडू का मानना है कि वे उन लोगों का एहसान मानती हैं कि जिन्होंने उन्हें नीचा दिखाया। इन्हीं की वजह से वे आज ऊंचाइयों पर हैं। उनका कहना हैै कि हरियाणा के समाज का नजरिया लड़कों और लड़कियों को लेकर आज भी नहीं बदल पाया है। अक्सर ये समाज लड़कियों पर बंदिशें लगाता है लेकिन लड़कों की उन्हीं गलतियों पर मौन रहता है।

…जिनके सपने चारदीवारी में दम तोड़ते हैं
हिसार निवासी अनीता कुंडू कहती हैं कि उनका सपना दुनिया की पांच और ऊंची चोटियों पर भारत का परचम फहराना है। वे कहती हैं कि पर्वतारोहण का उनका हर अभियान सफल होने के बाद देश और हरियाणा की उन लड़कियों को समर्पित है जिनके सपने अक्सर घरों की चारदीवारी में दमतोड़ देते हैं। उन्होंने बताया कि अभी सेवेन समिट्स के तहत उन्होंने केवल तीन चोटियों (एवरेस्ट) पर भारत का परचम फहराया है। सफर के बाकी हिस्से में वे दुनिया की पांच ऊंची चोटियों पर चढ़ाई करेंगी। इस अभियान के लिए वे इंडोनेशिया, अलास्का, यूरोप के अलबुरुश, दक्षिण अफ्रीका के कीली मंजारो, मॉन्ट ब्लेंस, देनाली आदि चोटियां नापेंगी। अनीता कहती हैं कि अभी वे हरियाणा पुलिस में सब इंस्पेक्टर हैं।

अनीता के मुताबिक आज उनके समाज को उन पर नाज है। उन्हें मान सम्मान मिल रहा है, लेकिन शुरुआत में यह स्थिति नहीं थी। उनके पिता का सपना ही था जिसे उन्होंने साकार करने की अपने जिद को जिंदा रखा। पिता दिवंगत ईश्वर सिंह अब इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन जब मैं 12 साल की थी तब उन्होंने एक सपना देखा था जो आज भी उनकी प्रेरणा से जिंदा है। पिता की मौत जब हुई थी तब वे (अनीता) 12 साल की थीं। वे चाहते थे कि मैं मुक्केबाज बनूंं लेकिन उनके निधन के बाद इस सपने की हत्या के लिए मेरे ही आस पास का समाज खड़ा हो गया था। वे मेरे अपने ही थे, जिन्होंने मेरी शादी की बात 13 साल की उम्र में शुरू कर दी। अनीता कहती हैं कि मेरी शादी भी हो जाती लेकिन मैंने विरोध किया। अनीता कहती है कि मेरे समाज ने उस वक्त एक तरह से मेरा बहिष्कार कर दिया लेकिन मैं अपनी मां को समझाने में सफल हुई। उन्हें यह भरोसा दिलाया कि मैं लड़कों की तरह परिवार संभालूंगी और पढ़ाई भी करूंगी।

ये सुखद अनुभूति है
अनीता कहती हैं कि मैंने खेत जोते हैं, हल चलाया है, बैलों को हांका है, उनका चारा काटा है, फसल काटी है। गाय पालने से लेकर गोबर उठाने और दूध दूहकर बेचने तक का काम किया है। अनीता कहती हैं कि पिता की मौत के बाद तीन बहन और छोटा भाई वाला हमारा परिवार आर्थिक रूप से इतना कमजोर हो चुका था कि कई बार भूखे भी रात बीती है। वह कहती हैं कि जैसे-तैसे स्कूल की पढ़ाई हुई। चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। विश्वविद्यालय बड़ा था। यहां गायों के लिए अच्छा चारा होता था। सुबह पहले मैं यहां से चारा काटती थी फिर गायों को देकर कॉलेज आती थी। मेरे कॉलेज में डॉक्टर, इंजीनियरों के बच्चे पढ़ते थे। वे अक्सर जब मुझे सिर पर चारा उठाए देख लेते तो सवाल भी करते थे लेकिन आज ये ही सवाल मेरी तारीफ में करते हैं। ये सुखद अनुभूति है।

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