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छह बरस में बढ़ाई 200 फीसद फीस!

सरकार द्वारा विज्ञापनों के माध्यम से निजी स्कूलों पर लगाम लगाने के किए गए बड़े-बड़े दावों के बावजूद डीपीएस मथुरा रोड में पढ़ने वाले बच्चों के अभिभावकों को राहत नहीं।

Author नई दिल्ली | May 6, 2016 3:13 AM
डीपीएस मथुरा रोड

सरकार द्वारा विज्ञापनों के माध्यम से निजी स्कूलों पर लगाम लगाने के किए गए बड़े-बड़े दावों के बावजूद डीपीएस मथुरा रोड में पढ़ने वाले बच्चों के अभिभावकों को राहत नहीं। स्कूल की बढ़ाई फीस को लेकर गुरुवार को अभिभावकों को स्कूल के सामने शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना पड़ा। अभिभावकों ने कहा कि अगर आगे भी उन्हें राहत नहीं मिली तो वे कानूनी रास्ता अपनाने पर विचार करेंगे। अभिभावकों के अनुसार स्कूल ने पिछले छह सालों में लगभग दो सौ फीसद फीस बढ़ाई है। अभिभावक संघ का मानना है कि सरकार को सभी स्कूलों के लिए एकसमान सर्कुलर निकालना चाहिए और उसकी निगरानी होनी चाहिए।

अभिभावकों का आरोप है कि हाई कोर्ट के 19 जनवरी 2016 के आदेश के बावजूद डीपीएस, मथुरा रोड ने शिक्षा निदेशालय की मंजूरी के बिना स्कूल फीस अप्रैल से 15-20 फीसद बढ़ा दी। एक अभिभावक मोनिका सक्सेना ने बताया कि हाई कोर्ट के अन्य आदेश के अनुसार स्कूल को पहले अपने अतिरिक्त फंड का उपयोग करना जरूरी है जिसके बाद ही वह फीस बढ़ोतरी के माध्यम से फंड इकट्ठा कर सकते हैं। अभिभावकों के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया से मिलने के बाद शिक्षा निदेशालय (डीओई) द्वारा स्कूल को 16 अप्रैल को नोटिस भेजा गया था, लेकिन अभी तक कोई ठोस नतीजा नहीं निकला है। अभिभावक इस संबंध में 28 अप्रैल को भी मनीष सिसोदिया से मिले।

एक अन्य अभिभावक, जिनकी दो बेटियां डीपीएस, मथुरा रोड में पढ़ती हैं, ने कहा, ‘मेरी एक बेटी की फीस में 17 फीसद और दूसरी की फीस में 23 फीसद की बढ़ोतरी है, जिसका मतलब है सालाना हमारे पॉकेट पर 60-70 हजार का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा’। वहीं अपनी तीन बेटियों को डीपीएस, मथुरा रोड में पढ़ा रहे मो. अशरफ ने कहा, ‘एक तो ओर हर तरफ बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ का नारा लगाया जा रहा है, लेकिन हम कैसे पढाएं, स्कूल की बढ़ी हुई फीस ने हमारे घर का बजट बढ़ा दिया है’। अशरफ ने कहा कि गुरुवार के शांतिपूर्ण प्रदर्शन के बावजूद स्कूल प्रिंसिपल की ओर से सकारात्मक संकेत नहीं है। अभिभावकों ने कोई रास्ता नहीं निकलने की दशा में कोर्ट का दरवाजा खटखटाने का मन बना लिया है।

अशरफ ने कहा कि स्कूल शैक्षणिक गतिविधि के आधार पर आयकर छूट से करोड़ों का लाभ लेते हैं, फिर वे अभिभावकों के साथ इस तरह की ज्यादती कैसे कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि शिक्षा निदेशालय की मंजूरी के बाद सरकारी जमीन पर बने स्कूल 10 फीसद तक फीस बढ़ोतरी कर सकते हैं, लेकिन वह भी न्यायोचित नहीं है क्योंकि स्कूल न लाभ, न हानि के आधार पर चलाए जाते हैं। अभिभावकों के अनुसार डीपीएस, मथुरा रोड ने पिछले छह सालों में 209 फीसद की बढ़ोतरी की है। एक बच्चा जिसने 2008-09 में प्री-स्कूल में 38,700 रुपए सालाना फीस के साथ दाखिला लिया वह अब 2016-17 में सातवीं कक्षा के लिए 1,25,570 रुपए सालाना फीस भरने पर मजबूर है। डीपीएस, मथुरा रोड ने 2011-12 में स्कूल फीस में 40 फीसद और 2012-13 में 32 फीसद बढ़ोतरी की थी।

अखिल भारतीय अभिभावक संघ के अध्यक्ष अशोक अग्रवाल का कहना है कि निजी स्कूलों द्वारा वसूले जा रहे फीस का 50 फीसद हिस्सा न्यायोचित नहीं है। उन्होंने कहा कि स्कूलों की प्रबंधन समिति में 50 फीसद अभिभावक होने चाहिए। हालांकि उन्होंने आरोप लगाया कि प्रबंधन कुछ अभिभावकों को अपने पक्ष में करने में कामयाब रहता है। अभिभावक संघ के सुमित वोहरा ने सरकार की कार्यप्रणाली पर प्रश्न उठाते हुए कहा कि सरकार अभिभावक समूहों की तो सुनवाई कर रही है, लेकिन कई अभिभावक अकेले होने की वजह से आवाज नहीं उठा पा रहे। उन्होंने कहा कि बेहतर हो कि एक कॉमन सर्कुलर जारी किया जाए और एक ऐसी व्यवस्था हो जहां अकेला अभिभावक भी अपनी पहचान उजागर किए बिना शिकायत सरकार तक पहुंचा सके और उस पर कार्रवाई हो। आखिर क्या वजह है कि कोर्ट के आदेश और सरकार की सख्ती की मंशा जाहिर करने के बावजूद डीपीएस, मथुरा रोड जैसे उदाहरण सामने आ रहे हैं?

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