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आत्महत्या की खेती: पंजाब के समाज और सत्ता पर सवाल

‘दब के बाह ते रज्ज के खा’। इस पंजाबी कहावत का मतलब है कि खेत में दबाकर जोत और जमकर खा। यह हरित क्रांति वाले उस पंजाब की कहावत है जहां पिछले ढाई दशक में 20 हजार से अधिक किसानों ने आत्महत्याएं की हैं।
प्रतीकात्मक तस्वीर

‘दब के बाह ते रज्ज के खा’। इस पंजाबी कहावत का मतलब है कि खेत में दबाकर जोत और जमकर खा। यह हरित क्रांति वाले उस पंजाब की कहावत है जहां पिछले ढाई दशक में 20 हजार से अधिक किसानों ने आत्महत्याएं की हैं। हाल के दिनों में देश के विभिन्न इलाकों में उभरे किसान आंदोलनों ने सत्ता से लेकर समाज तक की आंखें खोल दी हैं। किसानों की कर्मभूमि रहा पंजाब आज उनकी मरनभूमि बन रहा है। पंजाब और हरियाणा के क्षेत्र में किसानों पर काम करने वाले और ‘आत्महत्या की खेती’ जैसी शोधपरक किताबों के लेखक राजकुमार भारद्वाज ने हाल में प्रकाशित अपनी किताब ‘पंजाब का समाज और सत्ता : निरंतरता और बदलाव’ में कर्ज में डूबे पंजाब के किसानों की जमीनी हालत बयां की है।

पंजाब में किसानों की आत्महत्या के बरक्स पूंजी, श्रम और उत्पादन के बदले ढांचे पर सवाल खड़ा हुआ है जो किसानों और खेतिहर मजदूरों के शोषण का बड़ा औजार बना। पंजाब और हरियाणा के संदर्भ में बात करें तो पहले सिर्फ आढ़ती होता था जो बनिया समुदाय का होता था। कहीं भी जट आढ़ती नहीं देखा जाता था। लेकिन खेत और बाजार के बीच बिचौलिए के कारोबार में जाटों का भी प्रवेश हुआ। भू-मालिकों ने आढ़तियों के कारोबार पर कब्जा कर पूरी तरह से खेती पर कब्जा कर लिया। पारंपरिक आढ़ती कर्ज पर ब्याज तो बढ़ा देते थे, लेकिन जमीन पर कब्जा नहीं करते थे। वे बेटी की शादी और अन्य सामाजिक रीति-रिवाजों के लिए भी कर्ज दे देते थे। लेकिन अब पूंजी, श्रम और जमीन सब पर भू-मालिकों का कब्जा है। कर्ज से लेकर ट्रैक्टर, कीटनाशकों, खाद व बीज की दुकानों पर एक ही वर्ग का कब्जा बढ़ गया, जिससे किसानों की जकड़न और बढ़ी।

कर्ज में डूबे किसानों की आत्महत्या के पीछे खेती का बाजारीकरण भी अहम कारण है। सरकार बीटी कॉटन सहित अन्य जीन संवर्द्धित फसलों को लेकर तो आई लेकिन जिन किसानों ने अपनी खेती-किसानी को इसके हिसाब से ढाला सरकार ने उन्हें बाजार मुहैया नहीं करवाया। ढांचागत बदलाव किए बिना किसानों को बाजार के हवाले कर दिया गया। बाजार का मकसद किसी का कल्याण नहीं सिर्फ मुनाफा होता है। सरकारों ने किसानों के कल्याण से आंखें मूंदे रखीं लेकिन बाजार ने अपना काम चालू रखा।

जिस पंजाब को हम दुनिया के सामने हरित क्रांति के एक मॉडल के रूप में पेश करते हैं, उसके छोटे-बड़े शहरों में परचून की दुकानों, मंडियों में अनाज की आढ़तों और आटा चक्कियों पर बोर्ड लगे हैं, ‘यहां मध्यप्रदेश का गेहूं और आटा मिलता है’। और यह आटा और गेहूं पंजाब के आटे और गेहूं के मुकाबले डेढ़ से दो गुना महंगे भाव पर मिलते हैं। विडंबना है कि राज्य में दो तिहाई आत्महत्याएं उन्हीं जिलों में हुई हैं जहां कीटनाशकों और रासायनिक खादों का अधिक इस्तेमाल होता है। पंजाब के किसानों के बीच काम करने वाले उमेंद्र दत्त के हवाले से किताब में कहा गया है, ‘पंजाब आज एक मरती हुई सभ्यता का नाम है’।

अकाली नेता प्रकाश सिंह बादल और कांग्रेस नेता कैप्टन अमरिंदर सिंह का क्षेत्र मालावा किसान आत्महत्याओं के लिए दुनिया भर में बदनाम है। संगरूर जिले के एक गांव में 1982 से 2010 तक लगभग सात दर्जन किसान या खेतिहर मजदूरों ने आत्महत्या की। पिछले ढाई दशक में पंजाब के 20 हजार से अधिक किसान आत्महत्या कर चुके हैं। पंजाब कृषि विश्वविद्यालय का अध्ययन कहता है कि पंजाब में आत्महत्या करने वाले किसानों और खेतिहर मजदूर परिवार की सैकड़ों महिलाएं अपने पोते-पोतियों और नातियों को पाल रही हैं। मालवा की कपास पट्टी का यह रुझान है कि महिलाएं किसान आंदोलनों से जुड़ रही हैं। संगरूर के दर्जनों गांवों के अलावा मोगा के गांव हिम्मतपुरा, बठिंडा से गिद्दड़बाहा, मोड़ चढ़तसिंह, खोखर, लहराबेगा गांवों की महिलाएं किसान आंदोलनों में कूद पड़ी हैं।

चंडीगढ़ के इंस्टिट्यूट आॅफ डेवलपमेंट कम्युनिकेशन के प्रोफेसर एचएस शेरगिल द्वारा किए गए एक अध्ययन के मुताबिक पंजाब के किसानों पर 30,149.07 रुपए का कर्ज है। पंजाब के हर क्षेत्र पर 28,942 रुपए का कर्ज है। हर किसान के घर पर 3.05 लाख रुपए का कर्ज है। पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के अध्ययन के मुताबिक, पंजाब में अकेले आढ़तियों ने पिछले दो दशक में 6,427.27 करोड़ रुपए कमाए हैं। साल 2006 से 2008 के बीच बठिंडा और संगरूर में 1133 खेतिहर मजदूर आत्महत्या कर चुके हैं। ज्यादातर किसानों के पास जमीन की जोतें नहीं हैं। ढाई सौ किसानों ने 48 हजार रुपए से भी कम कर्ज के कारण आत्महत्या की है। खेतिहर मजदूर परिवारों की प्रति व्यक्ति आय दस रुपए से भी कम है।

राष्टÑीय सैंपल सर्वे के आंकड़ों के मुताबिक, 68 फीसद खेतिहर मजदूरों के पास जमीन नहीं है। पंजाब कृषि आयोग के आंकड़े कहते हैं कि 68 फीसद खेतिहर मजदूर परिवारों की प्रति व्यक्ति आय मात्र दस रुपए है। 54.49 फीसद खेतिहर मजदूरों को रोज की जरूरतों के लिए कर्ज लेना पड़ता है। ज्यादातर भूमालिकों और किराना मजदूरों से कर्ज लेते हैं जो उन्हें लंबे समय तक फंसाए रखते हैं। कर्ज की फांस के कारण संगरूर, मानसा, बठिंडा और फिरोजपुर में बड़ी संख्या में मजदूरों ने आत्महत्याएं की हैं। साल भर तक एक खास जमींदार के यहां काम करने वाले मजदूरों में चार फीसद बाल मजदूर हैं।
पंजाब किसान आयोग अपनी सिफारिशों में कह चुका है कि खेतिहर मजदूरों की समस्याओं से निपटने के लिए ग्रामीण मजदूर आयोग बनाना चाहिए। पिछले सालों में औद्योगिक विकास की गति कम होने से मजदूरों को खेती के अलावा निर्माण क्षेत्रों में काम नहीं मिल पाता है। लुधियाना, जलंधर, फगवाड़ा जैसे शहरों में विकास कार्यों के कारण उन्हें सालों भर काम मिल जाता था जो अब नहीं मिल रहा। ग्रामीण क्षेत्रों में गैर कृषि धंधे तो है ही नहीं इसलिए खेतिहर मजदूरों की हालत और खराब हो गई है।

पंजाब की खेती-किसानी पर उठे सवालों पर राजकुमार भारद्वाज नेहरुवादी ढांचे के बरक्स समझने की कोशिश करते हुए किताब में कहते हैं, ‘पंजाब से जितने सवाल निकले हैं इनका समाधान नेहरु मॉडल में कहीं नहीं दिखता। भाखड़ा जिसे आधुनिक भारत का मंदिर कहा गया था, उसने किसानों को कथित विकास के साथ आत्महत्याओं का श्राप भी दिया है’। भूमि अधिग्रहण, अनियोजित शहरी विकास ने यहां के सांस्कृतिक ताने-बाने को तार-तार कर दिया। पंजाब अभी इसके लिए तैयार नहीं था।

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