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कृषि बिलों के विरोध में एनडीए से अलग हुआ एक और साथी, कहा- किसान विरोधियों के साथ हम नहीं

पंजाब से भाजपा के पूर्व सांसद हरिंदर सिंह खालसा ने भी किसानों के समर्थन में आज पार्टी से इस्तीफा दे दिया।

Rashtriya Loktantrik Party RLPराष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (RLP) प्रमुख हनुमान बेनीवाल। (फोटो-बेनीवाल फेसबुक)

दिल्ली की सीमाओं और अन्य जगह कृषि बिलों के खिलाफ जारी किसान प्रदर्शन के बीच भाजपा नीत एनडीए गठबंधन को झटका लगा है। राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (RLP) प्रमुख हनुमान बेनीवाल ने शनिवार को एनडीए से अलग होने की घोषणा कर दी। उन्होंने राजस्थान में शहाजहांपुर-खेड़ा बॉर्डर पर प्रदर्शनकारी किसानों को संबोधित करते हुए कहा कि हम उनके साथ नहीं रह सकते जो किसानों के खिलाफ हैं।

राजस्थान के नागौर से लोकसभा सांसद बेनीवाल ने 2018 में राज्य विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा छोड़ अपनी पार्टी का गठन किया था। 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले उन्होंने भाजपा से गठबंधन कर लिया। हालांकि उन्होंने एनडीए से इतर केंद्र के कृषि बिलों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे किसानों को अपना समर्थन दिया और आज गठबंधन से बाहर हो गए। आरएलपी से पहले किसानों के मुद्दे पर अकाली दल एनडीए से अलग हो चुकी है। इससे पहले पिछले साल शिवसेना एनडीए से बाहर हो गई थी।

एक चैनल से बेनीवाल ने कहा कि मैंने लोकसभा समितियों से इस्तीफा दिया। आज इनडीए भी छोड़ दी, इसके बाद भी किसानों को जरुरत पड़ेगी तो लोकसभा सदस्यता से भी इस्तीफा दे दूंगा। उन्होंने दावा किया किसान आंदोलन पर लाखों लोग उनके साथा हैं। सैकड़ों किमी से लोग आए हैं। उन्होंने कहा कि किसान आंदोलनों में उनके समर्थक काम कर रहे हैं और इससे वो कोई फायदा नहीं उठाना चाहते। उन्होंने कहा कि अमित शाह और पीयूष गोयल से बात की मगर बात नहीं बनी।

बेनीवाल के एनडीए से अलग होने पर भाजपा ने प्रतिक्रिया दी है। पार्टी प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने कहा ने कहा कि वो कितने भोलेपन से बात कर रहे थे। कृषि बिलों की कॉपी पढ़ने में उन्हें छह महीने लग गए। उन्होंने पीएम मोदी की फोटो लगाकर लोगों से वोट मांगा था। त्रिवेदी ने कहा कि स्थानीय चुनाव में उनकी पार्टी का प्रदर्शन नागौर में बहुत निराशाजनक रहा था।

बता दें कि पंजाब से भाजपा के पूर्व सांसद हरिंदर सिंह खालसा ने किसानों के समर्थन में आज पार्टी से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने कहा कि किसानों, उनकी पत्नियों और बच्चों की पीड़ा की प्रति सरकार और पार्टी नेताओं की असंवेदनशीलता के विरोध में वो पार्टी से छोड़ रहे हैं। बता दें कि पंजाब, हरियाणा, राजस्थान सहित अन्य राज्यों के किसान केंद्र के तीन कृषि बिलों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। अन्नदाताओं ने इन बिलों को कृषि और किसान विरोधी बताया है। नवंबर की 26 तारीख से किसानों का प्रदर्शन जारी है।

इस बीच सरकार और किसानों के बीच कई चरण की बातचीत हो चुकी है मगर कोई हल नहीं निकला। हालांकि शनिवार को कृषि कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे किसान संगठनों ने सरकार के साथ बातचीत फिर से शुरू करने का फैसला किया और अगले दौर की वार्ता के लिए 29 दिसंबर की तारीख का प्रस्ताव दिया है। किसान नेता राकेश टिकैत ने यह जानकारी दी।

कृषि कानूनों के खिलाफ दिल्ली की विभिन्न सीमाओं पर प्रदर्शन कर रहे 40 किसान यूनियनों के मुख्य संगठन संयुक्त किसान मोर्चा की एक बैठक में यह फैसला किया गया। भारतीय किसान यूनियन के वरिष्ठ नेता टिकैत ने हालांकि कहा कि तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने के लिए तौर-तरीके और न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के लिए गारंटी का मुद्दा सरकार के साथ बातचीत के एजेंडे में शामिल होना चाहिए।

टिकैत ने कहा, ‘हमने 29 दिसंबर को सरकार के साथ वार्ता करने का फैसला किया है।’ दिल्ली की तीन सीमाओं – सिंघु, टीकरी और गाजीपुर में हजारों किसान लगभग एक महीने से डेरा डाले हुए हैं। वे सितंबर में लागू तीन कृषि कानूनों को पूरी तरह से रद्द करने और एमएसपी पर कानूनी गारंटी देने की मांग कर रहे हैं।

सरकार ने इन नए कृषि कानूनों को बड़े सुधार के रूप में पेश किया है, जिसका मकसद किसानों की मदद करना है। वहीं, प्रदर्शनकारी किसानों की आशंका है कि इससे मंडी और न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की व्यवस्था खत्म हो जाएगी, जिससे उन्हें बड़े कॉरपोरेटों की दया पर निर्भर रहना पड़ेगा। (एजेंसी इनपुट)

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