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25 फीसदी तक बढ़ सकता है दिल्ली मेट्रो का किराया, लेकिन चिल्लर से मिलेगा छुटकारा

मेट्रो में नियमित यात्रा करने वाले यात्रियों से मेट्रो किराया निर्धारण के संबंध में पूछा गया तो मयूर विहार फेज-1 में रहने वाले आइटी प्रोफेशनल संजीव कुमार का कहना था कि वास्तव में मेट्रो खर्चीली प्रणाली है और हर साल इसके विस्तार, सुविधा और मरम्मत में भारी खर्च उठाना पड़ता है।

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दिल्ली मेट्रो किराया दरों में बदलाव की कवायद में जुटी है। हालांकि किराया निर्धारण के लिए बनी समति कम से कम तीन महीने बाद अपनी रिपोर्ट सामने लाएगी। लेकिन सूत्रों के हवाले से पता चला है कि तमाम राय-प्रस्तावों के बाद मेट्रो का किराया बढ़ना ही है। साथ ही इस बार कमेटी मेट्रो स्टेशनों पर चिल्लर की समस्या को खत्म करने के लिए भी कदम उठाएगी। बताया जा रहा है कि मेट्रो स्टेशनों से चिल्लर की समस्या दूर करने के लिए किराया ऐसा रखने की संभावना है जिसमें चिल्लर वापस नहीं करना पड़े। मेट्रो चिल्लर की समस्या से जूझती रही है। इसलिए इस चौथी किराया निर्धारण समिति के जरिए चिल्लर वापसी का भी हल होना माना जा रहा है। यानी कम से कम किराए को 8 से बढ़ाकर 10 रुपए या 15 रुपए तक किया जा सकता है और अधिकतम किराया 30 रुपए से बढ़ाकर 35 रुपए या 40 रुपए तक हो सकता है।

सूत्रों का कहना है कि मेट्रो किराए में 25 फीसद तक का इजाफा हो सकता है। मेट्रो के किराया निर्धारण के लिए तीन सदस्यीय कमेटी 2009 के बाद बनी है। इन सात सालों में मेट्रो का कुल घाटा करीब साढ़े तीन सौ फीसद, ऊर्जा लागत ढाई गुना, मरम्मत खर्च सौ फीसद, कर्ज मूल्य ह्रास में भी सौ से अधिक फीसद खर्च बढ़ा है। जबकि इतने सालों में घरेलू भत्तों में 18 से 120 फीसद की बढ़ोतरी हुई है।

मेट्रो में नियमित यात्रा करने वाले यात्रियों से मेट्रो किराया निर्धारण के संबंध में पूछा गया तो मयूर विहार फेज-1 में रहने वाले आइटी प्रोफेशनल संजीव कुमार का कहना था कि वास्तव में मेट्रो खर्चीली प्रणाली है और हर साल इसके विस्तार, सुविधा और मरम्मत में भारी खर्च उठाना पड़ता है। ऐसे में सात साल बाद मेट्रो किराए में बढ़ोतरी करती है तो कोई बड़ा सवाल नहीं होगा। लेकिन कितना करती है यह देखना होगा। अगर किराए में पांच रुपए तक भी बढ़ोतरी होती है तो लोग आराम से वहन कर लेंगे। सुमित लक्ष्मीनगर में सीए की पढ़ाई करते हैं। उनका कहना था कि मेट्रो में किराया बढ़ोतरी के साथ मेट्रो के फेरे भी बढ़ने चाहिए। अगर व्यस्त समय में मेट्रो के फेरे बढ़ जाते हैं तो लोगों को दो-चार रुपए देने में परेशानी नहीं है।

हालांकि, केंद्र सरकार की तरफ से बनी तीन सदस्यीय किराया निर्धारण समित किराए के तमाम पहलुओं पर काम कर रही है। तीन महीने के कम से कम समय के दौरान समिति लोगों की राय भी शामिल करेगी। साथ ही दिल्ली मेट्रो रेल कारपोरेशन को भी किराए पर अपना पक्ष देना है। लेकिन इन सभी राय-प्रस्तावों के बाद यही लगता है कि दिल्ली मेट्रो का किराया बढ़ेगा ही। क्योंकि मेट्रो की तरफ से कुल घाटे का फासला हर साल बहुत तेजी से बढ़ा है। इधर, मेट्रो को मरम्मत और वेतन में भी ज्यादा खर्च करना पड़ा है। इसलिए मेट्रो को आय के स्रोतों से आमदनी और खर्च के लिए पैसों की जरूरत के बीच सामंजस्य बैठा पाना मुश्किल पड़ रहा है।

दिल्ली मेट्रो के एक आंकड़े के मुताबिक, 2012-13 में जहां 7.94 करोड़ रुपए का कुल घाटा था, 2013-14 में बढ़कर 60.74 करोड़ रुपए हो गया और 2014-15 में यह आंकड़ा 353 फीसद बढ़कर 275.46 करोड़ रुपए तक पहुंच गया। वहीं कर्ज का मूलह्रास सहित मरम्मत में करीब 150 फीसद बढ़ोतरी, घरेलू भत्ते में करीब 18 से 120 फीसद बढ़ोतरी, आपरेशन अनुपात में करीब 55 से 74 फीसद बढ़ोतरी के साथ ऊर्जा में करीब 2.5 गुना लागत का बढ़ना बताया जा रहा है। ऐसे में दिल्ली मेट्रो रेल कारपोरेशन को लगातार बढ़ रहे घाटे की भरपाई करनी है और आगामी परियोजनाओं को पूरा करना बड़ा लक्ष्य है। जिस कारण डीएमआरसी ने शहरी विकास मंत्रालय से चौथे किराया निर्धारण कमेटी गठित करने का प्रस्ताव किया था। जो 30 मई को केंद्र सरकार की तरफ से निर्देश पर गठित कर दी गई।

सूत्रों के हवाले से इस बार किराया कम से कम 25 फीसद बढ़ना बताया जा रहा है। मेट्रो के पहले के किराया संबंधी आंकड़े के मुताबिक, 2002 में जब मेट्रो चलनी शुरू हुई थी उसके कुछ दिन बाद ही किराया तय करने की मांग सामने आई थी। 2002 में मेट्रो का अधिकतम किराया 4 से 7 रुपए तय था। इसके बाद पहली किराया निर्धारण समिति ने 2004 में रिपोर्ट दी जिसमें अधिकतम किराया 6 से 14 रुपए किया गया। दूसरी समति 2005 में बनी जिसमें अधिकतम किराया 6 से 22 रुपए तय हुआ था और तीसरी कमेटी 2009 में गठित हुई जिसमें अधिकतम किराया 8 से 30 रुपए तय हुआ था।

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