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विवाहेतर संबंध: स्वीकार्यता और अपराध, 1955 तक हिंदू पुरुष जितना चाहें कर सकते थे विवाह

सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ के ऐतिहासिक फैसले में न्यायमूर्ति नरीमन ने कहा कि इस प्रावधान का असल रूप तब सामने आता है जब पति की सहमति या सहयोग से यदि कोई अन्य व्यक्ति विवाहित महिला के साथ यौन संबंध बनाता है तो वह विवाहेतर संबंध नहीं है।

Author September 29, 2018 5:37 AM
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (एक्सप्रेस फाइल फोटो)

विवाहेतर संबंधों से जुड़े दंडात्मक कानूनों को अब सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक घोषित कर दिया है। हालांकि भारत में विवाहेतर संबंधों को आपराधिक कृत्य की श्रेणी में रखने संबंधी पुराकालीन कानून के उद्भव और विकास की एक लंबी शृंखला रही है। सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ के ऐतिहासिक फैसले में न्यायमूर्ति नरीमन ने कहा कि इस प्रावधान का असल रूप तब सामने आता है जब पति की सहमति या सहयोग से यदि कोई अन्य व्यक्ति विवाहित महिला के साथ यौन संबंध बनाता है तो वह विवाहेतर संबंध नहीं है। पीठ में शामिल न्यायमूर्ति आरएफ. नरीमन और न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा ने अपने-अपने फैसलों में इसका जिक्र किया है कि आखिरकार विवाहेतर संबंध कालांतर में कैसे अपराध में तब्दील हो गया।

दोनों ही न्यायाधीशों ने 1860 के कानून के तहत भारतीय दंड संहिता की धारा 497 में शामिल इस पुराकालीन कानून को निरस्त करने का फैसला दिया। नरीमन ने कहा कि 1955 तक हिंदू जितनी महिलाओं से चाहें विवाह कर सकते थे। उन्होंने कहा कि 1860 में जब दंड संहिता लागू हुई, उस वक्त देश की बहुसंख्यक हिंदुओं के लिए तलाक का कोई कानून नहीं था क्योंकि विवाह को संस्कार का हिस्सा समझा जाता था।

न्यायमूर्ति नरीमन ने अपने फैसले में कहा कि ऐसी स्थिति में यह समझा पाना बहुत मुश्किल नहीं है कि एक विवाहित पुरुष द्वारा अविवाहित महिला के साथ यौन संबंध अपराध की श्रेणी में नहीं था। उस वक्त तलाक के संबंध में कोई कानून ही नहीं था, ऐसे में विवाहेतर संबंधों को तलाक का आधार बनाना संभव नहीं था। उस दौरान हिंदू पुरुष अनके महिलाओं से विवाह कर सकते थे, ऐसे में अविवाहित महिला के साथ यौन संबंध अपराध नहीं था, क्योंकि भविष्य में दोनों के विवाह करने की संभावना बनी रहती थी। उन्होंने कहा कि हिंदू कोड आने के साथ ही 1955-56 के बाद एक हिंदू व्यक्ति सिर्फ एक पत्नी से विवाह कर सकता था और हिंदू कानून में परस्त्रीगमन को तलाक का एक आधार बनाया गया।

पीठ में शामिल एकमात्र महिला न्यायाधीश न्यायमूर्ति मल्होत्रा ने भी अपने फैसले में कहा कि भारत में मौजूद भारतीय-ब्राह्मण परंपरा के तहत महिलाओं के सतीत्व को उनका सबसे बड़ा धन माना जाता था। पुरुषों की रक्त की पवित्रता बनाए रखने के लिए महिलाओं के सतीत्व की कड़ाई से सुरक्षा की जाती थी। मल्होत्रा ने कहा कि इसका मकसद सिर्फ महिलाओं के शरीर की पवित्रता की सुरक्षा करना नहीं था, बल्कि यह सुनिश्चित करना था कि महिलाओं की यौन इच्छा पर पतियों का नियंत्रण बना रहे। न्यायमूर्ति मल्होत्रा ने अपने फैसले में इस तथ्य का जिक्र किया कि 1837 में भारत के विधि आयोग द्वारा जारी भारतीय दंड संहिता के पहले मसौदे में परस्त्रीगमन को अपराध के रूप में शामिल नहीं किया गया था।

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