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विदेश मंत्री जयशंकर के सामने चीन और मध्य पूर्व की जटिल चुनौती

विदेश मंत्रालय का काम संभालने के बाद जयशंकर ने प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा निर्धारित पांच प्रमुख एजंडों पर कामकाज की रणनीति बनानी शुरू कर दी है। अमेरिका, चीन और अरब देशों को केंद्र में रखकर तैयार किए जा रहे एजंडे भारत की प्राथमिकता में हैं।

विदेश मंत्री सुब्रमण्यम जयशंकर। (फाइल फोटो)

विदेश मंत्री बनाए गए सुब्रमण्यम जयशंकर के सामने तात्कालिक चुनौती अमेरिका और ईरान के साथ रिश्तों का संतुलन बनाना और भारत के पड़ोसी देशों में चीन के बढ़ते प्रभाव से निपटने की है। विदेश मंत्रालय का काम संभालने के बाद जयशंकर ने प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा निर्धारित पांच प्रमुख एजंडों पर कामकाज की रणनीति बनानी शुरू कर दी है। अमेरिका, चीन और अरब देशों को केंद्र में रखकर तैयार किए जा रहे एजंडे भारत की प्राथमिकता में हैं।

जयशंकर ने जनवरी 2015 से लेकर जनवरी 2018 तक विदेश सचिव रहते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पहले कार्यकाल के दौरान उनकी विदेश नीति को आकार देने में अहम भूमिका निभाई थी, जिसके चलते प्रमुख देशों, खासकर अमेरिका और अरब देशों के साथ भारत के संबंध में महत्त्वपूर्ण प्रगति हुई। विदेश सचिव बनने से पहले वह 2013 से अमेरिका में भारत के राजदूत रहे। इस दौरान उन्होंने अमेरिकी प्रशासन और मोदी सरकार को करीब लाने में बड़ी भूमिका निभाई।

भारत सरकार जी-20 (20 प्रमुख देशों के समूह), शंघाई शिखर सम्मेलन (एससीओ), ब्रिक्स, इंडो-आसियान, भारत-अफ्रीका मंच जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर नेतृत्व वाली भूमिका निभाना चाहती है। इसके लिए नए विदेश मंत्री को इन सभी संगठनों में भारत के हितों के मद्देनजर नीतिगत योजनाओं पर काम करना होगा। पाकिस्तान के मामले में भारत के लिए अब भी यह चुनौती है कि किस तरह से आतंकवाद और बातचीत साथ-साथ न होने के अपने रुख पर कायम रहते हुए उससे रिश्तों को सामान्य बनाया जाए। इसके अलावा नेपाल, बांग्लादेश, म्यांमा जैसे मुल्कों से रिश्ते मजबूत करने की चुनौती है, जहां चीन का प्रभाव बढ़ रहा है। चीन के साथ भारत के कई अनसुलझे मसले हैं। नए विदेश मंत्री चीनी मामलों के विशेषज्ञ रहे हैं। चीन के साथ डोकलाम विवाद सुलझाने में एस जयशंकर की भूमिका अहम रही।

ईरान तेल संकट का सीधा असर भारत और खाड़ी देशों से रिश्तों पर पड़ने को है। मध्य पूर्व में करीब 80 लाख भारतीय रहते और काम करते हैं। भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से यह क्षेत्र महत्त्वपूर्ण है। इस क्षेत्र के देशों की आपसी वैमनस्यता और पाकिस्तान के साथ उनके रिश्तों के कारण वह क्षेत्र भारतीय राजनय के लिहाज से जटिल रहा है। अमेरिका के साथ भारत के संबंध मजबूत रहे हैं। लेकिन एच1बी वीजा और व्यापार के मोर्चे पर कई मसले हैं। ईरान तेल संकट से अमेरिका-भारत के संबंध प्रभावित हुए हैं। रूस के साथ भारत अब रक्षा, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष के क्षेत्र में अपने रिश्ते मजबूत करने में लगा है।

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