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कला संस्कृति: जानकी लीला की मनभावन पेशकश

कई मैथिली गीतों-पानी बिन परल अकाल, सुनत क्रंदन इंद्र राजा, चहुं ओर मंगल हो, सीता जनम भेलई धरती मुस्काइल हो, अंगने में बाजै बधईया, सुनयना रानी गोद खेलावैं, धन-धन भाग हमार, राजा विदेह के फुलवारी जाओ, चंद्रबदन अद्भुत किशोरी, रघुरैया धनुशिया तोड़ दियो रे, चुमावन हो ललना धीरे-धीरे, सखी बड़ी अचरज देखलौं के जरिए प्रस्तुति को पिरोया गया।

महोत्सव की शुरुआत नाट्य कला मंदिर की प्रस्तुति राम रावण काव्यम से हुई।

राजधानी दिल्ली में सांस्कृतिक गतिविधियों की धूम है। एक तरफ त्योहारों की रौनक है, दूसरी तरफ हर रोज सांस्कृतिक आयोजनों का सिलसिला चल रहा है। इसी क्रम में भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद् की ओर से चौथे अंतरराष्ट्रीय रामायण महोत्सव का आयोजन किया गया। इस महोत्सव का उद्घाटन विदेश राज्यमंत्री जनरल वीके सिंह ने किया। इस महोत्सव में भारत सहित श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल, मॉरीशस, थाइलैंड के कलाकारों की भागीदारी रही। महोत्सव का मुख्य आकर्षण नेपाल के कलाकारों की प्रस्तुति जानकी लीला रही।

रामायण महोत्सव की दूसरी शाम को नृत्य नाटिका जानकी लीला पेश की गई। इसे नेपाल की मिथिला नाट्यकला परिषद् के कलाकारों ने पेश किया। लोकनृत्य, कीर्तनिया, नौटंकी, जट-जटिन, बिदापद जैसी लोक विधाओं के प्रयोग से यह प्रस्तुति प्रभावकारी बन गई। रामचरितमानस के दोहे ‘सीताराम मनोहर जोड़ी’ से प्रस्तुति शुरू होती है। प्रस्तुति में जानकी जन्म से लेकर जानकी विवाह के दृश्यों को दर्शाया गया। नेपाल में सीता को पुत्री और बहन के रूप में माना जाता है। विवाह के बाद सीता दुखी रहीं और उनका जीवन त्रासदपूर्ण रहा, इसलिए वहां सीता को विवाह के पश्चात विदा नहीं किया जाता है। इसी पृष्ठभूमि को कलाकारों ने साकार किया। कई मैथिली गीतों-पानी बिन परल अकाल, सुनत क्रंदन इंद्र राजा, चहुं ओर मंगल हो, सीता जनम भेलई धरती मुस्काइल हो, अंगने में बाजै बधईया, सुनयना रानी गोद खेलावैं, धन-धन भाग हमार, राजा विदेह के फुलवारी जाओ, चंद्रबदन अद्भुत किशोरी, रघुरैया धनुशिया तोड़ दियो रे, चुमावन हो ललना धीरे-धीरे, सखी बड़ी अचरज देखलौं के जरिए प्रस्तुति को पिरोया गया। कलाकारों ने मनभावन नृत्य और अभिनय पेश किया। सुनील मलिक और ललित कामत ने सुरीला गायन और संगीत पेश किया। प्रमेश झा ने सूत्रधार की भूमिका को सहजता से निभाया।

इस संध्या की पहली प्रस्तुति भरतनाट्यम नृत्य संघ के कलाकारों की थी। मलेशिया के इन कलाकारों ने राम-सीता विवाह, कैकेई-मंथरा संवाद, राम वन गमन आदि प्रसंगों भरतनाट्यम नृत्य के जरिए दर्शाया। नव रस की परिकल्पना के ताने-बाने पर बुनी गई इस पेशकश से शुरू हुई। यह राग हमीर कल्याणी और मिश्रम में निबद्ध थी। सीता विवाह प्रसंग को रचना ‘सीता कल्याण वैभवम’ व ‘राम जय जय राम राम’ के माध्यम से चित्रित किया गया। वहीं कैकेई-मंथरा संवाद को वायलिन की द्रुत लय पर मोहक अंदाज में पेश किया। राम वन गमन के दृश्य के साथ उनके नृत्य का समापन मंगलम से हुआ। इसके लिए मंगलम रचना ‘श्रीरामचरितम मंगलम’ का चयन किया गया था।

रामायण महोत्सव की पहली संध्या में धृति नतर्नालय के कलाकारों ने समकालीन नृत्य पेश किया। उन्होंने सीता के माध्यम से औरत के जीवन को समकालीन परिदृश्य में प्रस्तुत किया। सीता के विवाह, वन गमन, रावण द्वारा अपहरण और फिर अग्नि परीक्षा के दृश्यों को प्रस्तुत किया। सीता की पवित्रता पर पहले राम और इसके बाद जनता ने प्रश्न उठाया। इन्हीं प्रसंगों को कलाकारों ने नृत्य नाटिका में निरुपित किया। प्रस्तुति के समापन में संदेश दिया गया कि आज की सीता कहती है कि उसे अपने सुख-दुख, संपत्ति-विपत्ति में साथ रखोगे, तभी तुम उसकी शक्तिसे परिचित हो पाओगे। इस प्रस्तुति में कई रचनाओं-तबे मानव जन्म कैनो, शक्तिस्वरूपपिणी जय सीता, आमार प्राणेर माझे क्षुधा आछे, जागो नारी बंदिश शिखा को शामिल किया गया था।

महोत्सव की शुरुआत नाट्य कला मंदिर की प्रस्तुति राम रावण काव्यम से हुई। रावण संहिता के रचनाकार रावण, जो चार वेदों और छह शास्त्रों का ज्ञाता था। उसके द्वारा शिव वंदना के दृश्य से नृत्य प्रस्तुति शुरू हुई। यह शिव प्रस्तुति थी। यह स्तुति रचना ‘नटेशम सुरेशम अनादिम अजेयम’ पर आधारित थी। मारीच वध, सीता हरण, जटायु मोक्ष, लंका दहन, राम सेतु निर्माण आदि प्रसंगों को भरनाट्यम नृत्य के जरिए दर्शाया गया। इस प्रस्तुति के दौरान पृष्ठभूमि को जीवंत करने के लिए डिजिटल फोटो का प्रयोग किया गया। कलाकारों की वेशभूषा और आभूषण बहुत मनोरम थे।

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