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पड़ताल: गवाहों को तोड़ा गया, पुलिस ने हत्या में इस्तेमाल हथियार पेश नहीं किए और इस तरह मुजफ्फरनगर दंगे में बरी हो गए 40 आरोपी

मुजफ्फनगर में साल 2013 में हुए दंगे में 65 लोग मारे गए थे। यूपी सरकार ने सांप्रदायिक हिंसा की इस घटना के दौरान हुई हत्या से जुड़े 10 मामले दर्ज किए थे।

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मुजफ्फरनगर दंगों के मामले में अदालत ने साल 2017 से 2019 के बीच हत्या के 10 मुकदमों में सभी आरोपियों को बरी कर दिया। इंडियन एक्सप्रेस की पड़ताल में सामने आया कि पुलिस ने अहम गवाहों के बयान दर्ज नहीं किए। इसके अतिरिक्त पुलिस की तरफ से हत्या में प्रयोग किए गए हथियार भी पेश नहीं किए गए।

कई गवाह अदालत में अपने बयान से मुकर गए। मुजफ्फरनगर में साल 2013 में हुए दंगे में कम से कम 65 लोग मारे गए थे। वास्तव में साल 2017 से मुजफ्फरनगर की अदालत ने 41 मामलों में फैसला सुनाया। इनमें से हत्या के सिर्फ एक मामले में फैसला आया। मुस्लिमों पर हमले के बाकी सभी मामलों में आरोपी बरी हो गए।

दंगे के सभी मामले अखिलेश यादव की सरकार में दर्ज किए गए। इन मामलों की सुनवाई अखिलेश सरकार के साथ ही भाजपा सरकार में भी हुई। इस साल 8 फरवरी को अदालत ने सात आरोपियों मुजम्मिल, मुजस्सिम, फुरकान, नदीम, जहांगीर, अफजल और इकबाल को उम्रकैद की सजा सुनाई।

इन लोगों पर 27 अगस्त 2013 को कावल गांव के गौरव और सचिन की हत्या का आरोप था। कहा जाता है कि इस हत्या के बाद ही दंगे भड़के थे। एक्सप्रेस ने 10 मामलों से जुड़े शिकायतकर्ताओं और गवाहों से बातचीत के साथ ही कोर्ट रिकॉर्ड और दस्तावेजों की पड़ताल की। इसमें सामने आया कि एक परिवार को जिंदा जला दिया गया।

वहीं एक के पिता की तलवार से हत्या कर दी गई। इस मामले में आरोपी 53 लोग खुलेआम घूम रहे हैं। इतना ही नहीं यह स्थिति गैंगरेप के 4 मामले और दंगों के अन्य 26 मामलों में भी देखने को मिली। वहीं यूपी सरकार का कहना है कि वह इन मामलों में अपील नहीं करेगी।

सरकारी वकील दुष्यंत त्यागी का कहना है, ‘ हम साल 2013 मुजफ्फरनगर दंगे मामले में कोई अपील नहीं करने जा रहे है। इन मामलों में सभी मुख्य गवाह अपने बयान से मुकर गए थे। इन मामलों में आरोपियों के खिलाफ आरोपपत्र गवाहों के बयान पर ही दर्ज किए गए थे।’

हत्या के 10 केस में ये बातें आईं सामने…
– शिकायत में 69 लोगों के नाम थे सिर्फ 24 पर मुकदमा चला। अन्य 45 लोगों पर मुकदमा चला लेकिन उनका नाम वास्तविक शिकायत में दर्ज नहीं था।
– सभी शिकायतों में हत्या में प्रयोग हथियार का जिक्र था लेकिन पुलिस सिर्फ 5 मामलों में ही सबूत बरामद कर पाई।
– असीमुद्दीन और हलीमा की हत्या के मामले में पुलिस ने सबूतों की बरामदगी के समय दो स्वतंत्र गवाहों के नाम दर्ज किए थे। दोनों गवाहों का कहना था कि उनकी मौजदूगी में कोई सबूत नहीं जुटाए गए। उन्होंने कहा कि पुलिस ने उन्हें खाली पेपर पर हस्ताक्षर करने को कहा।
– तितावी में तीन लोगों की हत्या में पुलिस ने पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर से क्रॉस एग्जामिन नहीं किया।
– असीमुद्दीन और हलीमा मामले में पुलिस ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट ही पेश नहीं की।
– हत्या के एक मामले में जरीफ ने कहा कि गंभीर रूप से घायल उसके पिता मरने से पहले अपना बयान दर्ज कराना चाहते थे लेकिन पुलिस ने उनके बयान दर्ज नहीं किए। पुलिस ने उन्हें अस्पताल ले जाने की बजाय घंटों इंतजार कराया। जरीफ ने कहा कि आरोपियों को बचाने के लिए अहम सबूतों को एकत्रित नहीं किया गया।

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