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जड़, जंगल और जमीन: गांवों से गुम हो रही बांस की खेती, अब संग्रहालयों में दिखेंगी बांस की लाठी, पालकी, चारपाई

बांस एक सामान्य पेड़ नहीं है, यह पूज्य वृक्ष है। इसकी डोली पालकी पर बैठकर हमारे घर में लक्ष्मी आई हैं, जननी आई हैं, मां आई हैं। भारत में प्राचीन काल से कई प्रकार की युद्ध कलाएं प्रचलित हैं। पुराने जमाने का सबसे प्रमुख अस्त्र बांस से बनी लाठी ही थी।

बांस की लाठी महात्मा गांधी हमेशा अपने साथ लेकर चलते थे (ऊपर बाएं), बांस की उपयोगी वस्तु (ऊपर दाएं), बांस की डलिया-भौंकी (ऊपर बीच में), बांस की कोठी (नीचे बाएं), बांस के पौधे (नीचे बीच में) और बांस का गट्ठर (नीचे दाएं)।

आत्म रक्षा से लेकर शासन चलाने तक जिस लाठी की जरूरत सदियों से पड़ती रही है, वह जिस बांस से बनती है, उसका अस्तित्व ही अब खत्म हो रहा है। बांस का पेड़ बहुत महत्वपूर्ण है। गांव में परंपरागत मकान बनाने, बैठने के लिए मचिया, लेटने के लिए चारपाई, दुल्हन को लाने के लिए पालकी, घरों और खेतों की सुरक्षा के लिए घेराबंदी करने और जीवन की अंतिम यात्रा में निकलने के लिए सिंहासन (अर्थी) का निर्माण बांस से ही किया जाता रहा है। पर्यावरण के लिहाज से बांस की खेती बहुत अच्छी मानी जाती है। बांस की खेती बंद होना जड़, जंगल और जमीन पर बढ़ते संकट का एक और प्रतीक है। इसको नहीं बचाया गया तो प्रकृति से हम और दूर हो जाएंगे।

आधुनिक विकास के दौर में बांस की जगह प्लास्टिक और फाइबर ने ले ली, जिसमें न तो सुरक्षा उपाय है, न मजबूती है और न ही पर्यावरण के लिहाज से अच्छा ही है। बावजूद इसके बांस को बचाने के लिए प्रयास नहीं किए जा रहे हैं। बांस के पेड़ का जीवन संकट में है। सर्वोदय कार्यकर्ता और जलग्राम के संस्थापक जल योद्धा उमा शंकर पांडेय बताते हैं कि बांस एक सामान्य पेड़ नहीं है, यह पूज्य वृक्ष है। इसकी डोली पालकी पर बैठकर हमारे घर में लक्ष्मी आई हैं, जननी आई हैं, मां आई हैं। भारत में प्राचीन काल से कई प्रकार की युद्ध कलाएं प्रचलित हैं। पुराने जमाने का सबसे प्रमुख अस्त्र बांस से बनी लाठी ही थी। अब तो लाठी, पालकी और चारपाई संग्रहालयों की शोभा बढ़ाएंगी।

लाठी आमतौर पर बांस की होती है। इसकी लंबाई 5 से 7 फिट होती है। अधिकतर ग्रामीण भारतीय अपने साथ लाठी रखना गौरव की बात समझते हैं। इसको लेने के लिए किसी खास प्रशिक्षण की जरूरत नहीं होती, ना ही लाइसेंस लगता है। लाठी से खेल भी होता है जिसे लाठी खेल कहते हैं। लाठी लेना एक योग, व्यायाम और कसरत है। जब मनुष्य को असुरक्षा महसूस हुई, हिंसक जीव-जंतुओं से बचने की जरूरत पड़ी, दुश्मनों से रक्षा करने की स्थिति आई, तब उसने पत्थर के टुकड़े के बाद लाठी को अपना हथियार बनाया, मित्र बनाया। मानव सभ्यता विकसित होने के साथ ही लाठी नाम के शस्त्र ने जन्म लिया।

लाठी चलाने की कला का जन्म भारत के गांवों में हुआ, लाठी एक ऐसा अस्त्र है, जिसे गांव के किसान हमेशा अपने साथ रखते हैं। आत्मरक्षा के साथ गौरव का प्रतीक है। जिसके पास बल की शक्ति है वही विजय का अधिकारी है। लाठी के बल पर लाठी कला के जानकारजनों को लट्ठैत कहा जाता है। जमींदारों, साहूकारों, तानाशाह ने लाठी के बल पर लंबा शासन किया। आज भी लोग लाठी से डरते हैं। भगवान कृष्ण के जन्म स्थान वृंदावन में लट्ठमार होली खेली जाती है। भगवान कृष्ण के मित्र ग्वालबालों ने लठिया लगाकर गोवर्धन उठाने के लिए लठिया का प्रयोग किया। प्रायः लाठी का प्रयोग सुरक्षा के लिए किया जाता है। सुरक्षाकर्मी जानवर चराने वाले बड़े जी अपने पास लाठी सदैव रखते हैं। लाठी में गुण बहुत हैं।

सदा राखिए संग, गहरी नदिया नाले मै बचावे अंग।
झपट कुत्ता को मारे, दुश्मन दावा गीर ताहू को दय ललकारे।
कह गिरधर कविराय सुनो हूं मेरे साथी, सब हथियार छोड़ हाथ मा लीजिए लाठी।

किसी बांस की लाठी डंडा को तेज गति से लगाते हैं तो आवाज होती है। रामायण काल में महाभारत काल में पौराणिक काल में डंडा लाठी भाला का उल्लेख मिलता है।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी सदा अपने साथ लाठी रखते थे। अस्त्रों के बिना शांति की कल्पना आप शांति काल में भी नहीं कर सकते। लाठियां कई तरह की होती हैं। चूड़ी वाली लाठी, भोपाली लाठी, कलिंजर लाठी, महोबिया लाठी, बावनी लाठी आदि। भोपाल मंडला कालिंजर में इसका प्रयोग बहुत पहले से होता रहा था। जल योद्धा उमा शंकर पांडेय बताते हैं कि जिस बांस से लाठी बनती है, मेरे गांव के कुछ लाठी रखने वाले प्रतिदिन 50 से 100 ग्राम उसको तेल पिलाते हैं। लाठी का वजन 500 ग्राम से ढाई किलो तक का होता है। लाठी 100 रुपए से लेकर 600 रुपए तक की मिलती है। कई जगह लाठियों का मेला लगता है।

लाठी को बनाना, काटना, पकाना, कड़ा लगाना, मजबूती लाना एक कला है। यह काम योग्य कारीगर ही करता है। बांस से बर्तन बनते हैं, बांस से कुर्सी बनती है, अलमारी बनती है, बेड बनते हैं, गरीब की झोपड़ी बनती है। बांस के वृक्ष की आवश्यकता न्यायालय में भी पड़ती है। कानून-व्यवस्था को सुधारने के लिए पिछले कई वर्षों में देश के विभिन्न राज्यों में सुरक्षाकर्मियों को देने के लिए कई करोड़ रुपए के डंडे खरीदे गए। वर्तमान में बांस न मिलने के कारण प्लास्टिक के डंडे खरीदे जा रहे हैं।

अब चारपाइयां लोहे की आ गई हैं। कुर्सी प्लास्टिक की हो गई हैं, क्योंकि हम बांस को नहीं बचा पा रहे हैं। यदि हमने लगातार बांस के वृक्ष की उपेक्षा की तो एक दिन ऐसा आएगा, जब बांस के बारे में केवल किताबों के पन्ने में पढ़ने को मिलेगा। आने वाली पीढ़ी बांस देखने को तरस जाएगी। आज भी अच्छी क्वालिटी का देसी बांस, जिसे वंश कहते हैं, शायद ही किसी गांव में लगा हो।

बांस की कलम, बांस के कागज से हमारी पीढ़ी ने पढ़ा हम उसे भूल रहे हैं। सर्वोदय कार्यकर्ता होने के नाते मेरी प्रार्थना है कि इस पेड़ को बचाने के लिए आगे आएं, बांस के पेड़ से बने बर्तनों, फर्नीचर से भारत के कई राज्यों में गरीब जनता को भोजन मिलता है। बांस के बर्तन बनाने वाले कारीगर आज भी गांव में हैं। कोई बांस के बर्तन ही नहीं खरीद रहा। आसाम, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, बंगाल में बांस के वृक्ष को बहुत महत्व दिया गया है। वैसे हमारे शास्त्र धर्म में बांस को वंश वृक्ष माना है।

हमारे देश में बांस को अनेक नामों से पुकारा जाता है जैसे वंश, बांस, बेठू आदि। प्रकृति ने हमारे देश को बांस के रूप में एक ऐसी वनस्पति प्रदान की है. जो आदि अनंत काल से हमारी सभ्यता का अभिन्न अंग है। अंतिम आदमी से जुड़ी है। यह ऐसा संसाधन है, जो कृषि ग्रामीण व्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देता है। रोजगार, स्वरोजगार निर्माण करता है और पोषण मूल्य होने के कारण कुपोषण और रक्तहीनता को दूर करता है। इस पेड़ से भवन निर्माण, फर्नीचर निर्माण, हस्तकला के कारीगरों को रोजगार मिलता है।

इस वृक्ष की ग्रामोदय, सर्वोदय, अंत्योदय की भूमिका है। मानव के मकान घर, सामान, साज, सज्जा, उपकरण में बांस वृक्ष का बहुत बड़ा योगदान है। यह प्रकृति का हरा सोना है। देश विदेश में इस वृक्ष तथा इसके शिल्पकारों की आवश्यकता है और रहेगी। दिव्यांगों की बैसाखी, वृद्ध की लाठी, डंडा एक विज्ञान है। जो जानते हैं जिस घर में बांस लगा होता है, उस घर की परेशानी दूर रहती हैं। ज्योतिष शास्त्र, नेत्र विज्ञान के अनुसार बांस वृक्ष के दर्शन हर समय ऑफिस में, घर में करते रहना चाहिए।

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