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बागपत के सनौली गांव में मिले शाही कब्रगाह और रथों के प्रमाण

सनौली कब्रगाह संस्कृति’ ईसा पूर्व 1800-2000 साल पुरानी और सिंधु घाटी सभ्यता के समकालीन मानी जा रही

Author सनौली (बागपत) | June 5, 2018 3:37 AM
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने इन खोजों को भारतीय पुरातत्व के इतिहास में नया मोड़ लाने वाला बताया

कई भारतीय पौराणिक कथाओं में आपने राजाओं को जिन विशाल रथों पर बैठे देखा है, उसका पहला भौतिक प्रमाण हाल ही में उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के सादिकपुर सनौली गांव में मिला। यहां एक ‘शाही कब्रगाह’ में आठ कब्रें, जिसमें से तीन खाटनुमा ताबूतों में हैं और उनके साथ हथियार, विलासिता का सामान और पशु-पक्षियों के साथ तीन रथ दफनाए गए मिले हैं। ‘ताबूत’ भी पूरे भारतीय उपमहाद्वीप के लिए नई खोज है। ‘सनौली कब्रगाह संस्कृति’ ईसा पूर्व 1800-2000 साल पुरानी (ताम्र-कांस्य युग) और सिंधु घाटी सभ्यता की समकालीन मानी जा रही है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) ने इन खोजों को भारतीय पुरातत्व के इतिहास में नया मोड़ लाने वाला बताया है। हालांकि, ये खोजें महाभारतकालीन हैं या नहीं, यह साबित करने के लिए एएसआइ ने और जांच व बहस की जरूरत बताई है।

सादिकपुर सनौली गांव के प्रधान सत्येंद्र कुमार मान की सूचना पर वहां की हिंडन और कृष्णी नदी के बाएं तट पर स्थित बरनावा में उत्खनन कर रही एएसआइ की टीम ने डॉ संजय कुमार मंजुल (निदेशक उत्खनन) की अगुआई में इस साल मार्च में खुदाई शुरू की थी। पिछले तीन महीने से हो रही खुदाई के बाद सतह से थोड़ा अंदर कई नायाब चीजें मिलीं, जो भारतीय उपमहाद्वीप में पहली बार मिली हैं और आज से 4000 साल पहले की उन्नत संस्कृति को दर्शाती हैं। बकौल डॉ मंजुल, ये खोजें भारतीय पुरातत्व को नई दिशा दे सकती हैं। 2000 ईसा पूर्व के आसपास मेसोपोटामिया और अन्य संस्कृतियों में जिस तरह के रथ युद्ध में इस्तेमाल किए जाते थे और जिस तरह की तलवारें, ढाल और हेलमेट थे, उसी काल के आसपास हमारे पास भी वो चीजें थीं, जो तकनीकी रूप से काफी उन्नत थीं और अन्य सभ्यताओं के समकालीन या उससे थोड़ा पहले ही हमारे यहां आ गई थीं। इन कब्रगाहों से पता चलता है कि हमारा शिल्प और जीवनशैली परिष्कृत थी’।

क्या हैं इन खोजों के संकेत

डॉ मंजुल ने कहा कि लकड़ी में तांबा जड़ने की जो निर्माण तकनीक इस्तेमाल की गई है, उसमें कील से ठोकने और उत्कीर्ण कर लगाने दोनों का पद्धतियों का इस्तेमाल किया गया है। रथ के बारे में मंजुल ने कहा कि यह कहना मुश्किल है कि यह घोड़े से दौड़ाया जाता था या बैल से, लेकिन कई अन्य उत्खनन स्थलों पर 2006 ईसा पूर्व के आसपास घोड़े के कंकाल के अवशेष मिले हैं तो घोड़े की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि यह किस तरह का समाज था, उनकी नस्ल और डीएनए पता लगाना बाकी है। उन्होंने कहा कि अब यहां पाई गई संस्कृति की कड़ियां जोड़ी जाएंगी और कार्बन डेटिंग से काफी कुछ पता किया जा सकेगा। यह निश्चित है कि यहां आसपास मानवीय बसावट रही होगी। हालांकि, अंतिम संस्कार की वैदिक रीतियों से अलग संस्कृति के सवाल पर डॉ मंजुल ने कहा कि दग्धा (जलाने की प्रथा) व अदग्धा प्रथा (जिसमें जलाया नहीं जाता), दोनों का जिक्र वैदिक साहित्य में है और दोनों प्रचलित रहे हैं। सिंधु घाटी सभ्यता में भी शवों को जलाया जाता था, जबकि, कालीगंगा, हड़प्पा, मोहनजोदड़ो और धौलावीरा में दफन कंकाल मिले हैं। इन इलाकों में भी जलाने के अवशेष मिले हैं।

सनौली में इस गांव से 20 किलोमीटर की दूरी पर 2005 में ही उत्खनन शुरू किया गया था जहां से 160 कब्रें मिली थीं। गौरतलब है कि बागपत और आसपास के क्षेत्रों को महाभारतकालीन युग से जोड़ कर देखा जाता रहा है। बागपत को उन पांच गांवों में माना जाता है, जिसे पांडवों ने युद्ध से पहले कौरवों से मांगा था। पास ही बसे बरनावा के लिए माना जाता है कि यहीं कौरवों ने पांडवों के लिए लाक्षागृह बनवाया गया था।

उत्खनन में मिली वस्तुएं

उत्खनन के दौरान आठ दफनाए गए शवों के अवशेष मिले हैं, जिसमें से तीन ताबूत में हैं, तीन द्वितियक यानी हड्डियां इकट्ठा कर दफनाए गए हैं जिसमें से दो एक साथ हैं और शेष दो सांकेतिक रूप से दफन हैं यानी उनकी स्मृति में सामान दफनाए गए हैं। इन कब्रों के साथ जो सामान मिला है उससे इनके ‘शाही कब्रगाह’ होने का अंदाजा लगाया जा रहा है और साथ ही इनमें से कुछ के ‘योद्धा’ होने के संकेत मिलते हैं। साथ ही दो ऐसे सामान मिले हैं जो पहले के किसी उत्खनन में भारतीय उपमहाद्वीप में नहीं मिले हैं। पहला, तीन रथ जो लकड़ी के थे लेकिन उनके ऊपर तांबे और कांस्य का काम था। समय के लकड़ी मिट्टी बन गई और तांबा हरा पड़ गया है, लेकिन तांबे की वजह से रथ की रूपरेखा सुरक्षित है। दूसरी नायाब चीज लकड़ी की टांगों वाले तीन खाटनुमा ताबूत हैं, तीन में से दो ताबूतों के ऊपर तांबे के पीपल के पत्ते के आकार की सजावट है।

आठ में से एक कब्र बड़ी है जिसमें दो रथ मिले हैं, शव उत्तर-पश्चिम, दक्षिण-पूर्व दिशा में है, तांबे की हेलमेटनुमा चीज है, दो पाइपनुमा चीजें हैं, हैंडल लगा हुआ खंजर ताबूत के नीचे रखा मिला है। एक एंटिना (स्पर्श सूत्र) सहित तलवार और तांबे की मशाल उत्तर-पश्चिम दिशा में रखी मिली है। तांबे का सजी हुई धड़नुमा ढाल मिली है जो ताबूत के दाहिने तरफ रखी है।
सभी कब्रों से कुल मिलाकर तांबे के चार एंटिना (स्पर्श सूत्र), तलवारें, दो खंजर, सात सुरंगनुमा चीजें, तीन तांबे के कटोरे जिसमें एक के हेलमेट होने का अनुमान लगाया जा रहा है और ढाल मिली है। इन हथियारों के साथ ही कंघी जिसे खूबसूरत मोर का आकार दिया गया है, तांबे का दर्पण, मशाल, पत्थर और अर्धबहुमूल्य पत्थरों की मोतियां, सोने की मोती और कुछ अन्य चीजें मिली हैं। कंघी और सोने की मोती जिस कंकाल के साथ मिले हैं उसके महिला होने का अनुमान है। यह कंकाल भी ताबूत में था, लेकिन तांबे का काम नहीं होने के कारण ताबूत मिट्टी हो चुका है।

  • सनौली कब्रगाह संस्कृति’ ईसा पूर्व 1800-2000 साल पुरानी और सिंधु घाटी सभ्यता के समकालीन मानी जा रही
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