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महिला बोलीं- पति ने फोन कॉल रिकॉर्ड कर किया मेरी निजता का उल्‍लंघन, कोर्ट ने इस तर्क से खारिज की दलील

न्यायमूर्ति अनूप जयराम भंभानी की पीठ ने कहा कि भले ही निजता को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी गई हो, लेकिन अकेले इसके उल्लंघन से सबूत को अस्वीकार्य नहीं किया जा सकता।

दिल्ली उच्च न्यायालय। (file)

दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक मामले की सुनवाई करते हुए यह साफ किया कि किसी की निजता को भंग कर एकत्र किए गए किसी भी सबूत को अदालत में अस्वीकार्य नहीं किया जाता है। कोर्ट ने यह कहते हुए एक पति को उनकी पत्नी की उसके दोस्त के साथ की गई बातचीत की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग पेश करने की अनुमति दे दी। न्यायमूर्ति अनूप जयराम भंभानी की पीठ ने कहा कि भले ही निजता को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी गई हो, लेकिन अकेले इसके उल्लंघन से सबूत को अस्वीकार्य नहीं किया जा सकता।

न्यायाधीश ने कहा निजता के अधिकार को निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार भी होना चाहिए। कोर्ट ने यह कहते हुए पति को सबूत के तौर पर पत्नी के उस फोन कॉल की रिकॉर्डिंग पेश करने की इजाजत दी, जिसमें वह अपनी एक दोस्त से पति और उसके परिवार के बारे में अपमानजनक तरीके से बात कर रही थी। अदालत इस आदेश के खिलाफ महिला की ओर से दायर एक अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें दावा किया गया था कि उसके पति ने गुप्त रूप से उसके मौलिक अधिकार का उल्लंघन करते हुए उसकी ‘निजी’ बातचीत को रिकॉर्ड किया है।

महिला के पति ने उनकी यह बातचीत सबूत के तौर पर कोर्ट में पेश की है और क्रूरता और मानसिक उत्पीड़न के आधार पर तलाक की मांग की है। न्यायाधीश ने कहा कि चूंकि हमारे संविधान के तहत कोई मौलिक अधिकार पूर्ण नहीं है। जैसा कि इस मामले में दो मौलिक अधिकारों के बीच टकराव हो रहा है। इस मामले में निजता के अधिकार और निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार के बीच टकराव हो रहा है। दोनों को अनुच्छेद 21 के अंतर्गत सरंक्षण प्राप्त है। ऐसे में निजता के अधिकार के साथ निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार भी होना चाहिए।

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