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आज भी खरे हैं गांव; मिट्टी की खुशबू, परंपरा, श्रम, स्वावलंबन व अपनेपन को देखना, महसूस करना हो तो गांव चलें

शहरों में भीड़ है, लेकिन हर कोई वहां अकेला है। किसी के पास समय नहीं है। गांव में भीड़ नहीं है, लेकिन सबके पास दूसरे की परवाह है, फिक्र है और सामाजिकता की भावना है। शहरों की तंग गली नहीं खेतों की मेड़ों पर प्रकृति का सहवास है

गांव में तालाब के किनारे पेड़ों की हवा में मिट्टी के कच्चे मकान में रहने का आनंद कुछ और ही है।

देश को आजादी मिलने से पहले भारत में ग्रामीण इलाकों की संख्या आज से चार गुनी अधिक थी। तब गांव की परंपराओं. श्रमशीलता, स्वावलंबन की भावना, आपसी भाईचारा कायम था और खाली घर में भी अकेलापन नहीं लगता था। परंपरागत व्यवसाय खेती और पुरखों की बनाई व्यवस्था पर भरोसे का सम्मान था। एक-दूसरे के सुख-दुख में लोग खुले मन से शामिल होते थे, लोग कहते थे कि भारत गांवों का देश है।

अब वह दौर खत्म हो रहा है। भारत बदल रहा है। शहरों का विस्तार हो रहा है। हमारी विरासत की परंपराएं खत्म हो रही हैं, श्रमशीलता की जगह सुविधासंपन्नता और स्वावलंबन की जगह इवेंट मैनेजमेंट कंपनी पर निर्भरता बढ़ी है। आपसी भाईचारे का आलम यह है कि पड़ोसी के पास हमारे बारे में जानने की भी फुर्सत नहीं है।

घर में सब लोग हैं, लेकिन मोबाइल में इतना उलझे हैं कि एक-दूसरे से बात करने का वक्त ही नहीं मिलता है यानी पास-पास रहकर भी दूर-दूर हैं। खेती अब घाटे का व्यवसाय है, मेहनत-मजदूरी की जगह तकनीकी और कंप्यूटर वाला श्रम शुरू हो गया है। पुरखों की छोड़िए, अपने दादा-बाबा के बारे में भी जानने की कोई इच्छा नहीं करता है।

हालांकि बहुत से ग्रामीण इलाकों में आज भी पुरानी संस्कृति कायम है। लोग अपने समाज, परंपरा और अपनी जड़ का सम्मान करते हैं। सर्वोदय कार्यकर्ता और जल योद्धा उमा शंकर पांडे बताते हैं कि गांव एक शरीर है, हर गांव एक पहेली है। उनका कहना है कि आज भी खरे हैं गांव, गांव की मिट्टी से निकली प्रतिभाओं ने दुनिया में अपनी हुनर का लोहा मनवाया है। हमारी जड़ें गांव की परंपरागत हुनर है। जीवन उपयोगी ज्ञान है, विश्वास है, अवसर हैं, श्रमशील कर्मठ है तो गांव भूखा नहीं मरने देगा पुरखों की बनाई ग्रामीण स्वालंबन योजना आज भी खरी है। विश्वास करिए आज भी खरे हैं गांव, मिट्टी की खुशबू, परंपरा, श्रम, स्वावलंबन और अपनाें का अपनापन को देखना, समझना और महसूस करना हो तो गांव की ओर चलें। मिट्टी के घर देखें और तालाब के किनारे, पेड़ों की छांव में खेतों की मेड़ों पर बैठकर सूरज की रोशनी में चूल्हे पर बने भोजन का स्वाद लें।

स्वराज्य के बाद भारत के शहरों की अपेक्षा गांव का विकास न के बराबर हुआ। शहर समृद्धशाली हुए गांव उजड़ते गए। शहरों की संख्या बढ़ी, गांव घटे, गांव की मिट्टी में खेलकर बढ़ी हुई नौजवानों की पीढ़ी ने उद्योग जगत, राजनीति, मीडिया, कला, शिक्षा, ज्ञान, विज्ञान, कृषि, व्यापार, चिकित्सा, अनुसंधान सभी क्षेत्रों में अपनी मेहनत से देश दुनिया में स्थान बनाया, नाम कमाया, लेकिन गांव की जिस मिट्टी ने शक्ति दी, ताकत दी फिर मुड़कर उसको नहीं देखा। दो फीसदी लोग अपवाद होंगे, उनको छोड़ दिया जाए तो बाकी बदल गए हैं।

गांव ने हमको सब कुछ दिया, हमने उसको उजाड़ दिया। गांव में आज भी साझी संस्कृति जीवन मूल्य जीवित है, उन्हीं संयुक्त परिवार की अवधारणा को लेकर शायद देश दुनिया ने फिर से स्वयं सहायता समूह गठित करने का निर्णय लिया। संयुक्त परिवार का स्थान यह पैसा देकर बनाए सहायता समूह कितना ले पाएंगे पता नहीं, इन सहायता समूह को दुनिया ने भले ही नोबेल पुरस्कार दे दिया हो, भारत के सामाजिक मूल्यों को गढ़ने, संरक्षित करने में परिवार का बड़ा महत्व था। गांव हमें भूखा नहीं मरने देगा, इस विश्वास के साथ कोरोना महामारी के दौरान हजारों किमी पैदल यात्रा कर लौटे हैं देश के वीर योद्धा।

जब देश गुलाम था, गांव आजाद थे, गांव की आंतरिक व्यवस्था में कोई हस्तक्षेप नहीं था, स्वराज आया, महानगरों में अटक गए, गांव के सामने अपने अस्तित्व की रक्षा का खतरा है, जिन गांवों के कारण गांधी, विनोबा, नानाजी नरेंद्र ने नगरों की सुख-सुविधाओं को त्याग कर देश के गांव की ओर रुख किया था, गांवों को भारत की आत्मा कहा था, शायद आज की ग्राम पंचायत के पंचायत घर को देख लें समझ में आ जाएगा।

इसी पंचायत घर से ग्राम के विकास की गंगा निकलती है। योजना बनती है। स्वयं यह घर कैसा है, सभ्य समाज के व्यक्ति को एक बार अपने गांव के पंचायत घर को अवश्य देखना चाहिए। जिस घर ने पूरे गांव में शौचालय बांटे, कुआं, तालाब, रोड, बनवाए, जिसका वर्तमान नाम ग्राम सचिवालय है, जिसमें कभी-कभार ग्राम प्रधान ग्राम सचिव बैठते होंगे, उस घर में खुद शौचालय नहीं, बिजली नहीं, फर्नीचर नहीं, कंप्यूटर नहीं, कमरे नहीं, 70 वर्षों में 1 ग्राम पंचायत में कितने करोड़ रुपए खर्च हुए हैं, यह कहना उचित नहीं है। तीन लाख के करीब ग्राम पंचायतें हैं, छह लाख के करीब गांव हैं। उदाहरण आपके सामने है।

जलग्राम जखनी के संस्थापक उमा शंकर पांडेय के मुताबिक जिस गांव में रहता हूं, उस गांव क्षेत्र में 5% अपवाद को छोड़ दिया जाए कुछ गांव में होंगे बढ़िया काम हुआ होगा जिन व्यक्तियों को गांव चलाने का 5 साल के लिए चुना गया था उनका घर देख लीजिए उस सरकारी बड़े बाबू को घर देख लीजिए, जिसे गांव के विकास का मुखिया कहा जाता है तब भी खड़े हैं। गांव गांव में आज भी सुख-दुख बांटने वाले हैं पानी हवा घर अपने हैं टूटे ही सही किराया नहीं लगेगा।

इसी उम्मीद से हजारों किलोमीटर की पैदल यात्रा की थकावट गांव पहुंचते ही खत्म हो गई। आखिर क्यों संकट में भागे थे, क्योंकि आज भी खरे हैं गांव। शहर में बिजली थी, पानी था, हवा थी, आराम था, गाड़ी थी, जहाज था, पैसा था ऐसा क्या नहीं था, लेकिन फिर भी करोड़ों लोग लोग गांव की ओर भागे। पीढ़ियों का अपनेपन का बचपन का नाना-नानी दादा-दादी की कहानी, खेत खलिहान होंगे, बैल होगा, गाड़ी होगी, हल होगा, माटी का दिया होगा, भले उसमें तेल ना हो दुनिया में भारत ही केवल गांव का देश है।

परंपरागत तथा नवीन ग्रामीण उद्योगों को संरक्षण देने वाले उद्योग विभाग के हाथ इतने छोटे हैं कि गांव तक पहुंच नहीं पाते फिर भी गांव खड़े हैं गांव में कुम्हार तो है कुम्हार की वह मिट्टी नहीं है जिसका स्पर्श पाकर अंधेरा दूर करने के लिए दिया तैयार होता था, वह दिया बेचारा बल्ब से कब तक लड़े कच्चे मिट्टी के मकान, खपरैल लोहे की के टीन से कब तक लड़ेगी।

गांव के सुनार के पास 16 आने शुद्ध मोहर अब नहीं है, बढ़ई के पास हल, बैलगाड़ी बनाने की क्षमता है, लेकिन लकड़ी गायब है, गांव के बच्चों के लिए स्कूल भले ही परिणाम ना दे पाया हो, लेकिन बूढ़ों की प्रौढ़ शिक्षा ने तंत्र के कई लोगों के घर में उजाला कर दिया है। जिस साहित्य ने गांव को होरी, गोबर वसंत दिए, आज वह साहित्य सृजन कब होगा। आखिर इन गांव की सुख, शांति, अन्न, धन, लक्ष्मी कहां चली गई। किसान के कंठ के गीत लुप्त हो गए, मस्ती चुप है, फिर भी खरे हैं गांव।

योजनाकारों, वैज्ञानिकों, प्रशासनिक सुधारों, जनप्रतिनिधियों के सामने एक चुनौती है, परंपरागत व्यवस्था की ओर चलना है या आधुनिकता की ओर तय होना चाहिए, हम गांव को क्या मानते हैं एक इकाई, समूह या देश की आत्मा गांव अपनी परंपरा के कारण भूमि की धुरी है। गांव एक आत्मा है, एक शरीर है, गांव में एक जगह कुछ होता है, तुरंत दूसरी जगह खबर फैल जाती है, असर अच्छा हो या बुरा गांव सामाजिक संस्कृति की इकाई है, गांव के परंपरागत उद्योग धंधे चले गए, गांव में लक्ष्मी कैसे रहती लक्ष्मी गई तो सरस्वती ने भी गांव छोड़ दिया।

1920 में एक अनुमान के अनुसार एक लाख व्यक्ति पर 3 सरकारी कर्मचारी थे, आज 100 व्यक्तियों पर 3 कर्मचारी हैं फिर भी गांव डगमगा रहे हैं। 1920 में 1 किलो गेहूं का भाव एक आना था, दूध घी बेचना पाप था, गरीबी रही होगी, लेकिन सब साथ बैठते थे। 1928 के रॉयल कमिशन ऑफ एग्रीकल्चर इन इंडिया की रिपोर्ट में कहां गया कि भारत के ग्रामीण समाज में धन जमा करने की प्रवृत्ति नहीं है। इसका मतलब गांव को पैसे की जरूरत नहीं थी। खैर शहरों में भीड़ है, लेकिन हर कोई वहां अकेला है। किसी के पास समय नहीं है। गांव में भीड़ नहीं है, लेकिन सबके पास दूसरे की परवाह है, फिक्र है और सामाजिकता की भावना है। शहरों की तंग गली नहीं खेतों की मेड़ों पर प्रकृति का सहवास है।

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