महिलाओं को आरक्षण दिए जाने के मुद्दे पर देश भर में सत्ता और विपक्ष के बीच हंगामा मचा हुआ है लेकिन कुख्यात डाकुओं के आतंक वाले चंबल इलाके से जुड़े इटावा में आरक्षण बिना तकरीबन कई महिलाओं ने न सिर्फ अपनी राजनीतिक जमीन जमाई बल्कि खुद को स्थापित कर राजनेताओं के सामने कड़ी चुनौती खड़ी की।
इटावा के प्रमुख राजनीतिक टीकाकार उदयभान सिंह यादव बताते हैं कि इटावा में बिना महिला आरक्षण के सामान्य सीटों से महिलाओं ने राजनीति की ऐसी कामयाबी हासिल की है, जिसमें उन्होंने पुरुषों को अच्छी खासी चुनौती दी है। यमुना नदी के किनारे बसे इटावा की पहचान डाकुओं के प्रभाव वाले जनपद के तौर पर होती है लेकिन इसके बावजूद यहां समाजवाद की जड़ें काफी मजबूत रही हैं। वहां राजनीति में महिलाएं भी इसमें पीछे नहीं रहीं। पहली दफा यहां से राज्यसभा का सफर तय कर सरला भदौरिया ने हर किसी को अचरज में डाल दिया था।
1964 में समाजवादी चिंतक राममनोहर लोहिया के मार्गदर्शन से सरला भदौरिया राज्यसभा पहुंची थीं। सरला के पति कमांडर अर्जुन सिंह भदौरिया आजादी के आंदोलन में चंबल में लालसेना के जन्मदाता माने जाते हैं। पहली बार सांसद बनने के बाद इस इलाके में समाजवाद का परचम लहराना शुरू हो गया था। सरला के बेटे सुधींद्र भदौरिया बताते हैं कि 1964 में उनकी मां सरला भदौरिया को राम मनोहर लोहिया ने राज्यसभा चुनाव के लिए मैदान में उतारा था।
सुधींद्र के अनुसार उनके मुकाबले में जवाहर लाल नेहरू ने जेडए अहमद को उतारा था। सरला के चुनाव संचालन की व्यवस्था दिग्गज समाजवादी राजनारायण ने देखी थी, इसी वजह से उनकी मां की जीत संभव हुई। सरला को समाजवादी विचारधारा की पहली महिला राज्यसभा सदस्य कहा जाता है। सरला वर्ष 1964 से 1970 तक राज्यसभा सांसद, और बाद में 1977-80 तक उत्तर प्रदेश महिला समाज कल्याण बोर्ड की अध्यक्ष चुनी गईं।
सरला वर्ष 1964 से 1970 तक राज्यसभा सांसद, और बाद में 1977-80 तक उत्तर प्रदेश महिला समाज कल्याण बोर्ड की अध्यक्ष चुनी गईं।
सुखदा मिश्रा पहुंची विधान सभा
सुखदा मिश्रा के बिना इटावा की राजनीति कहानी कभी पूरी नहीं हो सकती है। बंसीलाल जब हरियाणा के मुख्यमंत्री थे, तब 1974 में सुखदा को इटावा सदर विधानसभा से कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में पहली दफा चुनाव मैदान में उतारा, जिसमें उनको जीत हासिल हुई, फिर उनकी कामयाबी का रास्ता लगातार बढ़ता गया।
सुखदा 1980 में लोकसभा चुनाव हार गई हों लेकिन कांग्रेस उन पर विधानसभा चुनाव के लिए अपना भरोसा लगातार जताती रही। इसी कारण 1986 में नारायण दत्त तिवारी सरकार में ऊर्जा मंत्री बनीं। 1989 में जनता दल की लहर में सुखदा ने पाला बदल करके चुनाव लड़ा तो फिर जीत हासिल करके मुलायम सरकार में नगर विकास मंत्रालय हासिल कर लिया।
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आर्थिक सूचकांकों के अनुसार बिहार की गिनती देश के सबसे पिछड़े राज्यों में होती है मगर महिलाओं को अधिकार देने के मामले में यह राज्य देश के अग्रणी राज्यों में शामिल किया जा सकता है। इस कहानी में हम आपको बिहार में महिलाओं को मिलने वाले उन अधिकारों और सुविधाओं के बारे में बताएंगे जो दिखाते हैं कि नारी शक्ति को सशक्त करने में यह राज्य जागरूक रहा है। पूरी खबर पढ़ें…
