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अलग हुए पति-पत्‍नी ने एक-दूसरे पर ठोक डाले 67 मुकदमे, सुप्रीम कोर्ट ने और केस फाइल करने पर लगाई रोक

सुप्रीम कोर्ट ने अलग-अलग रह रहे पति-पत्नी के द्वारा किसी भी तरह के नए केस पर रोक लगा दी है। दोनों पहले ही एक दूसरे के खिलाफ 67 मामले दर्ज करवा चुके हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने महिला को माता-पिता के साथ जाने की दी इजाजत। (file pic)

सुप्रीम कोर्ट ने अलग रह रहे पति-पत्नी को एक दूसरे के खिलाफ नया केस दर्ज कराने को लेकर रोक लगा दी है। बताया जाता है कि दोनों पहले से ही एक दूसरे के खिलाफ पिछले सात सालों में 67 केस दर्ज करवा चुके हैं। जस्टिस कुरियन जोसेफ की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने कहा, “हमनें दोनों को एक दूसरे के खिलाफ नया केस दर्ज कराने से रोक दिया है, यह चाहे क्रिमिनल केस हो या सिविल। एक दूसरे के खिलाफ हो या एक दूसरे के परिवार के खिलाफ। उस स्कूल के खिलाफ जहां उनका बच्चा पढ़ रहा है या फिर एक दूसरे के वकील के विरुद्ध हो। बिना हाईकोर्ट की इजाजत से ऐसा नहीं हो सकता।” सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसा इसलिए किया गया ताकि विवाद और लंबा न खिंचे।

न्यूज 18 के अनुसार, दंपति की शादी वर्ष 2002 में हुई थी। लड़का साफ्टवेयर इंजीनिजर था और लड़की एमबीए। शादी के बाद वे अमेरिका चले गए। 2009 में उनका एक बच्चा हुआ। लेकिन बाद में रिश्ता खराब होने के बाद लड़की वापस अपने मां-पिता के पास बैंगलुरु वापस लौट गई। इसके बाद मुकदमे का सिलसिला शुरू हुआ। पति, जिसके पास अमेरिका की नागरिकता है, उसने पत्नी के खिलाफ 58 मामले दर्ज करवाए हैं। वहीं, पत्नी, जो कि अभी बेंगलुरु में रह रही है, पति के खिलाफ 9 मामले दर्ज करवाए हैं। इनमें घरेलू हिंसा से लेकर अदालत की अवमानना तक के मामले दर्ज हैं। कोर्ट ने आगे से केस न करने का आर्डर देते हुए अपना ‘दर्द’ भी जाहिर किया कि दोनों के बीच वह असहाय बच्चा है, जिसकी उम्र अभी मात्र 9 वर्ष है। वह मानिसक और भावनात्मक रूप से सहमा हुआ है।

कोर्ट ने माता-पिता को बच्चे से मिलने पर रोक लगा दी है। कोर्ट ने जब यह पाया कि बच्चे को लेकर माता-पिता स्कूल के अधकारियों के साथ बुरा व्यवहार करते हैं, उसके बाद प्रिंसिपल को यह अधिकार दिया गया कि वे बच्चे को माता-पिता से मिलने पर रोक लगा दें। कोर्ट ने कहा, “माता-पिता के हस्तक्षेप के संबंध में स्कूल अधिकारियों द्वारा व्यक्त की गई आशंकाओं को देखते हुए विद्यालय परिसर में उनके जाने पर रोक लगा दी जाए।” कोर्ट ने बेंगलुरु के कोर्ट को निर्देश दिया कि वे छह महीने के अंदर तलाक की इस याचिका का फैसला सुनाएं। इसके साथ ही बच्चा किसके साथ रहेगा और दोनों के बीच के पेंडिंग केसों का भी निपटारा करें।

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