पंजाब के साथ होगा ऐलनाबाद उपचुनाव!

अब लगता है ऐलनाबाद का उपचुनाव 2022 के शुरू में पंजाब और यूपी समेत पांच राज्यों के आम चुनावों के साथ ही हो पाएगा।

सांकेतिक फोटो।

सुमन भटनागर

सियासी हलकों में उम्मीद जताई जा रही थी कि देश में कोरोना महामारी का प्रकोप कम होने पर हरियाणा की ऐलनाबाद सीट के अलावा अन्य राज्यों के लंबित विधानसभा उपचुनाव त्योहारों का मौसम शुरू होने से पहले करवा दिए जाएंगे लेकिन चुनाव आयोग ने जिस तरह पश्चिम बंगाल की तीन और ओड़ीशा की एक सीट पर चुनाव की घोषणा की जबकि बाकी की 31 सीटों के उपचुनाव छोड़ दिए हैं उससे लगता है कि अब ऐलनाबाद का उपचुनाव 2022 के शुरू में पंजाब और यूपी समेत पांच राज्यों के आम चुनावों के साथ ही हो पाएगा।

पश्चिम बंगाल में सीटों पर उपचुनाव इसलिए जरूरी गया था क्योंकि यदि 4 नवंबर तक ममता बनर्जी विधानसभा का कोई उपचुनाव न जीत पातीं तो उन्हें मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ता। संविधान किसी व्यक्ति को राज्य विधानसभा के लिए चुने बिना केवल छह महीने तक मंत्री पद पर रहने की अनुमति देता है। यह जरूरी है कि एक मंत्री को, जो लगातार छह महीने तक विधानसभा का सदस्य नहीं है, उस अवधि की समाप्ति पर उसे पद से हटना होगा। वैसे पश्चिम बंगाल में खड़दह, समशेरगंज, जंगीपुर, शांतिपुर, भवानीपुर, दिनहाटा और गोसाबा विधानसभा सीटों पर उपचुनाव लंबित हैं लेकिन उपचुनाव केवल तीन सीटों के करवाए जा रहे हैं।

हरियाणा के ऐलनाबाद की विधानसभा सीट आठ महीने से खाली पड़ी है। यहां से इनेलो के अभय चौटाला विधायक थे लेकिन 27 जनवरी को उन्होंने किसानों के आंदोलन के समर्थन में अपनी सीट से इस्तीफा दे दिया था। उन्हें अंदाजा था कि खेल केवल छह महीने का है। चुनाव आयोग को छह महीने के भीतर चुनाव करवाने पड़ेंगे और वह फिर यहां से विधानसभा में पहुंच जाएंगे। दरअसल, ऐलनाबाद सीट इनेलो की परंपरागत सीट रही है। 25 साल से इस पर इनेलो का कब्जा रहा है। वर्ष 1996 में देवी लाल की समता पार्टी से भागी राम विजयी हुए थे। उसके बाद 2000, 2005, 2009, 2010 (उपचुनाव) 2014 व 2019 को यहां से इनेलो के प्रत्याशी जीते। अभय चौटाला यहां से तीन बार विधायक चुने गए। वर्ष 2019 में अभय ने अपने बलबूते पर यहां से चुनाव लड़ा था लेकिन इस बार जेल से रिहा हुए ओम प्रकाश चौटाला भी उनके साथ खड़े होंगे।

हालंकि इस बार पहले की तरह जीत बहुत आसान नहीं होगी क्योंकि भाजपा-जजपा गठबंधन अपना साझा उम्मीदवार मैदान में उतारेगा। कांग्रेस भी अपनी पूरी ताकत यहां झोंकेगी। कहा जा रहा है कि इस सब के बाबजूद अभय ने किसानों के लिए जिस तरह अपनी सीट की कुर्बानी दी उसका कुछ न कुछ फायदा तो उसे मिलेगा।

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