ड्योढ़ी पर चुनाव, त्योहारों पर दांव

आजकल उत्तराखंड में चुनावी मौसम के कारण पर्वों को लेकर जमकर राजनीति हो रही है।

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी। फोटो क्रेडिट- धामी का ट्विटर हैंडल

आजकल उत्तराखंड में चुनावी मौसम के कारण पर्वों को लेकर जमकर राजनीति हो रही है। राज्य के पारंपरिक इगास-बग्वाल के रोज भाजपा सरकार के मुखिया मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने एक दिन की सरकारी छुट्टी का ऐलान किया और जिस पर पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरीश रावत ने तंज कसते हुए कहा कि रविवार के दिन यह त्योहार है तो छुट्टी किस बात की? मुख्यमंत्री धामी ने कहा कि राज्य सरकार ने सोमवार को इस पारंपरिक पर्व की छुट्टी की है।

मुख्यमंत्री धामी ने कहा कि हमने तो उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र के पारंपरिक लोक पर्व इगास की छुट्टी की है और उन्होंने यानी हरीश रावत ने मुख्यमंत्री रहते हुए शुक्रवार यानी नमाज पढ़ने की सरकारी छुट्टी की थी। मुख्यमंत्री धामी की यह टिप्पणी कांग्रेस को भारी पड़ रही है। हरीश रावत ने मुख्यमंत्री के रहते हुए एक विशेष समुदाय के सरकारी कर्मचारियों के लिए शुक्रवार यानी जुम्मे की नमाज के लिए एक दिन की छुट्टी रखने का ऐलान किया था जो 2017 में चुनावी मुद्दा बना और राज्य की राजनीति में हिंदू-मुस्लिम का राजनीतिक मुद्दा जमकर उठा और भाजपा को राज्य की 70 विधानसभा सीटों में से 57 सीटें मिलीं।

मुख्यमंत्री धामी ने उत्तराखंड में रह रहे उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल और बिहार के लोगों को भाजपा की ओर आकर्षित करने के लिए छठ पूजन की एक दिन की सरकारी छुट्टी की थी जिसके बाद उन्होंने राज्य के पर्वतीय लोक पर्व इगास-बग्वाल की छुट्टी कर पर्वतीय क्षेत्र के मतदाताओं को लुभाने का प्रयास किया।

इस तरह 2022 के विधानसभा चुनाव में अभी से राजनीति नारा बन गया है-‘इगास बनाम नमाज’ और राज्य की जनता इसी नारे पर उलझी हुई है। सामाजिक व सांस्कृतिक ताने बाने को समेटे इगास-बग्वाल आजकल सभी की जुबान पर है। पर्वतीय राज्य उत्त्तराखण्ड में जनभावनाओं का प्रतीक बन चुके इगास-बग्वाल को सभी राजनीतिक दल राजनीतिक तौर पर भुनाने की कोशिश में लगे हुए हैं।

राज्य के राज्यपाल से लेकर मुख्यमंत्री, मंत्री और विभिन्न पार्टियों के प्रमुख नेताओं ने उत्तराखंड की इगास-बग्वाल लोकपर्व पर अपनी भागीदारी जमकर निभाई। भाजपा, कांग्रेस, आप, उक्रांद, आंदोलनकारी संगठनों समेत कई संस्थाओं ने पूरे प्रदेश में इगास-बग्वाल से जुड़े पारंपरिक रीति-रिवाज मनाते हुए यह पर्व धूमधाम से मनाया और पहाड़ के लोकगीतों पर देर रात तक थिरके और 2022 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए कुछ नेताओं ने अच्छी खासी भीड़ जोड़ इगास-बग्वाल की ओर राज्य के मतदाताओं का ध्यान खींचा। दरअसल, पिछले कुछ सालों से सोशल मीडिया पर इगास-बग्वाल को लेकर चल रहे अभियान के बाद उत्तराखंड की जनता को पारंपरिक पर्व इगास-बग्वाल के बारे में कई नई जानकारियां मिली।सबसे पहले 2017 में भाजपा की

इगास-बग्वाल लोक पर्व क्या है
लोक पर्व इगास को बूढ़ी दिवाली भी कहा जाता है। यह पर्व दिवाली के 11 दिन बाद देवोत्थान एकादशी के दिन मनाया जाता है। इस दिन भगवान विष्णु योग निद्रा से जागते हैं और सृष्टि के पालन पोषण का संचालन भगवान शिव से अपने हाथ में लेते हैं। लोक मान्यता है कि उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को भगवान श्री राम के अयोध्या में लंका से लौटने और उनके राज्याभिषेक होने की सूचना दीपावली के 10 दिन बाद मिली थी। उस दिन देवोत्थान एकादशी थी। तब पर्वतीय लोगों ने भगवान श्री राम के राज्याभिषेक और अयोध्या लौटने की खुशी में दीपावली का पर्व धूमधाम से मनाया और जिसे बूढ़ी दिवाली यानी इगास-बग्वाल का नाम दिया गया।

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