पश्चिम बंगाल में स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) के बाद शनिवार को चुनाव आयोग अंतिम वोटर लिस्ट जारी करने वाला है। लेकिन उससे पहले एक बड़ी उलझन सामने आ गई है। जिन लाखों लोगों के नाम पहले ही चुनावी रजिस्ट्रेशन अधिकारी (ERO) ने सही मानकर मंजूर कर दिए थे, अब उनके नाम फिर से खतरे में पड़ गए हैं। वजह यह है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर 60,06,675 मतदाताओं (कुल वोटरों का करीब 8.5%) की पात्रता की दोबारा जांच न्यायिक अधिकारी कर रहे हैं।
कई ERO और असिस्टेंट ERO ने बताया कि उन्होंने जिन नामों को सभी दस्तावेज देखने के बाद मंजूरी दे दी थी, उन्हें बाद में “रिवर्स” करके फिर से जांच के लिए भेज दिया गया। ऐसा तब हुआ जब चुनाव आयोग के माइक्रो-ऑब्जर्वरों ने कुछ गड़बड़ियां बताईं।
अधिकारियों के मुताबिक, 14 फरवरी को सुनवाई का आखिरी दिन था। उससे ठीक पहले लंबित मामलों की संख्या अचानक कुछ लाख से बढ़कर 60 लाख से ज्यादा हो गई। एक ERO ने बताया कि नवंबर-दिसंबर में SIR के पहले चरण में फॉर्म जमा कराने और दस्तावेज अपलोड करने का काम बहुत सावधानी से किया गया था। सुनवाई के दौरान माइक्रो-ऑब्जर्वर मौजूद भी थे। लेकिन 11 फरवरी के बाद उन्होंने पहले से मंजूर मामलों को वापस भेजना शुरू कर दिया।
जिन नामों को वापस भेजा गया, उनमें एक वरिष्ठ IAS अधिकारी का भी नाम
14 फरवरी की आखिरी तारीख नजदीक थी, इसलिए कमियों को सुधारने का समय भी नहीं मिला। उसी दिन ECI के ECINET पोर्टल (ERONET के जरिए) पर दस्तावेज अपलोड करने का विकल्प भी बंद हो गया। जानकारी के मुताबिक, जिन नामों को वापस भेजा गया, उनमें एक वरिष्ठ IAS अधिकारी का नाम भी शामिल था।
एक दूसरे ERO ने बताया कि सुनवाई के समय माइक्रो-ऑब्जर्वरों ने कोई आपत्ति नहीं जताई, लेकिन बाद में हजारों नामों को दोबारा जांच के लिए भेज दिया।
अब पश्चिम बंगाल, ओडिशा और झारखंड के 530 न्यायिक अधिकारियों को इन 60 लाख मामलों की जांच की जिम्मेदारी दी गई है। ERO और मतदाता दोनों ही असमंजस में हैं। एक ERO ने कहा, “जब मुझे ही नहीं पता कि मेरे विधानसभा क्षेत्र के कितने मामले न्यायिक अधिकारी के पास लंबित हैं, तो वोटर को क्या पता होगा?” अब ERO इस प्रक्रिया में शामिल भी नहीं हैं, और उनके लॉग-इन पर लंबित मामलों की जानकारी भी नहीं दिख रही।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद ये 530 जज तय करेंगे कि किन वोटरों के नाम बहाल किए जाएं और किन्हें हटाया जाए। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, सबसे ज्यादा मामले मुर्शिदाबाद जिले में लंबित हैं (करीब 11 लाख)। इसके बाद मालदा (8.28 लाख), दक्षिण 24 परगना (5.22 लाख) और उत्तर 24 परगना (5 लाख) हैं। सबसे कम मामले झाड़ग्राम (6,682) और कालिम्पोंग (6,790) में हैं।
जब तक न्यायिक अधिकारी नामों को मंजूरी नहीं देते, तब तक ये 60 लाख लोग आने वाले विधानसभा चुनाव में वोट नहीं डाल सकेंगे। अंतिम वोटर लिस्ट में उनके नाम तो होंगे, लेकिन उनके सामने “अंडर एडजुडिकेशन” लिखा रहेगा। अगर जांच में वे सही पाए जाते हैं, तो अगली सप्लीमेंट्री लिस्ट में यह टिप्पणी हटाई जाएगी।
पिछले साल 24 जून को चुनाव आयोग ने पूरे देश में SIR की घोषणा की थी। अब तक 13 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में यह प्रक्रिया हो चुकी है, जिनमें पश्चिम बंगाल भी शामिल है। लेकिन पश्चिम बंगाल में कई ऐसे फैसले हुए, जो पहले कभी नहीं हुए थे।
राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी मनोज कुमार अग्रवाल ने कहा कि माहौल इतना अनिश्चित हो गया था कि लोग बार-बार सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। इसी वजह से न्यायिक अधिकारियों को नियुक्त करने की मिसाल बनी। इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने वालों में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी शामिल हैं।
जांच में पता चला कि राज्य में करीब 8,100 माइक्रो-ऑब्जर्वर, 37 रोल ऑब्जर्वर और एक स्पेशल रोल ऑब्जर्वर नियुक्त किए गए थे। ERO और AERO का कहना है कि बार-बार बदलते निर्देश और पोर्टल में आखिरी समय पर किए गए बदलावों से काम प्रभावित हुआ। वहीं, चुनाव आयोग के कुछ अधिकारियों ने आरोप लगाया कि बूथ लेवल अधिकारियों (BLO) और ERO द्वारा अपलोड किए गए दस्तावेजों में गड़बड़ियां थीं। जैसे कुछ मामलों में AI से बने वोटर आईडी या ऐसे पहचान पत्र अपलोड किए गए, जो आयोग की सूची में शामिल नहीं थे।
एक रोल ऑब्जर्वर ने कहा कि माइक्रो-ऑब्जर्वर सुनवाई में फैसला नहीं करते थे, लेकिन कुछ मामलों में सवाल जरूर उठाते थे। जैसे कुछ पुरुषों ने आवास प्रमाण के तौर पर ICDS प्रमाणपत्र दिया, जो आमतौर पर सिर्फ स्तनपान कराने वाली माताओं के लिए होता है। कुछ मामलों में बिना दस्तावेज अपलोड किए ही मंजूरी दे दी गई थी।
उन्होंने यह भी कहा कि कई सुनवाई ऐसे मामलों में हुई, जहां दस्तावेज अपलोड ही नहीं किए गए थे, जो असामान्य है। अब न्यायिक अधिकारी न सिर्फ ऑनलाइन अपलोड डेटा, बल्कि सुनवाई के दौरान जमा किए गए कागजात भी देखेंगे, ताकि असली मतदाताओं के नाम न कटें।
एक अन्य रोल ऑब्जर्वर ने आरोप लगाया कि SIR की शुरुआत में राज्य सरकार ने पर्याप्त स्टाफ उपलब्ध नहीं कराया, जिससे देरी और दिक्कतें हुईं। उन्होंने यह भी कहा कि अन्य राज्यों में फॉर्म जमा करते समय ही दस्तावेज ले लिए गए थे, लेकिन पश्चिम बंगाल में ऐसा नहीं हुआ, जिससे प्रक्रिया और जटिल हो गई।
कानून के मुताबिक (Representation of the People Act, 1950 की धारा 13B), वोटर लिस्ट तैयार करने और संशोधित करने का अधिकार ERO को होता है, जिसे चुनाव आयोग राज्य सरकार से सलाह लेकर नियुक्त करता है। नोटिस जारी करना, सुनवाई करना और अंतिम फैसला देना ERO या AERO का अधिकार है।
लेकिन पश्चिम बंगाल में 19 दिसंबर को चुनाव आयोग ने करीब 8,100 केंद्रीय कर्मचारियों को माइक्रो-ऑब्जर्वर के रूप में नियुक्त किया, जो दस्तावेज जांचें और सुनवाई के दौरान मौजूद रहें। अन्य किसी राज्य में ऐसा नहीं किया गया। चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि माइक्रो-ऑब्जर्वर सिर्फ मदद के लिए हैं। लेकिन तृणमूल कांग्रेस का आरोप है कि उन्होंने ERO और AERO के अधिकारों में दखल दिया है।
यह भी पढ़ें- अंतिम मतदाता सूची में ऐसे चेक करें अपना नाम
भारत निर्वाचन आयोग (ECI) 28 फरवरी को पश्चिम बंगाल के लिए अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित करेगा। पिछले सप्ताह सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने राज्य में मतदाता सूची के स्पेशल इन्टेन्सिव रिवीजन (SIR) में सहायता के लिए सेवारत और पूर्व जिला न्यायाधीशों की तैनाती का निर्देश दिया था ताकि प्रक्रिया पारदर्शी और निष्पक्ष तरीके से पूरी हो सके। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
