UP News: देश में इस समय कई जगह एलपीजी का संकट देखने को मिल रहा है। इसी बीच, वाराणसी के पास चंदौली जिले के एकौनी गांव के लोगों को एलपीजी संकट की चिंता दूर-दूर तक नहीं है। यहां पर गैस एजेंसियों पर लोगों की लंबी कतारें नहीं लगतीं, न ही काला बाजार में सिलेंडर खरीदने की होड़ मचती है।

पुष्पा सिंह हर दिन सुबह 5:30 बजे उठकर अपने छह लोगों के परिवार के लिए नाश्ता बनाती हैं। ठीक 6:30 बजे उनकी रसोई में पाइपलाइन के जरिये गैस आती है और वह दोपहर का खाना बनाने से पहले झटपट पोहा या चना और चाय बना लेती हैं। अगली बार वह रसोई में रात का खाना बनाने के लिए जाती हैं, जब शाम 6:30 बजे गैस फिर से चालू होती है।

इस गांव के 500 लोगों को बायोगैस के जरिये दिन में दो बार सुबह 6.30 बजे से 9 बजे तक और शाम को भी उतने ही समय तक ईंधन की आपूर्ति मिलती है। पुष्पा ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया, “हमें समय का पता है, इसलिए हम उसी समय में खाना बना लेते हैं। इससे हमें कोई परेशानी नहीं हुई है।” वह आपूर्ति के लिए हर महीने 400 रुपये देती हैं।

बायोगैस पर निर्भर हो चुके लोग

2022 में प्लांट की स्थापना के बाद से 125 में से 180 परिवार बायोगैस पर निर्भर हो चुके हैं। राजकुमार यादव ने कहा, “जबकि अन्य जगहों पर एलपीजी की कमी एक बड़ा मुद्दा बन गई है, हमारे गांव में यह कोई चिंता का विषय नहीं है।” प्लांट गांव के लोगों और इंजीनियर चंद्र प्रकाश सिंह के स्वामित्व वाले 700-750 वर्ग फुट के भूखंड पर स्थापित किया गया है।

2016 में चंद्र ने भोपाल के मौलाना आजाद नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में बीटेक की पढ़ाई की थी। वह नंद सदन गौशाला का प्रबंधन करने के लिए घर लौट आए। उनके पिता, नागेंद्र प्रताप सिंह, लगभग 50 गायों के साथ 4 एकड़ जमीन पर व्यवसाय चला रहे थे। जल्द ही मवेशियों की संख्या बढ़कर लगभग 200 हो गई, लेकिन प्रतिदिन लगभग 3000 किलोग्राम गोबर का प्रबंधन करना एक चुनौती थी। चंद्र आगे बताते हैं, “तभी मुझे बायोगैस प्लांट के बारे में पता चला और यह भी कि गोबर का उत्पादक इस्तेमाल कैसे किया जा सकता है।”

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उनका कहना है कि बेंगलुरु स्थित एसएएएफ एनर्जी से संपर्क करने से पहले उन्होंने बायोगैस प्लांट स्थापना में शामिल कई फर्मों से संपर्क किया था। निर्माण का काम साल 2021 में शुरू हुआ और एक साल बाद यह प्लांट चालू हो गया। बायोगैस की आपूर्ति गांव में लगभग 3.7 किलोमीटर लंबी प्लास्टिक पाइपलाइन के जाल के जरिये की जाती है। चंद्रा ने कहा, “प्रतिदिन लगभग 100 घन मीटर गैस का उत्पादन होता है।”

उनका दावा है कि यह सुविधा संभवतः राज्य में एकमात्र ऐसी सुविधा है जहां गैस का पूरा उत्पादन सामुदायिक उपयोग के लिए किया जाता है। एसएएएफ एनर्जी के सह-संस्थापक हर्षद कुलकर्णी का कहना है कि उन्हें यह परियोजना सस्टेन प्लस फाउंडेशन की तरफ से सौंपी गई थी। उन्होंने बताया कि चंद्र को चुनने से पहले उन्होंने तीन-चार उम्मीदवारों को शॉर्टलिस्ट किया था। चंद्र से उनकी मुलाकात गुजरात के राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड के माध्यम से हुई थी। प्लांट स्थापित करने की कुल लागत लगभग 80-85 लाख रुपये थी। कुलकर्णी के अनुसार, समझौते के तहत प्लांट का संचालन वे 10 सालों तक करेंगे, जिसके बाद इसे चंद्र को सौंप दिया जाएगा।

शुरुआत में हुआ था विरोध- राधे लाल

स्थानीय निवासी राधे लाल ने कहा, शुरुआत में तो इस विचार का विरोध हुआ था। गांव की प्रधान नगीना देवी के बेटे और सेना के रिटायर्ड अधिकारी कोमल यादव ने कहा कि कई ग्रामीणों ने अपने खेतों के नीचे या अपने घरों के बाहर पाइपलाइन बिछाने की अनुमति देने से इनकार कर दिया। जल्द ही, लोगों को बायोगैस के फायदों का एहसास हुआ क्योंकि यह सस्ती है। यह एलपीजी सिलेंडर की आधी दर (लगभग 978 रुपये) है।”

जिला मुख्यालय से 25 किलोमीटर दूर स्थित इस गांव में राजपूत, यादव और मुस्लिम समुदायों की आबादी है। यहां के लोग छोटे-मोटे कारोबार चलाते हैं, निजी और सरकारी नौकरियों में काम करते हैं या कृषि से जुड़े हुए हैं। हर एक घर में एक मीटर लगा हुआ है और लोगों से उनके द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली गैस की मात्रा के आधार पर शुल्क लिया जाता है।

परिवार के आकार के अनुसार खपत अलग-अलग होती है। छोटे परिवार आमतौर पर प्रतिदिन लगभग 0.7 से 0.8 घन ​​मीटर गैस का इस्तेमाल करते हैं, जबकि बड़े परिवारों को लगभग 1 घन मीटर गैस की जरूरत होती है। इसकी कीमत 20 रुपये प्रति घन मीटर है, जिसका मतलब है कि प्रति परिवार मासिक बिल लगभग 500 रुपये से 800 रुपये तक आएगा।

लेकिन लोगों ने अपने एलपीजी कनेक्शन पूरी तरह से नहीं छोड़े हैं, कुछ लोग बैकअप के तौर पर सिलेंडर रखे हुए हैं। अनीता यादव ने कहा, “अगर अचानक मेहमान आ जाते हैं और हमें जल्दी से कुछ पकाना होता है, तो हम एलपीजी का इस्तेमाल करते हैं। एक सिलेंडर अब एक परिवार के लिए तीन से चार महीने तक चल जाता है।”

एलपीजी के लिए कोई संघर्ष नहीं

लोगों का यह भी कहना है कि एलपीजी की तुलना में खाना पकाने के समय में कोई अंतर नहीं है। 45 साल की सविता देवी कहती हैं, “चूंकि आपूर्ति कुछ निश्चित घंटों तक ही सीमित है, इसलिए हम अपनी तैयारी जल्दी शुरू कर देते हैं।” तीन सदस्यों के परिवार के साथ, उनका मासिक बिल भी लगभग 400 रुपये आता है। स्थानीय गैस एजेंसी के डीलर संदीप कुमार सिंह बताते हैं कि इस गांव से बिक्री काफी कम है और एलपीजी के लिए कोई संघर्ष नहीं है।

चंद्र के अनुसार, गैस प्रोडक्शन मौसम के मुताबिक बदलता रहता है, गर्मियों में यह लगभग 80-100 घन मीटर प्रतिदिन और सर्दियों में 50-70 घन मीटर होता है। उनका कहना है कि प्रोडक्शन बढ़ने पर शेष घरों तक बायोगैस कनेक्शन पहुंचाने के प्रयास जारी हैं। उन्होंने आगे बताया कि गोबर के प्रसंस्करण के बाद बचे हुए अवशेष को खाद में बदला जाता है। लगभग एक ट्रैक्टर-लोड रोजाना उत्पादित किया जाता है। इसे किसानों को बेचा जाता है।

चंदौली में डिस्ट्रिक्ट डेवलेपमेंट मैनेजर बिजेंद्र कुमार ने कहा कि प्रशासन एकौनी गांव में बायोगैस परियोजना से अवगत है और अधिकारी नियमित रूप से साइट का दौरा करते हैं।

कैसे काम करता है प्लांट?

चंद्र के अनुसार, गौशाला से गोबर एक गड्ढे में डाला जाता है। फिर गोबर में बराबर मात्रा (1:1) में पानी मिलाया जाता है। इसके बाद इस मिश्रण को बायोगैस प्लांट में डाला जाता है, जहां एक बार में 5–6 टन सामग्री डाली जा सकती है। बिना ऑक्सीजन के यह मिश्रण सड़ता है और इससे मीथेन गैस बनती है। उपयोग से पहले गैस को साफ किया जाता है। साफ की गई गैस को प्लांट के ऊपर लगे गुब्बारे जैसे टैंक में जमा किया जाता है, जिसकी क्षमता करीब 150 घन मीटर है। इसके बाद पाइपलाइन के जरिए गैस घरों तक पहुंचाई जाती है। इस पूरे प्लांट में दो कर्मचारी काम करते हैं।

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भारत हर साल लगभग 25-26 मिलियन मीट्रिक टन एलएनजी का आयात करता है। उदाहरण के लिए, एसएंडपी ग्लोबल के अनुसार, भारत ने 2025 में लगभग 25.5 मिलियन टन एलएनजी का आयात किया था और यह आने वाले समय में बढ़कर प्रति वर्ष 28-29 मिलियन टन होने की उम्मीद है। पढ़ें पूरी खबर…