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पूर्वांचल प्रवासी तय करेंगे नगर निगम की सत्ता

नए परिसीमन के बाद तीनों निगमों में जीत की चाबी प्रवासी मतदाताओं के हाथ में रहने वाली है।

Author नई दिल्ली | January 22, 2017 1:56 AM

नए परिसीमन के बाद तीनों निगमों में जीत की चाबी प्रवासी मतदाताओं के हाथ में रहने वाली है। 2006 के परिसीमन के बाद इस बार की तरह सबसे पहले निगमों के ही चुनाव हुए थे और बसपा व अन्य दलों को कांग्रेस के बराबर वोट मिलने से महज 36 फीसद वोट पाकर ही भाजपा चुनाव जीत गई थी। 2012 के निगम चुनावों में भी यही कहानी दोहराई गई, जबकि भाजपा 1993 के बाद लगातार विधानसभा चुनाव हारती आ रही है।
इस बार तो 272 में ज्यादातर सीटों पर कुछ न कुछ बदलाव हुए हैं और करीब आधी सीटों का तो भूगोल ही बदल गया है। पिछले दो विधानसभा चुनावों में दिखा कि नई पार्टी आप के दिल्ली की राजनीति में दखल के बाद अन्य दलों को मिलने वाले वोटों में काफी कमी आई है। पिछले तीन दशक से दिल्ली की राजनीति को प्रभावित कर रहे पूर्वांचल (बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश आदि) के प्रवासियों की इस चुनाव में भूमिका बढ़ने वाली है।
बिखर गए कांग्रेस के वोट
संविधान के 47वें संशोधन के बाद पहली बार नए स्वरूप में 1997 में नगर निगम के चुनाव हुए, उसमें भाजपा जीती। इसके बाद 2002 के चुनाव में कांग्रेस को सफलता मिली। 2007 के चुनाव से ठीक पहले अदालती आदेश से रिहायशी इलाकों में व्यावसायिक गतिविधियों को बंद करवाया गया। उसी समय निगम सीटों का परिसीमन हो रहा था। पार्षदों की औकात घटाने और दिल्ली कांग्रेस पर अपना दबदबा कायम करने के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने निगम सीटों की संख्या 134 से बढ़ा कर 272 करवा दी थी। इसके बावजूद कांग्रेस चुनाव नहीं जीत पाई। भाजपा के तय वोट उसे हर इलाके में मिले, लेकिन कांग्रेस के वोट बिखर गए। 2012 के चुनाव से पहले निगम को पुनर्गठन के नाम पर तीन हिस्सों में बांटा गया। फिर भी मतों के विभाजन में बाजी भाजपा के हाथ लगी। छोटी सीटें होने के कारण बड़ी संख्या में वोट निर्दलीय और अन्य दलों को मिले और शीला दीक्षित की निगम को अपने अधीन करने की हसरत पूरी नहीं हुई।
दस साल में बदलता है राजनीतिक भूगोल
पिछली बार 2001 की जनगणना के आधार पर 2006 में निगम सीटों की परिसीमन हुआ था। तब दिल्ली की हर निगम सीट को समान बनाकर एक विधानसभा के नीचे चार-चार निगम सीटें और एक लोकसभा सीट के नीचे 40-40 निगम सीटें बनाई गर्इं। उस परिसीमन में भी नई दिल्ली और पुरानी दिल्ली की सीटें कम हुई थीं और बाहरी दिल्ली व पूर्वी दिल्ली में सीटें बढ़ी थींं। दिल्ली की निगम सीटों का परिसीमन निगम के विधान के हिसाब से हर दस साल में होता है। 2011 की जनगणना में दिल्ली की आबादी 1,67,52,894 थी। उसमें से नई दिल्ली नगर पालिका परिषद (एनडीएमसी) और दिल्ली छावनी इलाके के मतदाताओं को छोड़ने के बाद 1,64,18,663 मतदाताओं को 272 सीटों में बांटा गया है। पूर्वी दिल्ली नगर निगम में औसत 60,363, उत्तरी दिल्ली नगर निगम में 60,142 और दक्षिणी दिल्ली नगर निगम में औसत 59,751 के आधार पर सीटें बनाई गई हैं।
प्रवासी मतदाताओं से बनी नई सीटें
2006 में सभी विधानसभा सीटों के नीचे चार-चार निगम वार्ड बनाए गए थे। पिछली बार 2001 की जनगणना पर परिसीमन हुआ था और इस बार 2011 की जनगणना पर परिसीमन किया गया है। आबादी का अनुपात बराबर न होने से मटियाला में सात, विकासपुरी, बवाना और बुराड़ी में चार-चार के बजाए छह-छह, नरेला, बादली, रिठाला, मुंडका, किराड़ी, बदरपुर, उत्तमनगर, नजफगढ़, देवली, बिजवासन, करावल नगर और ओखला में पांच-पांच निगम सीटें बनेगीं। इसी तरह करीब 31 विधानसभा सीटों के नीचे चार-चार और 20 विधानसभा सीटों के नीचे तीन-तीन निगम सीटें बनी हैं।
निगम की जो भी नई सीटें बनी हैं वह प्रवासी मतदाताओं की ज्यादा आबादी से बनी हैं। दिल्ली की 70 विधानसभा सीटों में से 40 सीटें ऐसी हो गई हैं जहां पूर्वांचल के प्रवासी 20 से 60 फीसद तक हो गए हैं। इसी तरह 272 में से करीब पौने दो सौ निगम सीटें ऐसी बन गई हैं, जिनमें 20 फीसद से ज्यादा प्रवासी हैं। पहले प्रवासी कांग्रेस के मतदाता माने जाते थे, लेकिन पिछले दो विधानसभा चुनावों में वे अरविंद केजरीवाल की पार्टी आप के साथ हो गए। पिछले साल मई में निगमों की 13 सीटों के उपचुनाव में ज्यादातर इलाकों में प्रवासी कांग्रेस के साथ दिखने लगे थे। हालांकि कांग्रेस को 13 में से पांच सीटें ही मिलीं, लेकिन उसके नेता इस बात से गदगद थे कि उनके वोटर गरीब, दलित और पूर्वांचली उनके पास लौट रहे हैं। इसीलिए कांग्रेस के नेता चुनाव को लेकर जल्दबाजी में हैं। बहरहाल, तीन महीने के भीतर तो चुनाव हो ही जाएंगे। इस चुनाव से दिल्ली का मिजाज भी पता चल जाएगा और पूर्वांचल के प्रवासियों की बढ़ी हैसियत का भी अंदाजा लग जाएगा।

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