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डूसू के नतीजों से बदलेगा दिल्ली का सियासी समीकरण

माकन के मुताबिक, सीवाईएसएस ने डूसू के सचिव और संयुक्त सचिव पद के लिए चुनाव लड़ा और उसे कुल 13781 वोट मिले, जबकि इससे ज्यादा 15083 वोट नोटा को मिले। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि युवाओं ने मुख्यमंत्री केजरीवाल के समर्थन वाले संगठन को किस तरह खारिज कर दिया।

दिल्ली के मुख्‍यमंत्री अरविंद केजरीवाल (PTI file photo)

अजय पांडेय

सूबे में सियासत की नर्सरी कहे जाने वाले दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (डूसू) चुनाव परिणामों ने आम आदमी पार्टी (आप) के मुखिया व दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की युवाओं के बीच लोकप्रियता के दावों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। ईवीएम में गड़बड़ी और धांधली के आरोप के बीच जो चुनाव परिणाम आए हैं, उनके अनुसार आम आदमी पार्टी की छात्र इकाई सीवाईएसएस न केवल तीसरे नंबर पर आई है, बल्कि उसे नोटा से भी कम वोट मिले हैं। इसी आधार पर सूबे के कांग्रेसी मुखिया अजय माकन और आप के बागी नेता कपिल मिश्र आम आदमी पार्टी और उसकी छात्र इकाई को वोटकटवा करार दे रहे हैं। समझा जा रहा है कि डूसू के चुनाव परिणाम दिल्ली के सियासी समीकरणों को बदलने में भी अहम भूमिका निभाएंगे।

माकन के मुताबिक, सीवाईएसएस ने डूसू के सचिव और संयुक्त सचिव पद के लिए चुनाव लड़ा और उसे कुल 13781 वोट मिले, जबकि इससे ज्यादा 15083 वोट नोटा को मिले। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि युवाओं ने मुख्यमंत्री केजरीवाल के समर्थन वाले संगठन को किस तरह खारिज कर दिया। कांग्रेस समर्थित छात्र संगठन भारतीय राष्टÑीय छात्र संगठन (एनएसयूआइ) की प्रभारी रुचि गुप्ता कहती हैं कि सीवाईएसएस ने बमुश्किल एक हफ्ते पहले डूसू चुनाव के मद्देनजर दिल्ली विश्वविद्यालय में अपने पदाधिकारियों की नियुक्ति की और वामपंथी संगठन आइसा के साथ मिलकर चुनाव मैदान में कूद पड़ी। ऐसे में उसके चुनाव लड़ने के मकसद पर सवाल उठना लाजमी है।

कांग्रेस से नाराज केजरीवाल ने क्या उसको और उसके छात्र संगठन को सबक सिखाने के लिए अचानक अपने मंत्री व छात्र नेता रहे दिल्ली सरकार के श्रम मंत्री गोपाल राय को सक्रिय कर दिया और सीवाईएसएस डूसू चुनाव मैदान में कूद पड़ी? कांग्रेस व एनएसयूआइ के नेता इस सवाल का कोई सीधा जवाब नहीं देते, लेकिन उनका कहना है कि कांग्रेस का वोट काटने के अलावा इस फौरी फैसले का कोई दूसरा मतलब नहीं हो सकता था।

सियासी पंडितों का मानना है कि पिछले चुनाव में सीवाईएसएस मुकाबले से बाहर था जिसका फायदा एनएसयूआइ को मिला, लेकिन इस बार उसके चुनाव में उतरने का कुछ न कुछ खमियाजा उसे भुगतना पड़ा। हालांकि इस चर्चा से इतर, कहा यह जा रहा है कि अगर आप की छात्र इकाई दूसरे नंबर पर पहुंचने में कामयाब हो जाती तो माना जाता कि दिल्ली में लोकसभा चुनाव में भी मुकाबला भाजपा और आप के बीच है, कांग्रेस तो मुकाबले से बाहर है, तीसरे नंबर की पार्टी है लेकिन अब स्थिति उलट गई है। अब सत्तारूढ़ दल तीसरे नंबर पर खड़ा है। जाहिर है कि दिल्ली में शासन के अधिकारों को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद मजबूत हुए मुख्यमंत्री केजरीवाल के लिए डूसू का यह चुनाव परिणाम किसी झटके से कम नहीं है।

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