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विद्यार्थियों पर भारी पड़ता किराए का आशियाना

डीयू में एग्जीक्यूटिव काउंसिल की सदस्य और मिरांडा हाउस कॉलेज की प्रोफेसर आभा देव बताती हैं कि दिल्ली विश्वविद्यालय केंद्रीय विश्वविद्यालय है। यहां लगभग 70 कॉलेज हैं, जिनमें सात लाख छात्र-छात्राएं पढ़ते हैं। इन सात लाख विद्यार्थियों के लिए केवल 17 छात्रावास हैं, ऐसे में सभी को छात्रावास मिलना मुश्किल है।

Author August 30, 2018 3:47 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

मीना

दिल्ली में रहना और दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ना दुनियाभर के बच्चों का सपना होता है। लेकिन गोरखपुर से आए अभिनव का यह सपना तब टूट गया जब उन्हें रहने के लिए डीयू में छात्रावास नहीं मिला। मजबूरन उन्हें 10000 रुपए के किराए पर मुखर्जीनगर में पेइंग गेस्ट (पीजी) में रहना पड़ा। मेघदूत छात्रावास में रह चुकीं कंचन चौधरी बताती हैं कि उन्होंने डीयू से भूगोल में स्नातकोत्तर किया है। वे बताती हैं कि जब वह डीयू से बीए कर रही थीं और उन्हें छात्रावास नहीं मिला था, तब वह कमला नगर में 12 हजार रुपए महीने के किराए पर पीजी में रहीं। पीजी में एक तरफ मकान मालिक की दादागिरी और दूसरी ओर महंगा किराया। कंचन का कहना है बहुत से परिवारों की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होने की वजह से 5000 रुपए के किराए पर पीजी में रहते हैं।

लेडी इरविन कॉलेज से बीए कर चुकीं कीर्तिका बताती हैं कि उन्हें सालभर में कुल 90,000 रुपए छात्रावास की फीस देनी होती है। वे कहती हैं कि मेरा परिवार यह फीस देने में समर्थ है, लेकिन किसी गरीब घर के बच्चे के लिए यह रकम देना मुश्किल होगा। डीएस कोठारी छात्रावास में रहने वाले विपुल ने बताया कि यहां मेस की फीस हर साल बढ़ा दी जाती है। 2014 में मेस की फीस 3500 रुपए थी जो 2017 में 3700 कर दी गई। फिर जीएसटी आने के बाद 200 रुपए और बढ़ा दिए। वहीं मिरांडा हाउस कॉलेज ने भी एक साल में छात्रावास की फीस 16000 से बढ़ाकर 33000 रुपए कर दी। किसी गरीब घर के बच्चे के लिए यह फीस भरना बहुत मुश्किल है। इसी कॉलेज से पढ़ाई करके निकले सुधिष्ठ श्रीवास्तव ने कहा कि हरियाणा से आए उनके दो दोस्तों ने बीए में दाखिला लिया था, लेकिन छात्रावास की फीस देखकर वे वापस चले गए। डीयू में एग्जीक्यूटिव काउंसिल की सदस्य और मिरांडा हाउस कॉलेज की प्रोफेसर आभा देव बताती हैं कि दिल्ली विश्वविद्यालय केंद्रीय विश्वविद्यालय है। यहां लगभग 70 कॉलेज हैं, जिनमें सात लाख छात्र-छात्राएं पढ़ते हैं। इन सात लाख विद्यार्थियों के लिए केवल 17 छात्रावास हैं, ऐसे में सभी को छात्रावास मिलना मुश्किल है। डीयू के छात्रावासों में मेस शुल्क भी किफायती नहीं है। दिल्ली में किराए पर रहना भी खासा महंगा पड़ता है। इसलिए बच्चे अपने बजट के हिसाब से क्रिश्चियन कॉलोनी या कमला नगर में रहते हैं, लेकिन वे वहां किन परिस्थितियों में रहते हैं, यह किसी को नहीं पता होता।

हरियाणा की रहने वाली ऋतु ने बताया कि उन्होंने डीयू से हिंदी में बीए किया है। जिस कॉलेज से बीए किया उसका अपना छात्रावास नहीं था। वे गांव से आई थीं, इसलिए कहीं जल्दी पीजी भी नहीं मिला। छह महीने बाद उन्होंने नेहरू प्लेस में पीजी लिया, जिसका एक महीने का किराया 6000 रुपए था। ऋतु का कहना है कि उनके पिता मजदूरी करते थे, इसलिए इतना महंगा किराया देना उनके लिए मुश्किल था। फिर उन्होंने ट्यूशन पढ़ाकर किराए का जुगाड़ किया। आभा देव कहती हैं कि डीयू के पास पर्याप्त जमीन और पैसे हों, तभी वह नए छात्रावास बनवा सकता है। अगर सरकार रुपए दे तो यह काम हो सकता है। दूसरी बात है कि कीमतें नियंत्रित होनी चाहिए। अगर किसी शहर की अर्थव्यवस्था छात्रों के पैसों पर टिकी हो तो उस शहर की भी उनके प्रति कोई जिम्मेदारी होनी चाहिए। डीयू में छात्रावासों की कमी को देखते हुए रामजस कॉलेज के पांच छात्रों ने मिलकर योरशेल कंपनी शुरू की है।

योरशेल के सदस्य गौरव वर्मा बताते हैं कि पीजी में सुविधाओं का ध्यान रखने के बजाए बिजनेस कैसे किया जाए इस पर ध्यान दिया जाता है। इसलिए हमने योरशेल कंपनी शुरू की, जहां हम वाई-फाई, हाउसकीपिंग, लॉन्ड्री, बायोमीट्रिक प्रवेश, लाइब्रेरी, गेमिंग जोन, जिम, आॅनलाइन पेमेंट पोर्टल, करिअर काउंसलिंग सेशन, इंटर्नशिप गाइडेंस आदि सेवाएं देते हैं।
डीयू अधिनियम की धारा 33 के तहत, विश्वविद्यालय हर छात्र को आवास देने के लिए बाध्य है। लेकिन डीयू प्रशासन अपने दायित्वों को लेकर हमेशा से उदासीन रहा है। दिल्ली किराया नियंत्रण अधिनियम, 1995 उन लोगों के लिए एकमात्र उम्मीद है जो किसी निजी आवास का खर्च नहीं उठा सकते। शहर हो या विश्वविद्यालय दोनों ही छात्रों को एक अदद ठिकाना दिलाने में असमर्थ रहे हैं।

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