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कागजों पर ही बनती हैं सूखे से निपटने की योजनाएं, बुंदेलखंड-विदर्भ-मराठवाड़ा-तेलंगाना में भीषण सूखा

महाराष्ट्र की बात करें तो सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, महाराष्ट्र में 2004 से 2013 के बीच के 10 साल में 36,848 किसानों ने आत्महत्या की।

Author नई दिल्ली | Updated: April 13, 2016 2:39 AM
चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है। (फाइल फोटो)

बुंदेलखंड, विदर्भ, मराठवाड़ा, तेलंगाना के कई इलाके भीषण सूखे की चपेट में है और यह सिलसिला दशकों से जारी है, सरकार के स्तर पर योजनाएं बनती हैं और पैकेज भी जारी होते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या समितियां बनाने और योजनाओं से जुड़ी काजगी कार्यवाही कभी हालात बदल पाएगी? भारतीय किसान यूनियन के शिवनारायण परिहार ने कहा कि अगर बुंदेलखंड की बात करें तो यहां की जमीन बंजर पड़ी है। जलस्रोत सूख चुके हैं। भूमिगत जलस्तर तेजी से घटा है। सूखे से पीड़ित लोगों का लगातार पलायन जारी है। गांव के गांव खाली हो गए हैं। अवैध खनन माफियाओं ने बुंदेलखंड की जमीन को खोखला कर दिया है। एक के बाद एक समितियां बनाकर बुंदेलखंड को बचाने की खोखली एवं कागजी कार्यवाही की जा रही है। लेकिन क्या कभी समितियां हालात बदल पाई हैं?

उन्होंने सवाल किया कि बुंदेलखंड के कुल 13 जिलों में से सात उत्तर प्रदेश में जबकि छह मध्य प्रदेश में आते हैं। लेकिन इन सभी जिलों में हालात एक जैसे ही है। बुंदेलखंड की असल समस्या सूखा है लेकिन सूखे की स्थिति से निपटने के लिए क्या किया जा रहा है? यहां चल रहे अवैध खनन के काले कारनामे को रोकने के लिए क्या कदम उठाए गए? बहरहाल, बुंदेलखंड को स्थायी तौर पर सूखे से निजात दिलाने के लिए केंद्र सरकार 17 सूत्री रणनीति पर विचार कर रही है। इस विषय पर नीति आयोग ने विभिन्न मंत्रालयों के साथ बैठक की है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा बुंदेलखंड, विदर्भ और मराठवाड़ा में सूखे की स्थिति की उच्च स्तरीय समीक्षा करने के निर्देश के मद्देनजर कुछ दिन पहले प्रधानमंत्री कार्यालय में समीक्षा बैठक आयोजित की गई। इसमें उत्तर प्रदेश के वास्ते राष्ट्रीय आपदा राहत निधि (एनडीआरएफ) के अंतर्गत सूखा राहत के लिए 1304 करोड़ रुपए की राशि को मंजूरी प्रदान की गई।

बुंदेलखंड अभियान से जुड़े आशीष सागर ने कहा कि बुंदेलखंड के लोग सूखे और पानी की कमी से जूझ रहे हैं। लेकिन सुर्खिया बनती हैं कि यहां के लोग घास की रोटियां खा रहे हैं। लेकिन वास्तव में वह घास से नहीं बल्कि फिकारा से बनी है, जो एक तरह का मोटा अनाज है। बुंदेलखंड की असल समस्या घास की रोटियां नहीं बल्कि अवैध खनन है, जिस पर लगाम लगाने के लिए कुछ नहीं किया जा रहा है। सागर ने कहा कि बुंदलेखंड में 1987 के बाद यह 19वां सूखा है। पानी की कमी से जमीनें बंजर हो चुकी हैं। यहां पिछले छह साल में 3,223 किसान आत्महत्या कर चुके हैं। बुंदेलखंड से केंद्र सरकार को भारी भरकम राजस्व मिलता है। लेकिन क्षेत्र के लोग परेशान हैं।

महाराष्ट्र की बात करें तो सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, महाराष्ट्र में 2004 से 2013 के बीच के 10 साल में 36,848 किसानों ने आत्महत्या की। इस साल भी विदर्भ और मराठवाड़ा में मौत का यह तांडव जारी है। महाराष्ट्र सरकार ने तात्कालिक राहत पैकेज और दीर्घकालिक सूखा राहत पैकेज की घोषणा की। इसके अलावा केंद्र से भी सहायता मिल रही है। लेकिन क्या कपास की खेती में कंगाल हो गए किसानों की जान इससे बच पाएगी? लातूर में पानी की कमी और सूखे के हालात सूर्खियों में हैं। पहली बार रेलवे को पानी मुहैया कराने की जिम्मेदारी सौंपी गई है।

विदर्भ जन-आंदोलन समिति के किशोर तिवारी का कहना है कि जमीन बरबाद हो चुकी है, पानी है नहीं, ऐसे में नकदी फसलों का यह तिलिस्म जब तक टूटेगा नहीं, तब तक पैकेज से कुछ नहीं होगा।

आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के कई जिले सूखे से प्रभावित हैं। दोनों राज्यों ने केंद्र से सहायता मांगी है। 2015 में तेलंगाना के 443 में से 231 ग्रामीण मंडलों को सूखाग्रस्त घोषित किया गया था। केंद्र ने जनवरी 2016 में राज्य को 791 करोड़ रुपए की सहायता राशि मंजूर की। इसी तरह से 2015 के खरीफ मौसम में आंध्र्र प्रदेश में 670 में से 196 मंडलों को सूखा प्रभावित घोषित किया गया था।

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