महाराष्ट्र के डोंबिवली स्थित शास्त्रीनगर अस्पताल में गर्भवती के इलाज को लेकर शुरू हुआ विवाद अब डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ पर कथित हमले के आरोपों तक पहुंच गया है। मामले में मरीज साधना करंडे के परिवार, शिवसेना कॉर्पोरेटर रमेश म्हात्रे और अस्पताल के डॉक्टरों ने अपनी-अपनी बातें रखी हैं।
मरीज साधना करंडे की मां ने बताया कि उनकी बड़ी बेटी गर्भवती थी। सोनोग्राफी और जरूरी जांच के बाद वे उसे शास्त्रीनगर अस्पताल लेकर पहुंचे थे। परिवार ने डॉक्टरों को बताया था कि यह इमरजेंसी स्थिति है, लेकिन अस्पताल की ओर से मरीज को सायन अस्पताल ले जाने की सलाह दी गई।
मां का कहना है कि उन्होंने डॉक्टरों से कई बार विनती की कि बेटी की हालत गंभीर है। बाहर बारिश और पानी भरने की वजह से दूसरे अस्पताल पहुंचने में काफी समय लग सकता है। उन्होंने डर जताया कि इलाज में देरी होने पर बेटी और बच्चे की जान को खतरा हो सकता है।
उन्होंने कहा कि जब अस्पताल से मदद नहीं मिली तो उन्होंने शिवसेना कॉर्पोरेटर रमेश म्हात्रे को फोन किया और पूरी स्थिति बताई। मां के मुताबिक, म्हात्रे ने भी सवाल उठाया कि इतनी गंभीर हालत में अस्पताल इलाज से इनकार क्यों कर रहा है।
परिवार का आरोप है कि डॉक्टर फोन भी नहीं उठा रहे थे, जिसके बाद मदद के लिए रमेश म्हात्रे अस्पताल पहुंचे। मां ने दावा किया कि उनके खिलाफ दर्ज मामला गलत है और वे हमेशा जरूरतमंद लोगों की मदद करते रहे हैं।
रमेश म्हात्रे बोले- डॉक्टर पर हाथ नहीं उठाया, घटना पर जताया खेद
शिवसेना कॉर्पोरेटर रमेश म्हात्रे ने घटना पर खेद जताते हुए कहा कि उन्होंने महिला डॉक्टर के साथ मारपीट नहीं की। उनका कहना है कि सीसीटीवी फुटेज को कैमरे के एंगल की वजह से गलत समझा जा रहा है।
म्हात्रे के मुताबिक, बातचीत के दौरान डॉक्टर फोन पर व्यस्त थीं। उनका ध्यान खींचने के लिए उन्होंने केवल हाथ पर हल्का स्पर्श किया था। उन्होंने कहा कि वे महिलाओं का सम्मान करते हैं और किसी महिला के साथ गलत व्यवहार नहीं कर सकते। उन्होंने अस्पताल की व्यवस्थाओं में कमी को भी इस विवाद की वजह बताया और कहा कि भविष्य में ऐसी स्थिति न बने, इसके लिए सुधार जरूरी हैं।
श्रीकांत शिंदे ने डॉक्टरों पर हमले की निंदा की
श्रीकांत शिंदे ने इस मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ पर हुए कथित हमले को निंदनीय बताया। उन्होंने कहा कि डॉक्टरों का काम केवल नौकरी नहीं बल्कि मानव सेवा है। कठिन परिस्थितियों में भी डॉक्टर, नर्स और स्वास्थ्यकर्मी लोगों की जान बचाने के लिए काम करते हैं।
उन्होंने साफ कहा कि कानून हाथ में लेने वालों को बख्शा नहीं जाएगा। मामले में दोषी पाए जाने वालों पर कानूनी कार्रवाई होगी और पार्टी भी ऐसे लोगों का समर्थन नहीं करेगी।
डॉक्टरों का आरोप- अस्पताल पहुंचकर की गई मारपीट
दूसरी ओर अस्पताल के डॉक्टरों और नर्सों का आरोप है कि मरीज को दूसरे अस्पताल रेफर करने के विवाद के बाद रमेश म्हात्रे और उनके समर्थक अस्पताल पहुंचे और मेडिकल स्टाफ के साथ मारपीट की। अस्पताल प्रशासन के अनुसार, एक महिला डॉक्टर, दो अन्य डॉक्टरों और तीन नर्सों के साथ कथित तौर पर हाथापाई की गई।
डॉक्टरों का कहना है कि जांच के बाद परिवार को बताया गया था कि जन्म के बाद बच्चे को नवजात गहन चिकित्सा इकाई (NICU) की जरूरत पड़ सकती है। लेकिन अस्पताल में एनआईसीयू के सभी बेड उपलब्ध नहीं थे, इसलिए मरीज को दूसरे अस्पताल ले जाने की सलाह दी गई थी।
विरोध में डॉक्टरों और नर्सों ने किया काम बंद
घटना के विरोध में डॉक्टरों, नर्सों और अन्य स्वास्थ्यकर्मियों ने काम बंद कर दिया। उन्होंने अस्पताल में सुरक्षा बढ़ाने और आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की।
कई कर्मचारियों ने बताया कि घटना के बाद वे डर और तनाव में थे। कुछ कर्मचारियों ने कहा कि इस तरह की घटना से उनका मनोबल प्रभावित हुआ है। चीफ मेडिकल ऑफिसर डॉ. सादिया पिंजारी ने स्वास्थ्यकर्मियों के खिलाफ हिंसा की निंदा करते हुए सख्त कार्रवाई की मांग की।
सेंट्रल महाराष्ट्र एसोसिएशन ऑफ रेजिडेंट डॉक्टर्स (MARD) ने भी मामले की निष्पक्ष जांच और दोषियों पर कार्रवाई की मांग की है। संगठन के अध्यक्ष डॉ. अथर्व शिंदे ने कहा कि मामले की जानकारी जुटाई जा रही है और संबंधित विभागों को ज्ञापन दिया जाएगा।
पांच लोगों पर मामला दर्ज
महाराष्ट्र पुलिस के अनुसार, इस मामले में चार पुरुषों और एक महिला समेत पांच लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया गया है। आरोपियों पर सरकारी कर्मचारी के खिलाफ आपराधिक बल प्रयोग, धमकी और महाराष्ट्र मेडिकेयर सर्विस पर्सन्स एक्ट के तहत कार्रवाई की गई है। फिलहाल यह मामला मरीज के इलाज में लापरवाही के आरोप और डॉक्टरों पर कथित हमले के बीच जांच के दायरे में है। दोनों पक्षों के दावों की जांच के बाद ही पूरी तस्वीर साफ हो पाएगी।
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अस्पताल उपचार का केंद्र होते हैं, लेकिन कई बार वे खुद ही बीमार नजर आते हैं। यह कहने और सुनने में अजीब लग सकता है, लेकिन देश के स्वास्थ्य तंत्र की इस सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता। जिन स्वास्थ्य संस्थानों पर हम जीवन बचाने का भरोसा करते हैं, वही कई बार संसाधनों की कमी, प्रबंधन की विफलता और बढ़ती व्यावसायिकता की वजह से संकट का कारण बन जाते हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर ज्यादा दबाव है, या फिर इसे खुद इलाज की जरूरत है।
