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दिनेश शाक्य की रिपोर्ट : हांगकांग और थाइलैंंड में पहली पसंद बने इटावा के कछुए !

उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के तालाबों में आमतौर पाए जाने वाला जियोकिल्मसहैमिलटोनी यानि ब्लैकपांड टर्टल दुर्लभ प्रजाति के कछुओं की हांगकांग और थाइलैंड में अत्यधिक तस्करी हो रही है।

Author इटावा | June 16, 2016 4:55 AM
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उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के तालाबों में आमतौर पाए जाने वाला जियोकिल्मसहैमिलटोनी यानि ब्लैकपांड टर्टल दुर्लभ प्रजाति के कछुओं की हांगकांग और थाइलैंड में अत्यधिक तस्करी हो रही है। जियोकिल्मसहैमिलटोनी यानी ब्लैकपांड टर्टल जैसे कछुओं की मांग बढ़ने के पीछे खास वजह उनका बेहद खूबसूरत होना है। वास्तु शास्त्रियों की सलाह पर घरों में खूबसूरती बढ़ाने के लिए कांच के बर्तनों में कछुओं को रखे जाने का चलन लगातार बढ़ता ही चला जा रहा है। इसके पीछे यह भी माना जा रहा है, घर में इन कछुओं को रखने से सुख-समृद्धि आती है।

सुडुल वन प्रजाति के कछुओं की एक खेप को उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के जसंवतनगर में बरामद किया गया है। जसवंतनगर में यह कबाड़ी शांति प्रसाद से 50 कछुए बरामद किए गए हैं। इटावा के एसएसपी पीयूष श्रीवास्तव ने बताया कि शांति प्रसाद गिहार कबाड़ी के यहां क्राइम ब्रांच ,जसवंतनगर थाना पुलिस एवं वन विभाग बसरेहर रेंज की टीमों ने संयुक्त रूप से छापा मारा तो वहां पर बोरों में कछुओं को भरते हुए कबाड़ी को रंगे हाथ पकड़ लिया गया है और उसके कब्जे से 50 कछुए बरामद किए गए हैं। वन विभाग के दरोगा विवेकानंद दुबे के अनुसार बरामद कछुए अत्यंत दुर्लभ किस्म के हैं। कछुओं को जंतुविज्ञान में जियोकिल्मसहैमिलटोनी के नाम से जाना जाता है। बरामद कछुओं की कीमत लाखों रुपए में बताई जा रही है। यहां से इन कछुओं को बंगाल भेजा जाता है जहां कछुओं को हजारों रुपए में बेचा जाता है। पुलिस ने भारतीय वन्य जन्तु संरक्षण अधिनियम के तहत दर्ज किया है।

वन्यजीवों के संरक्षण की दिशा में काम कर रहे सोसायटी फार कंजरवेशन आफ नेचर के सचिव डा. राजीव चौहान के अनुसार यह कछुए जियोकिल्मसहैमिलटोनी प्रजाति के हैं। लोग इन्हें एक्वेरियम में रखते हैं। इसका यौनवर्धक दवाओं में भी प्रयोग किया जाता है। कछुओं की तस्करी का यह काम आज शुरू नहीं हुआ है। बरसों से तस्कर इस काम में लगे हैं। इस इलाके में चंबल, यमुना, सिंधु, क्वारी और पहुज जैसी अहम नदियों के अलावा छोटी नदियों और तालाबों में कछुओं की भरमार है। 1979 में सरकार ने चंबल नदी के लगभग 425 किलोमीटर में फैले तट से सटे हुए इलाके को राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य घोषित किया था। इसका मकसद घड़ियालों, कछुओं (रेड क्राउंड रूफ टर्टल यानी गर्दन पर लाल व सफेद धारियों वाले शाल कछुए) और गंगा में पाई जाने वाली डाल्फिन (राष्ट्रीय जल जीव) का संरक्षण था। मगर, यहां हुआ कुछ उल्टा ही। दरअसल, इस अभयारण्य की हदें उत्तर प्रदेश के अलावा मध्य प्रदेश और राजस्थान तक फैली हुई हैं। इसमें से 635 वर्ग किलोमीटर उत्तर प्रदेश के आगरा और इटावा में है।

इनमें से इटावा कछुओं की तस्करी का केंद्र बन गया। अभयारण्य बनने के एक साल बाद यानी 1980 से आज तक इटावा में ही सौ से भी अधिक तस्कर गिरफ्तार किए जा चुके हैं, जिनके पास से कुल 85 हजार से ज्यादा कछुए बरामद किए गए। इनमें से 14 तस्कर पिछले दो बरसों में पकड़े गए हैं, जिनके पास से 12 हजार से ज्यादा कछुए बरामद हुए। अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं कि जब इतने कछुए पकड़ में आए तो कितने सप्लाई हो चुके होंगे। यह धंधा सैकड़ों रुपए प्रति कछुए से शुरू होकर हजारों-लाखों के खेल तक पहुंचता है।

आखिर इतने कछुओं का होता क्या है?
वन्य जीव संस्था सोसाइटी फॉर कंजरवेशन आॅफ नेचर के सचिव डा. राजीव चौहान के अनुसार कछुओं की सप्लाई पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश के रास्ते चीन, हांगकांग और थाइलैंड जैसे देशों तक की जाती है। वहां लोग कछुए के मांस को पसंद करते हैं। साथ ही इसे पौरुषवर्धक दवा के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता है। इन तमाम देशों में कछुए के सूप और चिप्स की जबरदस्त मांग है। 2012 के विधानसभा चुनाव से पहले गाड़ियों की चेकिंग के दौरान पकड़े गए ट्रक में दो हजार से अधिक कछुए बरामद हुए थे। गिरफ्तार किए गए चार तस्करों ने बताया कि ये सारा माल पश्चिम बंगाल तक पहुंचाना होता है। उसी दौरान दो ट्रकों में 11 हजार कछुए और पकड़े गए। यह माल भी पश्चिम बंगाल भेजा जा रहा था। इसी तरह जनवरी में औरैया में 2500 कछुए पकड़े गए थे। वहां के तत्कालीन एसपी अब्दुल हमीद ने भी यही बात कही थी कि सारा माल बांग्लादेश, थाइलैंड, चीन और मलेशिया सप्लाई किया जाना था।

टरटलवाइज एंड इंटरनेश्नल की रिपोर्ट के मुताबिक चीन में केवल खोल की जेली बनाने के लिए ही सालाना 73 हजार कछुए मारे जाते हैं। वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड (डब्लूडब्लूएफ) का मानना है कि इस जबरदस्त मांग को पूरा करने के लिए कई देशों से कछुओं की तस्करी की जाती है। इसी तरह थाइलैंड और हांगकांग में भी कछुओं की बहुत मांग है। उन्हें बचाने के तमाम प्रयास (जिनमें कुछ कानून बनाना भी शामिल है) इसलिए ज्यादा कामयाब नहीं हो सके हैं क्योंकि इन देशों में परंपरागत रूप से किसी न किसी तरह कछुओं का इस्तेमाल होता रहा है।

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