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मैं पात-पात

दिल्ली में 25 लाख तिरंगा बांटने और हर हाथ तिरंगा अभियान को आगे बढ़ाने पर भी जोर है।

मैं पात-पात

दिल्ली की सरकार और केंद्र सरकार के बीच कुछ दिनों से नोक-झोंक बढ़ गई है। खास कर ‘फ्री की रेवड़ी बांटने’ वाले बयान के बाद ! वैसे भी देश में बड़ा नेता कौन इसको लेकर हर राज्य में अलग ही नूराकुश्ती दिख रही है। सभी अपने आप को साबित करने में जुटे हैं, खासकर विपक्ष के नेताओं में यह ज्यादा असरदार तरीके से दिखता है। इसी में दिल्ली के नेता भी विपक्ष खेमे में अपने आप को साबित करने में जुटे रहते हैं। वे केंद्र की सरकार से किसी भी हालत में पीछे नहीं रहना चाहते। इसका नमूना भी दिख जाएगा।

केंद्र ने हर घर तिरंगा अभियान का आ’’ान किया तो दिल्ली की सरकार ने भी एक कदम आगे बढ़कर अपने विभाग से 11 से 17 अगस्त तक तिरंगा अभियान की घोषणा बसों और चौराहों के जरिए कर दी। साथ ही उन्होंने 15 की जगह 14 अगस्त को हाथ में तिरंगा लेकर राष्ट्रगान गाने की अपील लोगों से कर दी। दिल्ली में तो 25 लाख तिरंगा भी बांटने और हर हाथ तिरंगा अभियान को आगे बढ़ाने पर भी जोर है। किसी ने ठीक ही कहा- दिल्ली की नीति साफ है। अगर कोई डाल-डाल है तो यहां सरकार पात-पात वाली है!

बुरे फंसे नेताजी

दिल्ली से सटे उत्तर प्रदेश के औद्योगिक क्षेत्र में इन दिनों दो नेताओं की वजह से हुए टकराव ने खूब चर्चा बटोरी। इनमें एक सत्ता पक्ष में माननीय जनप्रतिनिधि हैं जो अपने क्षेत्र में काफी लोकप्रिय बताए जाते हैं, तो दूसरे जनप्रतिनिधि बनने की ख्वाहिश पाले हैं, हालांकि वो बात अलग है कि हसरत पालने वाले नेता की राजनीति जनता पर हाथ उठाकर और उनको गाली देने वाली हरकत को समर्थन करती दिखी। बात पिछले दिनों एक सोसाइटी में अतिक्रमण करने को लेकर बिगड़ी और मामला एक महिला पर हाथ उठाने तक जा पहुंचा।

तथाकथित नेता को पुलिस ने गिरफ्तार किया और असली नेता जनता के बीच पहुंचे। उनकी पुलिस से नोकझोंक भी हुई। वहीं, गिरफ्तारी के बाद इस मामले में पुलिस अधिकारियों का पक्ष पूरी तरह से हवा हो गया और आरोपी के समर्थन करने वालों के अब निशाने पर जनता का भला चाहने वाले केवल नेताजी हैं। हालांकि अब मामला एक नेता और एक तथाकथित नेता की जातियों में टकराव तक पहुंच गया है। दोनों समाज के लोग अपने-अपने नेता के पक्ष में खड़े हैं।

अंदाज बदला-बदला

दिल्ली में एक पार्टी के नेता अभी हाल ही में कुर्सी पाए हैं। पिछले चुनावों में हारते-हारते इस बार उनकी जीत का पत्ता खुल गया। हालांकि इससे पहले ही नेता जी निगम की जिम्मेदारी संभाल रहे थे और प्रेस के सामने कुछ न कुछ पोल पट्टी निगम में सत्ता पक्ष के नेताओं की खोलते रहते थे। पर मजे की बात यह है कि पहले जहां उनके साथ पार्टी के एक-दो नेता प्रेस कांफ्रेंस के दौरान उनके साथ होते थे ओर उन्हें भी उन मुद्दों पर बोलने का मौका दिया जाता था।

वह अब साथ में बैठने वाले नेता जी कम ही मौका दे रहे हैं। इसको लेकर पार्टी के अंदरखाने यह चर्चा जोरों पर है कि जब तक नेता जी को सदन में कुर्सी मिली, तबसे उनका मिजाज बदला गया है। फिलहाल चुनाव भी नजदीक नहीं है। इस कारण दूसरे नेता खुलकर बोलने की बजाया कानाफुसी कर ही काम चला रहे हैं।

शिविर से प्रचार

नई दिल्ली नगर पालिका परिषद इन दिनों सुविधा शिविर लगा रही है। जनता सुनवाई से लोगों की समस्याओं को दूर करने का दावा किया जा रहा है। लेकिन क्या सच में समस्याएं दूर हो रही हैं। बताते हैं कि इस तरह के शिविर पहले नगर निगम भी लगाने का दावा करता था। लेकिन परिणाम वही ढ़ाक के तीन पात वाली रही। बेदिल को शिविर के काम से जुड़े एक अधिकारी ने बताया कि समस्याओं का शिविर दरअसल शोर ज्यादा और काम कम करता दिखता है।

यहां समस्याएं ढेर आ रही हैं लेकिन निस्तारण संतोषजनक हो जाए तो भाग्य से। समस्याओं पर ज्यादातर आश्वासन ही मिलता दिखता है। हालांकि दबी जुबान लोग यह भी कह रहे हैं कि इससे संदेश देने की कोशिश है कि दिल्ली की सत्ता पर काबिज पार्टी के मुकाबले परिषद में बैठे पार्टी के नेताओं को जनता की ज्यादा फिक्र है। इस प्रकार के काम या कहें कि शिविर पहले भी लगते रहे हैं। अंतर बस इतना है कि पहले प्रचार नहीं किया जाता था अब प्रचार कर वाहवाही बटोरी जा रही है।

सियासत में संयंत्र

सियासत के लिए कुछ भी करेंगे। इन दिनों यह बात दिल्ली की एक विपक्षी पार्टी पर एकदम सटीक बैठती है। हाल ही में पार्टी ने सीवर के पानी को साफ करने वाले संयंत्र (एसटीपी) की रिपोर्ट का हवाला देते हुए दिल्ली सरकार पर गंदे पानी की आपूर्ति किए जाने का ठिठरा फोड़ा है। लेकिन सत्त के गलियारे में चर्चा चली कि इन नेताओं को यह पता नहीं कि एसटीपी का पानी पीने के लिए नहीं हरियाली के लिए प्रयोग किया जाता है।

जल शोधन संयंत्र से आने वाला पानी ही घरों तक पीने के लिए पहुंचता है। लेकिन बयान जारी कर उपराज्यपाल तक को जांच की शिकायत कर दी है। बेदिल को लोगों की बातों से पता चला कि सरकार पर यमुना नदी में गंदा पानी छोड़ने का आरोप लगाया होता तो काफी हद तक यह बात सही साबित होती, लेकिन पानी पिलाने वाली बात तो कहीं से हजम नहीं हो रही। कौन समझाएं एसटीपी का पानी पीया नहीं जाता।
-बेदिल

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