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देवगढ़ मंदिरों का गढ़

बुंदेलखंड की जीवन दायिनी बेतवा नदी की गोद में बसा देवगढ़ भारतीय पुरातत्व के अनूठे आगार अपने आंचल में छिपाए है

Author Updated: November 18, 2019 1:52 AM
भारतीय पुरातत्व विभाग को देवगढ़ से 200 शिलालेख मिले हैं, जो जैन मदिरों मूर्तियों और गुफाओं आदि में अंकित हैं।

सुरेन्द्र अग्निहोत्री
सलितपुर जनपद (उत्तर प्रदेश) के दर्शनीय स्थलों में प्राचीन भारतीय संस्कृति, कला और दर्शन का गौरवशाली प्रतीक देवगढ़ बेतवा नदी के किनारे ललितपुर स्टेशन से 33 किमी की दूरी पर है। बुंदेलखंड की जीवन दायिनी बेतवा नदी की गोद में बसा देवगढ़ भारतीय पुरातत्व के अनूठे आगार अपने आंचल में छिपाए है। आध्यात्मिकता से परिपूर्ण इस क्षेत्र का प्राचीन नाम ‘लूच्छिगिरि’ था। शांति नाथ मंदिर से प्राप्त शिलालेख के अनुसार गुर्जर प्रतिहार वत्सराज आम के प्रपौत्र और भट्ट द्वितीय का शासन काल था। 12वीं शताब्दी के मध्य इस क्षेत्र का कीर्तिगिरि रखा गया।

दशावतार मंदिर
गुप्तकालीन मूर्तिकला की पंचायत शैली का दशावतार मंदिर प्रवेश करते ही मिलता है। इसकी कला के संबंध में पुरातत्ववद् िस्मिथ कहते हैं कि देवगढ़ में गुप्तकाल का सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण और आकर्षक स्थापत्य है। इस मन्दिर की दीवारों पर तीन प्रस्तर-फलक लगे हैं। एक फलक पर गजेन्द्र मोक्ष का दृश्य उत्कीर्ण है। दक्षिण की ओर के फलक पर शेषाशयी विष्णु हैं। विष्णु शेष नागों के फनों की छाया में लेटे हुए हैं, लक्ष्मी जी उनका पैर दबा रही हैं। आकाश में इन्द्र, शिव आदि देव अपने वाहनों से इस लीला को देख रहे हैं। नीचे पांच पुरुष व एक स्त्री की आकृति बनी हुई है। स्त्री की आकृति अपने बाल खोले हुए है। इससे यह प्रतिबिम्बित होता है कि यह दृश्य पांच पांडव व द्रोपदी का है। तीसरे फलक पर बद्रिकाश्रम का दृश्य अंकित है। शेर व हिरण को साथ-साथ तपोभूमि में विचरण करते दिखाया है। इस मन्दिर से तीन किलोमीटर पहाड़ पर पंचायतन शैली का एक दक्षिणाभिमुख नृबराह मंदिर के भाग्नावशेष मौजूद हंै। इसके गर्भगृह के ऊपर पीठिका पर लेटे अंजलि मुद्रा में नाग व नागिन बनी हुई है। ऊपरी भाग में भगवान नृबराह की विशाल प्रतिमा थी। अब सरकारी मालखाने में रखी है।

जैन मंदिर और मूर्तिकला
देवगढ़ में इस समय 31 जैन मंदिर हैं। जिनकी स्थापत्य कला मध्य भारत की अपूर्व देन है। इनमें से नंबर 4 के मंदिर में तीर्थकर की माता सोती हुई स्वप्नावस्था में विचार मग्न मुद्रा में दिखलाई गई है। नंबर 5 का मंदिर सहसकूट चैत्यालय जिसकी कलापूर्ण मूर्तिंयां अपूर्व दृश्य दिखलाती हैं। इस मंदिर के चारों ओर 1008 प्रतिमाएं खुदी हुई हैं। बाहर सं. 1120 का लेख भी उत्कीर्णित है, जो सम्भवत: इस मंदिर के निर्माण काल का ही द्योतक हैं। नंबर 11 के मंदिर में दो शिलाओं पर 24 तीर्थंकरों की बारह-बारह तीर्थकार-प्रतिमाएं अंकित हैं। इस सब में सबसे विशाल मंदिर नंबर 12 है जो शांतिनाथ मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है। इसमें शांतिनाथ भगवान की 12 फुट उत्तुंग जिन-प्रतिमा विराजमान है। चारों कोनों पर अम्बिका देवी की चार मूर्तियां हंै, जो मूर्तिकला के गुणों से समन्वियत हैं। इस मंदिर की बाहरी दीवार पर 24 यक्षयक्षिणियों की सुंदर कला-कृतियां बनी हुई है।

आर्य नागर शैली में मंदिर
देवगढ़ के जैन मंदिरों का निर्माण उत्तर भारत के विकसित आर्य नागर शैली से अत्यन्त भिन्न है। नागर शैली का विकास गुप्तकाल में हुआ है। देवगढ़ में तो उक्त शैली का विकास पाया ही जाता है, किन्तु खजुराहों आदि के जैन मंदिरों में भी इसी कला का विकास देखा जाता है। यह कला पूर्ण भारतीय है। इस कला का गुप्त, गुर्जर, प्रतिहार और चंदेलवंशी राजाओं के राज्यकाल में पल्लवित और विकसित होने का प्रश्रय मिला है।
देवगढ़ की मूर्तियों में दो प्रकार की कला देखी जाती है। प्रथम आकार की कला में कलाकृतियां अपने परिकारों से अंकित देखी जाती है। दूसरी प्रकार की कला मुख्य मूर्ति पर ही अंकित है, उसमें अन्य अलंकरण और कलाकृतियां गौण हो गई हैं। मालूम होता है कि इस युग में सामप्रदायिक विद्वेष नहीं था, और न धर्मान्धता ही थी। इस युग में भारतीय कला का विकास जैनों, वैष्णवों और शैवों में निर्विरोध हुआ है। प्रस्तुत देवगढ़ जैन और हिंदू संस्कृति का संधिस्थल रहा है।

महत्त्वपूर्ण शिलालेख
भारतीय पुरातत्व विभाग को देवगढ़ से 200 शिलालेख मिले हैं, जो जैन मदिरों मूर्तियों और गुफाओं आदि में अंकित हैं। इसमें 60 शिलालेख ऐसे हैं जिनमें समय का उल्लेख दिया हुआ है। ये शिलालेख सं 600 से 1876 तक के उपलब्ध हैं। इनमें सं 609 सन 552 का लेख नाहर घाटी से प्राप्त हुआ था। इसमें सूर्यवंशी स्वामीभट्ट का उल्लेख है। सं. 919 का शिलालेख जैन संस्कृति की दृष्टि से प्राचीन है। इस लेख में भोजदेव के समय पंच महाशब्द प्राप्त महासामन्त विष्णु-राम के शासन में इस लच्छागिरि के शिष्य आचार्य श्रीदेव लारा नक्षत्र में प्रतिष्ठित किया था। शांति मंदिर के बाहर अठारह लिपि वाला शिलालेख उत्कीर्णित है। जिसे ‘ज्ञानशिला’ के नाम से पुकारा जाता है।

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