राजस्थान के कोटा में चंद्रसाल मठ के मुख्य पुजारी देवानंद महाराज की हत्या इस वक्त चर्चा में है। देवानंद महाराज की हत्या इस महीने की शुरुआत में उनके आवास के बाहर कर दी गई थी। उनके ऊपर 26 बार चाकू से हमला किया गया था। माना जा रहा है कि इस हत्या के पीछे 10वीं सदी के चंद्रसाल मठ, उसके ट्रस्ट और 345 बीघा जमीन पर नियंत्रण को लेकर चल रहा विवाद हो सकता है। इस पूरे विवाद में जाति, धर्म, सत्ता और पैसे का जटिल खेल भी शामिल बताया जा रहा है।

5 जून को 35 वर्षीय देवानंद की हत्या के आरोप में गिरफ्तार किए गए आठ लोगों में एक अन्य मठ पुजारी नंदन बन और कोटा के वकील संतोष कुमार राय शामिल हैं। मामले की जांच कर रहे बोरखेड़ा पुलिस स्टेशन के थाना अधिकारी अनिल टेलर के अनुसार, हत्या को अंजाम देने के लिए एक नाबालिग सहित चार लोगों भाड़े पर लिया गया था।

जांचकर्ताओं और ट्रस्ट के सदस्यों का कहना है कि देवानंद और राय के बीच विवाद बढ़ता जा रहा था। जिन्होंने मंदिर और उसकी संपत्तियों को नियंत्रित करने वाले मठ निकाय में नामांकन को लेकर एक नागरिक विवाद में ट्रस्ट का प्रतिनिधित्व किया था।

देवानंद के परिवार का कहना है कि उनकी हत्या से पांच महीने पहले उन्हें जान से मारने की धमकियां मिली थीं। उनके कहा गया था कि वह मठ को छोड़ दें। उनके भाई बुधराज गुर्जर ने कहा कि यह रिकॉर्डिंग पुलिस को सौंप दी गई हैं।

देवानंद ने 2018 में त्याग दिया था घर

राजस्थान के सवाई माधोपुर जिले के राजवाना गांव में जन्मे देव शंकर पोसवाल का विवाह 2006 में 15 वर्ष की आयु में हुआ था। देवानंद ने 2018 में घर छोड़ दिया और संसार का त्याग कर दिया। वे पहले चंद्रसाल मठ के नाम से जाने जाने वाले दशनाम संन्यासी संप्रदाय के अंतर्गत आने वाले जूना अखाड़ा से जुड़े थे। अंतर यह है कि जहां जूना अखाड़ा विद्वान-तपस्वी परंपरा बन पंथ का अनुसरण करता है, वहीं जूना अखाड़ा योद्धा-तपस्वी परंपरा गिरि पंथ का अनुसरण करता है।

दोनों संप्रदायों के बीच स्थानांतरण परंपरागत रूप से वर्जित होने के कारण मतभेद उत्पन्न हुए। चंद्रसाल महादेव मंदिर ट्रस्ट के सदस्य 70 वर्षीय बृजमोहन स्वीकार करते हैं कि जब उन्होंने पदभार ग्रहण किया, तो बहुत से लोगों को आपत्ति थी।

सांप्रदायिक मतभेदों के साथ-साथ जातिगत तनाव भी व्याप्त था। जिसमें न्यासियों के एक वर्ग ने देवानंद पर अपने गुर्जर समुदाय के सदस्यों का पक्षपात करने का आरोप लगाया। न्यास के एक सदस्य का कहना है कि गुर्जर चाहते थे कि देवानंद मठ का कार्यभार संभालें ताकि भूमि पर उनका अधिकार सुरक्षित रहे।

साल 2004 में जब देवानंद ने अपना प्रभुत्व मजबूत करना शुरू किया, तब जाकर इस विवाद ने अपना वर्तमान रूप लिया। इसके केंद्र में विवादित मंदिर की 345 बीघा या 215 एकड़ भूमि थी।

विवाद के केंद्र में मंदिर की भूमि

जांचकर्ताओं और ट्रस्ट के सदस्यों का कहना है कि यह विवाद लगभग आधी सदी पुराना है, जब तत्कालीन महंत शरवन बन ने मंदिर की 500 बीघा जमीन बेचने का फैसला किया था, जिसका अधिकांश हिस्सा निजी हाथों में चला गया। 1998 में दान की गई जमीन के हस्तांतरण का पता चलने पर आसपास के गांवों के निवासियों ने 500 बीघा जमीन में से 345 बीघा जमीन, जिसका वे पता लगाने में कामयाब रहे थे। उसको वापस पाने के लिए एक दीवानी मुकदमा दायर किया।

साल 2003 में जब अदालत में मामला चल रहा था, तब स्थानीय निवासियों ने राज्य सरकार से एक ट्रस्ट पंजीकृत करने की मांग की। इस कदम से मठ की संपत्तियों पर महंत का नियंत्रण खत्म हो गया और उनकी भूमिका केवल देखरेख करने वाले और प्रबंधक तक सीमित रह गई। उस समय शरवन बन के परिवार का कहना था कि यह जमीन उनकी निजी संपत्ति है।

2016 में वर्षों की सुनवाई के बाद अदालत ने फैसला सुनाया कि संपत्तियां मठ परिवार की हैं। हालांकि, एक ट्रस्ट सदस्य का कहना है कि संपत्ति विवाद और उससे संबंधित सभी अपीलों का अंतिम निपटारा होने तक अदालत ने एक रिसीवर नियुक्त किया।

सदस्य का कहना है कि अदालत ने यह भी माना कि 345 बीघा में से 270 बीघा कृषि भूमि थी। जिसकी हर साल तहसीलदार द्वारा नीलामी की जाएगी और उससे प्राप्त धन बैंक खाते में जमा किया जाएगा। सदस्य ने कहा कि यह राशि अब 4 करोड़ रुपये हो गई है। यह धन भी विवाद का विषय बन गया है। इस आदेश को अतिरिक्त जिला न्यायाधीश-प्रथम की अदालत में चुनौती दी गई थी। जहां मामला अभी भी लंबित है। पिछली सुनवाई 27 मई को हुई थी।

एक नया मोड़

इस साल की शुरुआत में राय उस समय सामने आए जब मठ पहले से ही देवानंद के पक्ष और विपक्ष में बंटा हुआ था। खबरों के मुताबिक, राय ने मुफ्त में मुकदमा लड़ने की पेशकश की थी, लेकिन धीरे-धीरे देवानंद के विरोधियों के बीच उनका प्रभाव बढ़ता गया। ट्रस्ट के सदस्यों का दावा है कि राय ने सात खाली ट्रस्ट पदों पर अपने निजी उम्मीदवारों को नियुक्त करने की कोशिश की, जिससे मठ की संपत्तियों पर उनका नियंत्रण हो सकता था और देवानंद को नुकसान पहुंच सकता था। बुजुर्ग ट्रस्टी भी मुकदमेबाजी संभालने के लिए राय पर निर्भर थे, जिससे वे ट्रस्ट के मामलों में एक महत्वपूर्ण व्यक्ति बन गए।

ट्रस्ट के एक सदस्य का कहना है कि राय मठ जाया करते थे और अन्य सदस्यों से संपर्क करते थे। अदालत में उनका प्रतिनिधित्व करते थे, लेकिन देवानंद पीछे नहीं हटे। दूसरी ओर, उन्होंने ट्रस्ट में अपने समर्थकों का साथ देते हुए इस लड़ाई में हिस्सा लिया।

राजस्थान के देवस्थान विभाग के रिकॉर्ड, जो राज्य के धार्मिक बंदोबस्त, ट्रस्टों और ऐतिहासिक मंदिरों का प्रबंधन करता है। उससे पता चलता है कि देवानंद ने ट्रस्ट में नाम जोड़ने के लिए आवेदन किया था, जिस कदम पर राय ने आपत्ति जताई थी।

विभाग के एक अधिकारी के अनुसार, सुनवाई 10 जून को हुई थी और उन्होंने देवानंद के आवेदन को सामान्य प्रक्रिया बताया। 5 जून को देवानंद की हत्या कर दी गई।

ट्रस्ट के एक सदस्य का कहना है कि देवानंद ने मठ पर अपना अधिकार जताना तब शुरू किया, जब वे लंबे समय तक मठ से दूर रहे और अपना अधिकांश समय सवाई माधोपुर स्थित आश्रम में बिताते थे। सदस्य ने बताया कि एक बार उनसे पूछा गया था कि अगर देवस्थान विभाग का फैसला उनके पक्ष में नहीं आया तो वे क्या करेंगे। इस पर उन्होंने जवाब दिया, ‘जिसकी लाठी, उसकी भैंस’, यानी वे अपने अधिकार के लिए बल प्रयोग करने से भी पीछे नहीं हटेंगे।”

मठ के सदस्य मदन जैन कहते हैं कि हालांकि मंदिर में हमले की घटनाएं हुई हैं, लेकिन इससे पहले कभी हत्या नहीं हुई थी। उन्होंने श्रवन बन पर मठ परिसर में लाठियों से हमला किया गया था, जिसके बाद वे पास में ही रहने लगे और केवल पूजा-अर्चना करते थे। उनके उत्तराधिकारी किशोर बन पर भी दो बार हमला हुआ, जिसके बाद उन्होंने मठ त्याग दिया।”

मठ के सदस्य मदन जैन का कहना है कि मंदिर परिसर में पहले भी हमले हुए हैं, लेकिन कभी किसी की हत्या नहीं हुई थी। उन्होंने कहा कि शरवन बन पर मठ परिसर में लाठियों से हमला किया गया था, जिसके बाद उन्होंने पास में रहना शुरू कर दिया और केवल पूजा-पाठ करने आते थे। उनके उत्तराधिकारी किशोर बान पर भी दो बार हमला हुआ, जिसके चलते उन्हें महंत पद छोड़ना पड़ा।

पुलिस का कहना है कि देवानंद की हत्या को अंजाम देने वाले चार लोगों में आदित्य वर्मा, अंकित बैरवा, पुष्पेंद्र सिंह और एक नाबालिग को 1 लाख रुपये दिए गए थे। वर्मा की पत्नी मिकाल जॉर्ज को सबूत नष्ट करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। मठ में तैनात एक गार्ड को भी गिरफ्तार किया गया है।

मुख्यमंत्री मोहन यादव के बचाव में उतरी बीजेपी, जमीन खरीद और 2021 के बाद चार गुना बढ़ोतरी के मामले में साधी चुप्पी

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव और उनके परिवार के द्वारा जमीनों की खरीद के मामले में बीजेपी का रिएक्शन आया है। बीजेपी की आईटी सेल के संयोजक अमित मालवीय, मध्य प्रदेश बीजेपी के अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल और मध्य प्रदेश सरकार के कई मंत्रियों ने इन सभी आरोपों खारिज कर दिया। पढ़ें पूरी खबर।