मुख्यमंत्री पद की चाह, पर खुद चुनाव लड़ने से लगता है डर

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी अपने सूबे में विधान परिषद का दूसरा सदन बनाना चाहती हैं, पर दुविधा यह है कि केंद्र की मंजूरी और संविधान संशोधन के बिना ऐसा मुमकिन नहीं।

Yogi Adityanath, BJP
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (Photo- Indian Express)

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी अपने सूबे में विधान परिषद का दूसरा सदन बनाना चाहती हैं, पर दुविधा यह है कि केंद्र की मंजूरी और संविधान संशोधन के बिना ऐसा मुमकिन नहीं।

समाजवादी पार्टी के मुखिया और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने एलान किया है कि वे खुद विधानसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे। विधानसभा का चुनाव मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी शायद ही लड़ें। वे अभी भी विधानसभा के बजाय विधान परिषद के सदस्य हैं। अपने मुख्यमंत्री काल में अखिलेश यादव भी विधान परिषद के ही सदस्य थे। ये नेता विधानसभा चुनाव लड़ने से घबराते तो हार के डर से हैं पर दलील यही देते हैं कि अपनी पार्टी के उम्मीदवारों के पक्ष में बेफिक्र होकर चुनाव प्रचार करने की मंशा से खुद चुनाव नहीं लड़ते।

संसद में जिस तरह राज्यसभा को उच्च सदन और लोकसभा को निचले सदन का दर्जा हासिल है, वही स्थिति राज्य विधान मंडलों में विधान परिषद और विधानसभा की है। एक दौर में सियासी नैतिकता यही मानी जाती थी कि मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री वही बने तो अच्छा संदेश जाएगा जो जनता से सीधे निर्वाचित होकर सदन का नेता निर्वाचित हो। पर समय के साथ-साथ विकल्प ने बचाव का रास्ता दे दिया। महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, बिहार, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक में ही विधान परिषद हैं। महाराष्ट्र, बिहार और उत्तर प्रदेश तीनों राज्यों के मौजूदा मुख्यमंत्री नेता तो जनता द्वारा चुने गए नुमाइंदों के हैं पर खुद उस सदन के सदस्य नहीं।

lपश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी अपने सूबे में विधान परिषद का दूसरा सदन बनाना चाहती हैं पर दुविधा यह है कि केंद्र की मंजूरी और संविधान संशोधन के बिना ऐसा मुमकिन नहीं। विधान परिषद का विकल्प होता तो ममता को विधानसभा चुनाव क्यों लड़ना पड़ता। वे क्यों नंदीग्राम में अपने ही शिष्य रहे शुभेंदु अधिकारी के हाथों हार का मुंह देखतीं। वे तो अपने लिए सुरक्षित सीट भवानीपुर से भी लड़ने का मन बना चुकी थीं।

पर शुभेंदु ने नंदीग्राम में हार जाने की आशंका से दो सीटों पर एक साथ लड़ने की बात कहकर ममता की खिल्ली उड़ाई तो रणनीति के तहत वे अकेले नंदीग्राम से ही शुभेंदु से भिड़ने को तैयार हो गईं। पर लोकतंत्र का चमत्कार देखिए कि सूबे की जनता ने उन्हें पहले से ज्यादा सीटें देकर एक तरफ उनकी कीर्ति बढ़ाई तो दूसरी तरफ नंदीग्राम की हार ने उन्हें नैतिक रूप से कमजोर भी किया। यह बात अलग है कि बाद में भवानीपुर से उप चुनाव जीतकर वे मुख्यमंत्री बनने के छह महीने के भीतर विधानसभा की सदस्य होने की अनिवार्यता को पूरा कर पार्इं।

महाराष्ट्र में तो कोरोना की आड़ में राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की सांसें ही अटका दी थीं। उद्धव कभी कोई चुनाव लड़े नहीं थे पर महा विकास अघाड़ी गठबंधन ने नेता उन्हीं को चुना था। विधान परिषद का चुनाव भी कोरोना के कारण जारी पूर्णबंदी की वजह से संभव नहीं हो पा रहा था। ऐसे में उन्होंने विधान परिषद की मनोनयन वाली सीट पर नामित होकर विधान मंडल का सदस्य होने की अनिवार्यता को पूरा करने का रास्ता चुना। उनके बेटो आदित्य ठाकरे अलबत्ता विधानसभा का चुनाव लड़ा और वे जीत भी गए।

उनके मंत्री पद पर अपने पिता की तरह असमंजस की कोई तलवार नहीं लटकी थी। राज्यपाल कोश्यारी ने उद्धव को विधान परिषद का सदस्य नामित करने से इनकार कर दिया। तब एक तरफ तो उन्होंने चुनाव आयोग से राज्य विधान परिषद के सामान्य चुनाव कराने की गुहार लगाई, दूसरी तरफ इस ध्येय की पूर्ति के लिए प्रधानमंत्री से भी अनुरोध किया। गनीमत है कि मुख्यमंत्री पद पर छह महीने पूरे करने से पहले ही विधानसभा सदस्यों के मतों से होने वाले विधान परिषद सदस्यों के चुनाव का कार्यक्रम चुनाव आयोग ने घोषित कर दिया और उद्धव ठाकरे का मुख्यमंत्री पद बचा रह पाया।

इंदिरा गांधी जब लाल बहादुर शास्त्री के निधन के बाद तीसरी प्रधानमंत्री बनी थीं तो वे तब राज्यसभा की सदस्य थीं। इसके बावजूद 1967 में लोकसभा चुनाव हुआ तो उन्होंने रायबरेली सीट से लोकसभा के लिए चुनकर आने को अपनी सियासी ताकत माना। योगी आदित्यनाथ यों तब गोरखपुर से लोकसभा के सदस्य थे। वे लोकसभा में 1998 से लगातार चुनकर पहुंच रहे थे पर विधानसभा का उपचुनाव लड़ने की हिम्मत नहीं जुटा पाए। विधान परिषद में भाजपा की सदस्य संख्या भी उतनी नहीं थी कि अपने सदस्यों से त्यागपत्र दिलाकर उपचुनाव लड़ते। त्यागपत्र दिलाए सपा और बसपा के विधान परिषद सदस्यों से। खाली हुई सीटों के लिए उपचुनाव हुआ तब योगी ही नहीं, केशव मौर्य, दिनेश शर्मा, स्वतंत्र देव सिंह और मोहसिन रजा विधान परिषद के सदस्य बने और उनके मंत्री पद सुरक्षित रह पाए।

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