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देवबंद के उलेमाओं ने जारी किया फतवा- लाइफ इंश्योरेंस इस्लाम में हराम

लाइफ इंश्योरेंस की पॉलिसी खरीदने को इस्लाम में हराम बताया गया है। इसके पीछे तर्क दिया गया है कि जीना-मरना अल्लाह के हाथ में है, कोई इंश्योरेंस कंपनी व्यक्ति की लंबी जिंदगी की गारंटी नहीं दे सकती है।

देवबंद सहारनपुर जिले की सीटों में से एक है। उसकी कुल जनसंख्या में से 65 प्रतिशत लोग मुसलमान हैं।

देवबंद के उलेमाओं का एक और फतवा इन दिनों सुर्खियों है। इस बार गाजियाबाद के एक शख्स के सवाल पर यह फतवा जीवन बीमा को लेकर आया है। लाइफ इंश्योरेंस की पॉलिसी खरीदने को इस्लाम में हराम बताया गया है। इसके पीछे तर्क दिया गया है कि जीना-मरना अल्लाह के हाथ में है, कोई इंश्योरेंस कंपनी व्यक्ति की लंबी जिंदगी की गारंटी नहीं दे सकती है। लिहाजा मुस्लिम इससे दूर रहें। अब इस फतवे को लेकर मुस्लिम समाज की क्या प्रतिक्रिया होती है, यह देखने वाली बात है। बहरहाल मामला सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना है।देवबंद के मौलानाओं ने कहा है कि बीमा कंपनियां पॉलिसी खरीदने वाले लोगों के प्रीमियम के पैसे को तमाम तरह से निवेश करती हैं, फिर ब्याज से अर्जित पैसा ही ग्राहकों को लौटाया जाता है। जबकि इस्लाम में ब्याज के जरिए अर्जित किसी भी आय को इस्लाम में हराम माना जाता है।

देवबंद के एक वरिष्ठ मौलाना नजीफ अहमद ने कहा, ‘यह फतवा इस्लामिक शरियत की रौशनी में जारी किया गया है, मुस्लिमों को बताया गया है कि वे सिर्फ अल्लाह में एतबार रखें, सिर्फ खुदा ही सबसे बड़ी सत्ता हैं, उन्हीं के हाथ में जीवन और मौत है। लिहाजा किसी इंश्योरेंस कंपनी के चक्कर में न पड़ें।’ बता दें कि नए साल की शुरुआत के बाद से देवबंद उलेमाओं की ओर से कई फतवा जारी हुए है। हाल में एक फतवा जारी कर डिजाइऩ बुरका को हराम करार दिया गया था।

फतवा में कहा गया था कि,’घूंघट और बुर्का को छिपी हुई आँखों से महिलाओं को बचाने के लिए पहनना जरूरी होता है, इस्लाम में डिजाइन बुर्का पहनने की सख्ती से मनाही है।’ हाल में देवबंद उलेमाओं ने मेरठ की 15 वर्षीय आलिया खान नामक लड़की की आलोचना की थी, जिसने राज्य सरकार की ओर से आयोजित प्रतियोगिता में भगवत गीता के श्लोक का उच्चारण किया था। आलिया ने प्रतियोगिता में पुरस्कार भी जीता था। इतना ही नहीं हाल में में दारुल उलूम देवबंद ने एक विवादित फतवा में मुस्लिमों को बैंक की नौकरी करने वाले लड़के या लड़की से शादी न करने को कहा था। इसके पीछे तर्क दिया था कि बैंक में नौकरी या फिर ब्जाय से धन अर्जित करना इस्लाम की निगाह में हराम है।

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