बहसतलब हो दिल्ली की बहुशासन प्रणाली

अगले साल के शुरू में दिल्ली के तीनों निगमों के चुनाव होने वाले हैं।

दिल्‍ली विधानसभा। फाइल फोटो।

मनोज कुमार मिश्र

अगले साल के शुरू में दिल्ली के तीनों निगमों के चुनाव होने वाले हैं। लगातार तीन बार से निगमों की सत्ता पर काबिज भाजपा को आम आदमी पार्टी (आप) इस आधार पर पराजित करने का प्रयास करेगी कि निगम में दूसरे दल के शासन से सरकार के काम में बाधा आ रही है। यही आरोप-प्रत्यारोप दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार में शासन करने वाली पार्टियों के बीच लगता रहता है।

भाजपा केंद्र सरकार के बूते फिर से निगमों के चुनाव जीतने की कोशिश करेगी। सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के दिल्ली को 1993 में विधानसभा देने वाले कानून की व्याख्या करने के बाद केंद्र सरकार ने संसद के पिछले सत्र में दिल्ली के उप राज्यपाल को दिल्ली का शासक बताने के लिए संविधान में संशोधन किया। दिल्ली को केंद्रशासित प्रदेश रखते हुए दिल्ली को 1993 में विधानसभा दी गई थी।

तब दिल्ली की आबादी एक करोड़ से कम थी, अब दो करोड़ से ज्यादा है। दिल्ली में बहुशासन प्रणाली से राजनीति में कड़वाहट बढ़ी ही, हर स्तर पर केंद्र की भाजपा की अगुआई वाली सरकार से दिल्ली सरकार का टकराव रहा। कोरोना के संकट काल में भी यह टकराव रहा और केंद्र सरकार की पहल के बाद दिल्ली सरकार और भाजपा शासित नगर निगम साथ काम कर पाए।

आजादी के बाद से जरूरत और आबादी में बढ़ोतरी के चलते दिल्ली की शासन प्रणाली में बार-बार बदलाव होता रहा। अब जरूरत है कि विस्तार से चर्चा करके कोई ठोस व्यवस्था बनाई जाए। दिल्ली सरकार की तरह दिल्ली के नगर निगम भी स्वशासी हैं। दिल्ली की 15 साल तक मुख्यमंत्री रहीं शीला दीक्षित को स्वशासित नगर निगम शुरू से ही खलता रहा। वे दिल्ली नगर निगम को उसी तरह दिल्ली सरकार के अधीन लाना चाहती थीं जैसे अन्य राज्यों में राज्य सरकार के अधीन वहां के निगम होते हैं।

इस प्रयास में वे सफल नहीं हुर्इं तो उन्होंने निगमों का पुनर्गठन के लिए के लिए समिति बनाई। पहले निगम की सीटें 138 से बढ़ाकर 272 की गर्इं, फिर उसे तीन हिस्सों में बांटा गया। दिल्ली के 87 फीसद इलाकों में दिल्ली सरकार के समानांतर दिल्ली की नगर निगमों की सत्ता चलती है। दिल्ली में विधानसभा बनने से पहले निगम के पास ही दिल्ली की असली सत्ता थी, बाद में पहले बिजली, फिर पानी, फिर अग्निशमन, होमगार्ड, फिर सीवर, बड़ी सड़कें आदि अपने अधीन करके दिल्ली सरकार ताकतवर बनी।

बावजूद इसके आज भी गृह कर, लाईसेंस,प्राथमिक स्वास्थ्य समेत कुछ बड़े अस्पताल, प्राथमिक स्कूल, पार्क, पार्किंग आदि निगमों के अधीन हैं। तीन निगमों में से दो (पूर्वी और उत्तरी) अपने खर्चे का बोझ नहीं उठा पा रही हैं। इसलिए भी पैसे की लड़ाई आए दिन दिल्ली सरकार और निगमों में चलती रहती है। दिल्ली सरकार का शहरी विकास सचिव निगमों की देखरेख करता है लेकिन दिल्ली की तीनों निगम सीधे केंद्र सरकार के माध्यम से उप राज्यपाल के अधीन हैं।

दिल्ली की साफ-सफाई आदि के लिए दिल्ली के वित्त आयोग की सिफारिशों के आधार पर दिल्ली सरकार निगमों को पैसा देती है। दिल्ली सरकार कहती है कि उसे केंद्र सरकार उसके हिस्से का पूरा पैसा नहीं देती और निगमों की शिकायत रहती है कि दिल्ली सरकार उसके हिस्से का पूरा पैसा नहीं देती। यह विवाद सड़कों पर भी आता रहता है। दिल्ली सरकार कहती है कि निगम में भ्रष्टाचार के चलते घाटा है, सरकार तो पूरा पैसा दे रही है। इसी तरह के कई और मुद्दे हैं जो बार-बार उठते रहे हैं। इसी में दिल्ली सरकार के अधिकार का मुद्दा भी तब से ज्यादा उठ रहा है, जब से दिल्ली सरकार में आम आदमी पार्टी काबिज हुई है। वे हर मुद्दे को दिल्ली को पूर्ण राज्य से जोड़ते हैं। इसमें कोई शक नहीं है कि दिल्ली को विधानसभा देते समय जिस तरह से हर मुद्दे पर बहस होनी चाहिए थी वैसी हुई नहीं।

तभी तो अनेक सेवाएं विधानसभा ने प्रस्ताव करके निगम से लीं। पुलिस, जमीन और सेवाएं आरक्षित विषय होने से सरकार को दैनिक काम करने में कठिनाई आती है। दिल्ली देश की राजधानी है। देश की सरकार यहां से चलती है। दुनिया के हर देश के दूतावास दिल्ली में है। देश भर से लोग बेरोक-टोक दिल्ली में आते हैं। दिल्ली किसी राज्य के अधीन न रहने से ही कोरोना काल में केंद्र सरकार ने अद्धसैनिक बलों के बूते अस्पताल बनाने से लेकर सेना के अस्पताल को आम जन के लिए उपलब्ध करवाने के फैसले लिए।

दिल्ली की दूसरी समस्या यह है कि उसका इलाका 1,483 वर्ग किलोमीटर से बढ़ने की भविष्य में कोई संभावना नहीं दिखती। आबादी बढ़ती जा रही है। इससे समस्याएं भी बढ़ती जा रही हैं। इस बड़ी आबादी के चलते दिल्ली में अनधिकृत निर्माणों की संख्या बढ़ती जा जा रही है। अगर कारगर उपाय नहीं किए गए तो कुछ इलाकों को छोड़कर दिल्ली बस्ती बन जाएगी। इसलिए दिल्ली के प्रशासनिक ढ़ाचे पर बहस जरूरी है। या तो हरियाणा और उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों को जोड़कर दिल्ली को पूरी तरह से राज्य बना दिया जाए। अगर यह संभव न हो तो मौजूदा शासन व्यवस्था के लिए अधिकारों और जिम्मेदारियों का स्पष्ट बंटवारा किया जाए।

वैसे तो दिल्ली में कई और सरकारी संस्थाएं स्वशासी हैं लेकिन नगर निगम, विधानसभा और केंद्र सरकार यानि लोकसभा के सदस्यों को दिल्ली के मतदाता ही चुनते हैं। वही मतदाता यह समझ ही नहीं पाता है कि उसकी समस्या का समाधान किस शासन के पास है। अगर जनता से चुने हुए लोगों की सरकार जनता की समस्याओं का समाधान करने में सक्षम नहीं है तो उस सरकार की क्षमता पर सवाल उठते हैं। यह सवाल भी अपने आप में महत्त्वपूर्ण तो है कि अगर उप राज्यपाल ही शासक हैं तो चुनाव का मतलब कितना है। इस तरह के अनेक सवाल उठाए जाते रहे हैं और उठाए जाएंगे। इन सभी पर विस्तार से चर्चा करके दिल्ली के लिए एक शासन व्यवस्था बनाने की है, जिससे दिल्ली देश की राजधानी रहते हुए दिल्ली के लोगों के लिए सही काम कर सके।

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