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DU #PinjraTod: ‘दो पराठे से पेट नहीं भरता क्या, सात बजे तक लौट आना’

पिंजड़ा तोड़ मुहिम में भागीदारी कर रहीं किरोड़ीमल कॉलेज में राजनीति शास्त्र की तीसरे साल की छात्रा विदिता प्रियदर्शिनी ने कहा कि डीयू जैसी जगह पर लड़के और लड़कियों के लिए हॉस्टल में अलग-अलग नियम कानून बने हैं।

सबसे ज्यादा मुश्किल उन लड़कियों को होती है जो निजी हॉस्टलों में रहती हैं। निजी जगहों पर लड़कों को कम किराए में जगह मिल जाती है। लेकिन लड़कियों से सुरक्षा के नाम पर दुगुना किराया वसूला जाता है।

आप डीयू के हॉस्टल में रहती हैं लेकिन आपको साइंस प्रोजेक्ट में इसलिए नहीं लिया जाता कि लड़की होने के कारण आप देर तक प्रयोगशाला या लाइब्रेरी में नहीं रह सकती हैं। उलाहना भी सुना दिया जाता है कि लड़कियों को रखोगे तो फिर ‘सेक्सुअल हरासमेंट’ का भी केस दर्ज हो सकता है। और इन सबके बाद रात में हॉस्टल के मेस में खाना खाने बैठो तो मेस वाले कहते हैं कि इतना क्यों खाती हो, दो पराठे से ज्यादा नहीं मिलेगा। और अगर कोई लड़की डीयू के इलाके में प्राइवेट हॉस्टल में रहती है तो उसे लड़कों की तुलना में दुगुना किराया अपनी ‘सुरक्षा’ के एवज में देना होगा।

यह कहानी डीयू ही नहीं देश के ज्यादातर शैक्षणिक परिसरों की है। पिछले साल अगस्त में इसी गैरबराबरी के खिलाफ जामिया मिल्लिया इस्लामिया की छात्राओं ने आवाज उठाई थी जिसका दिल्ली महिला आयोग ने संज्ञान लिया था। महिला आयोग के इस कदम के बाद ही यह मुद्दा उठा कि सुरक्षा के नाम पर लड़कियों को किस तरह पाबंदियों के पिंजड़े में कैद कर दिया जाता है। और पिंजड़ा तोड़ने की यह मुहिम जामिया से लेकर डीयू तक पहुंची। पिंजड़ा तोड़ मुहिम के तहत लड़कियों से भेदभाव को लेकर पिछले साल अगस्त में जनसुनवाई का भी आयोजन किया गया था।

डीयू की लॉ फैकल्टी की छात्रा और पिंजड़ा तोड़ मुहिम की सदस्य सुभाषिणी श्रीया ने बताया कि 2003 से 2013 तक डीयू में जो सेक्सुअल हरासमेंट की इलेक्टेड कमिटी रही थी उसे खारिज कर दिया गया है। अब छात्राओं को अपनी शिकायत के लिए पुलिस के पास जाने के अलावा और कोई चारा नहीं बचता है। हमारी मांग यह है कि इस कमिटी को फिर से बहाल किया जाए। श्रीया ने कहा कि हॉस्टलों पर पाबंदियों के खिलाफ जब हम छात्राएं पिंजड़ा तोड़ मुहिम के तहत एकजुट हुर्इं तो पता चला कि डीयू जैसी जगह पर लड़कियों को कितनी दिक्कत है। नेत्रहीन छात्रा की अलग समस्या है तो पूर्वोत्तर की लड़की को अलग तरह का तनाव झेलना पड़ता है। हमने अपनी समस्याओं को लेकर दिल्ली महिला आयोग को एक मांगपत्र दिया था, जिसके बाद हमसे एक रिपोर्ट मांगी गई। हमारी समस्याओं की सूची इसलिए लंबी हो रही है कि हम लड़की हैं। डीयू की लाइब्रेरी 12 बजे तक खुली रहती है, लेकिन ज्यादातर हॉस्टलों में आठ बजे शाम तक लौटने की पाबंदी के कारण लड़कियां देर रात तक वहां नहीं बैठ सकतीं। हालात इतने बदतर हैं कि प्रोफेसर लड़कियों को साइंस प्रोजेक्ट में लेने से कतराते हैं कि ये देर तक काम नहीं कर सकतीं या न जाने कब सेक्सुअल हरासमेंट का मामला बन जाएगा।

पिंजड़ा तोड़ मुहिम में भागीदारी कर रहीं किरोड़ीमल कॉलेज में राजनीति शास्त्र की तीसरे साल की छात्रा विदिता प्रियदर्शिनी ने कहा कि डीयू जैसी जगह पर लड़के और लड़कियों के लिए हॉस्टल में अलग-अलग नियम कानून बने हैं। कई हॉस्टलों में नियम हैं कि लड़कियों को सात बजे तक हॉस्टल आ जाना है। अगर आपको देर से आना है तो कई तरह की इजाजत लेनी होती है। पार्ट टाइम नौकरी करने वालीं या ट्यूशन पढ़ाने वालीं लड़कियों को इससे खासी दिक्कत होती है। सबसे ज्यादा मुश्किल उन लड़कियों को होती है जो निजी हॉस्टलों में रहती हैं। निजी जगहों पर लड़कों को कम किराए में जगह मिल जाती है। लेकिन लड़कियों से सुरक्षा के नाम पर दुगुना किराया वसूला जाता है। उसके बाद हजार तरह की बंदिशें, जैसे कि कितने बजे आना है, इससे क्यों बात की, ऐसे कपड़े क्यों पहने। इसके साथ ही सबसे अहम बात यह है कि हर छोटी शिकायत के लिए आपको पुलिस के पास जाना होता है। और जब लड़कियां पुलिस के पास जाती हैं तो उनकी शिकायत पर कार्रवाई के बजाए उपदेशों की गाइडलाइंस मिलती है कि किससे कैसे बात करनी चाहिए, कैसे कपड़े पहनने चाहिए या कैसा व्यवहार रखना चाहिए।

डीयू की एग्जक्यूटिव काउंसिल की सदस्य और मिरांडा हाउस में फिजिक्स की प्रोफेसर आभा देव हबीब का कहना है कि जब देश के शैक्षणिक और बौद्धिक संस्थान ही मुखर होकर पितृसत्ता की भाषा बोलेंगे तो समाज में कोई अच्छी चीज कैसे आ पाएगी। यह भी सच है कि विश्वविद्यालय भी समाज का हिस्सा हैं और जो समाज का चरित्र होगा, वही यहां का भी होगा। इसलिए डीयू परिसर में पिंजड़ा तोड़ अभियान जैसी मुहिम की सख्त जरूरत है। डीयू की छात्राएं समाज का हिस्सा हैं और यहां से उठा यह प्रगतिशील कदम समाज पर बेहतर प्रभाव छोड़ेगा। अभी जेएनयू में सरकार और प्रशासन की नाइंसाफी के खिलाफ डीयू से जो विरोध के स्वर उठे थे, उसमें पिंजड़ा तोड़ अभियान के सदस्यों की अहम भूमिका थी। कहने का मतलब है कि अगर एक बार आप गलत के खिलाफ बोलने का हौसला जुटा लेते हो तो आपकी ताकत बढ़ती है और आप गैरबराबरी और नाइंसाफी के खिलाफ माहौल बनाने में सफल होते हैं।

जरूरी है पिंजड़ा तोड़ मुहिम
जब देश के शैक्षणिक और बौद्धिक संस्थान ही मुखर होकर पितृसत्ता की भाषा बोलेंगे तो समाज में कोई अच्छी चीज कैसे आ पाएगी। विवि भी समाज का हिस्सा हैं और जो समाज का चरित्र होगा, वही यहां का भी होगा। इसलिए समाज का चेहरा बदलने के लिए डीयू परिसर में पिंजड़ा तोड़ जैसी मुहिम की सख्त जरूरत है।
-आभा देव हबीब, डीयू की एग्जक्यूटिव काउंसिल सदस्य

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