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नियमितीकरण के वायदे से मुकराई DTC

दिल्ली परिवहन निगम (डीटीसी) में मृतकों के आश्रित के रूप में नौकरी करने वाले कर्मचारी नियमितीकरण का वादा पूरा नहीं होने के कारण खुद को ठगा सा महसूस कर रहे हैं।

delhi transportation corporation, DTC job, DTC bus Serviceदिल्ली परिवहन निगन की बस (फाइल फोटो)

दिल्ली परिवहन निगम (डीटीसी) में मृतकों के आश्रित के रूप में नौकरी करने वाले कर्मचारी नियमितीकरण का वादा पूरा नहीं होने के कारण खुद को ठगा सा महसूस कर रहे हैं। उनका कहना है कि डीटीसी ने 2010 में मृतक कर्मचारियों के आश्रितों की एकमुश्त बहाली की थी और नौकरी देते समय उन्हें नियमित कर्मचारी के बजाए ठेके पर रखा था। डीटीसी ने आश्रितों से वादा किया था कि वे अभी ठेके पर काम करें, बाद में नियुक्ति नियमित कर दी जाएगी। परिवार की जरूरतों को पूरा करने की मजबूरी और नियमितीकरण के वादे पर आश्रितों ने नौकरी तो शुरू कर दी, लेकिन डीटीसी ने बीते छह सालों में भी अपना वादा पूरा नहीं किया। कर्मचारियों का कहना है कि 2010 में बहाली के समय डीटीसी में नियमित कर्मचारियों के पद खाली थे, इसके बावजूद आश्रितों को ठेके पर रखा गया।

वहीं मृतक आश्रितों का कहना है कि उनके परिजन डीटीसी में नियमित बहाली पर थे और डीटीसी के तत्कालीन सीएमडी नरेश कुमार ने कहा था कि धीरे-धीरे प्रक्रिया के तहत सभी आश्रितों को नियमित कर दिया जाएगा। कर्मचारियों का कहना है कि 2010 में डीटीसी में करीब 800 आश्रितों की नियुक्ति हुई थी, उस समय 280 आश्रितों को नियमित पद पर रखने की भी जगह थी, लेकिन सीएमडी ने सभी को ठेके पर ही रखा। शादीपुर डिपो में 2010 में कंडक्टर के पद नियुक्त हुए पवन का कहना है कि उसके पिता भी डीटीसी में कंडक्टर थे और उनकी तैनाती नियमित थी।

2010 में उसकी नियुक्ति ठेके पर हुई और बाद में नियमित करने का वादा किया गया, लेकिन छह साल बीत जाने के बाद भी कुछ नहीं हुआ। इसको लेकर वह कई बार डीटीसी के अधिकारियों से मिला और कुछ नहीं होने पर कोर्ट पहुंच गया। पवन का कहना है कि डीटीसी ने आश्रितों को नौकरी देने का प्रावधान तो बनाया है, लेकिन उनके लिए कोई व्यवस्था नहीं लागू की है। इसके कारण आश्रित ठोकर खाने पर मजबूर हैं। ठेके पर काम करने से वेतन और सुविधाओं के नाम पर कुछ भी नहीं मिलता।

सुनीता ने भी पति की जगह आश्रित के रूप में नौकरी पाई। उनके दो बच्चे हैं। सुनीता का कहना है कि उस समय परिवार वालों के कहने पर नौकरी कर ली थी और डीटीसी ने भी बाद में नियमित करने का वादा भी किया था, लेकिन आज पछतावा हो रहा है। इतने साल बीत जाने के बाद डीटीसी ने अपना वादा नहीं निभाया। इसके कारण हम बदहाली में जीने को मजबूर हैं। आश्रितों का कहना है कि फिलहाल उनको डीटीसी की ओर से 11 से 12 हजार रुपए मिलते हैं, अगर वे नियमित होते तो उनकी तनख्वाह 20 हजार रुपए से ऊपर होती।

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