Delhi SIR: कांता प्रसाद शनिवार को मंगोलपुरी के ब्लॉक वाई में हुई जनसुनवाई में अपना आधार और वोटर आईडी कार्ड लेकर पहुंचे। वह यह साबित करना चाहते थे कि वह जिंदा हैं, उसी पते पर रह रहे हैं और वोट देने के हकदार हैं।

हाल ही में दिल्ली की विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया के तहत तैयार ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से उनका नाम हटा दिया गया था। एएसडीडी (अनुपस्थित, दूसरी जगह चले गए, मृत, डुप्लिकेट) रिकॉर्ड में उनके नाम के आगे मृत लिखा गया था। इसकी वजह से उनका एन्यूमरेशन फॉर्म इकट्ठा नहीं किया गया था।

मुझे मृत घोषित कर दिया गया था- कांता

कांता ने कहा, “मुझे मृत घोषित कर दिया गया था।” उन्होंने बताया कि उन्हें कभी फॉर्म मिला ही नहीं, जबकि उनकी पत्नी और बेटी ने अपने फॉर्म भर दिए थे। वोटर लिस्ट में अपने पिता का नाम सही करवाने के उनके अनुरोध पर भी कोई कार्रवाई नहीं की गई थी। मुकुंद प्रसाद का नाम गलती से कोमल प्रसाद के रूप में दर्ज कर दिया गया था।

कांता भी उन कई लोगों में शामिल थीं, जो जन सुनवाई में ऐसी ही शिकायतें लेकर आए थे। उनका कहना था कि वे अपने रजिस्टर्ड पते पर रह रहे हैं, फिर भी ड्राफ्ट लिस्ट में उनके नाम नहीं थे। कुछ लोगों के नाम तो एसआईआर फॉर्म जमा करने के बाद भी लिस्ट में नहीं आए।

1980 से मंगोलपुरी में रह रहीं नीलम

नीलम ने बताया कि वह 1980 से मंगोलपुरी में रह रही हैं। उनका अपना घर है और उन्होंने 2025 के दिल्ली चुनावों में वोट भी दिया था। वह अपना भरा हुआ एन्यूमरेशन फॉर्म लेकर सुनवाई में पहुंचीं। हालांकि, ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में उनका नाम नहीं था।

जन सरोकार, मजदूर किसान शक्ति संगठन, नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन वुमेन, वोटर अधिकार मंच दिल्ली और अन्य समूहों द्वारा एसआईआर प्रक्रिया के जनता के ऑडिट के हिस्से के तौर पर इस सुनवाई का आयोजन किया गया था। एक अन्य निवासी रिहाना ने बताया कि जब उन्हें जनगणना प्रपत्र सौंपा गया था, तब बूथ स्तर अधिकारी (बीएलओ) पहली बार उनसे मिलने नहीं आई थीं। उन्होंने दावा किया कि उन्होंने बीएलओ को कई बार फोन किया और आखिरकार उनसे संपर्क करने में सफल रहीं।

एक और महिला रिहाना ने बताया कि जब बूथ लेवल ऑफिसर ने फॉर्म दिया था, तब वह उनसे नहीं मिल पाई थीं। उन्होंने कहा कि उन्होंने बीएलओ को कई बार फोन किया और आखिरकार उनसे संपर्क करने में कामयाब रहीं। उन्होंने बताया कि बीएलओ ने उनसे कहा कि फॉर्म जमा करने में बहुत देर हो चुकी है। फिर भी उन्होंने फॉर्म जमा कर दिया। लेकिन उससे पहले उन्होंने भरे हुए फॉर्म की एक फोटोकॉपी ली और जमा करने के प्रमाण के तौर पर बीएलओ के साइन भी करवा लिए। इसके बावजूद उन्हें ड्राफ्ट रोल में अनुपस्थित दर्ज किया गया।

एमकेएसएस की कैरिना ने बताया कि मंगोलपुरी में जन्म से रह रही एक महिला का नाम भी लिस्ट से बाहर पाया गया है। उन्होंने कहा, “ज्यादातर मामलों में लोगों को शिफ्टेड के तौर पर मार्क किया गया है।” सुनवाई के दौरान ऐसे मामले सामने आए जहां महिलाओं को स्थायी रूप से स्थानांतरित के तौर पर मार्क किया गया था, जबकि उनके पति ड्राफ्ट रोल में बने रहे।

36 परिवारों में ऐसे 37 मामले मिले

आयोजकों ने बताया कि उन्हें 36 परिवारों में ऐसे 37 मामले मिले। लक्ष्मी देवी भी उनमें से एक थीं। वह और उनके पति ओम प्रकाश न तो ड्राफ्ट रोल में थे और न ही एएसडीडी लिस्ट में था। उनके दोनों बेटों को अनुपस्थित के तौर पर मार्क किया गया था। सुनवाई में प्रस्तुत रिकॉर्ड के अनुसार, केवल उनके सबसे छोटे बेटे और उनके ससुराल वालों को ड्राफ्ट रोल में जगह मिली है।

दो अन्य लोगों शेरसिंह और नीरज ने कहा कि उन्होंने गलत वर्तनी के कारण डुप्लिकेट मतदाता प्रविष्टियों को हटाने के लिए अपने बीएलओ से संपर्क किया था। इसके बजाय हर एक व्यक्ति की दोनों प्रविष्टियां ड्राफ्ट रोल से हटा दी गईं। ये मामले तब सामने आए जब नागरिक समाज के समूहों ने ब्लॉक वाई में बूथ नंबर 119 से 126 तक तीन हफ्तों तक घर-घर जाकर लोगों की जानकारी की जांच की।

इन समूहों ने कहा कि सुनवाई का उद्देश्य लोगों को वोटर लिस्ट को अंतिम रूप देने से पहले कमियों और गलत तरीके से हटाए गए नामों को इंगित करने में मदद करना था। सामाजिक कार्यकर्ता और एमकेएसएस के सह-संस्थापक निखिल डे ने अगस्त 2003 के चुनाव आयोग के आदेश का हवाला देते हुए कहा कि ग्राम सभाओं, वार्ड समितियों और शहरी सामुदायिक मंचों के माध्यम से वोटर लिस्ट के सार्वजनिक सत्यापन का प्रावधान है।

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