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रेल बजट: फिर याद आई भुलाई गई रिंग रेल

आजादी के बाद 1982 के एशियाड के समय दिल्ली का सही मायने में पहला विस्तार हुआ था। तभी 21 स्टेशनों का रिंग रेलवे बनाया गया था।

Author नई दिल्ली | Published on: February 26, 2016 2:41 AM
रेल मंत्री सुरेश प्रभु लोकसभा में। (पीटीआई फोटो)

रिंग रेलवे को दिल्ली में सार्वजनिक परिवहन प्रणाली की एक अहम कड़ी बनाने की घोषणा इस बार के रेल बजट में फिर से की गई है। आजादी के बाद 1982 के एशियाड के समय दिल्ली का सही मायने में पहला विस्तार हुआ था। तभी 21 स्टेशनों का रिंग रेलवे बनाया गया था। कुछ समय बाद वह उन स्टेशनों के पास रहने वालों का ही परिवहन साधन बनकर रह गया था। 15 साल तक दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं शीला दीक्षित बताती हैं कि उन्हें यही बताया जाता रहा कि इसके यात्रियों की संख्या नहीं बढ़ पा रही है, इसलिए इसके विस्तार का कोई बड़ा लाभ नहीं होने वाला है। जबकि उनके शुरुआती शासन के समय मुख्य सचिव रहे ओमेश सहगल का कहना था कि रिंग रेलवे ही दिल्ली में कम लागत में सबसे ज्यादा उपयोगी सार्वजनिक परविहन प्रणाली बन सकता है।

उन्होंने बताया कि अटल बिहारी वाजपेयी की अगुआई वाली सरकार के रेल मंत्री नीतीश कुमार ने दिल्ली रिंग रेलवे को बेहतर करने के लिए एक अध्ययन करवाने के लिए एक करोड़ रुपए मंजूर किए थे, लेकिन रेल मंत्रालय ने उस पर आगे कोई कारवाई नहीं की।

दिल्ली में सार्वजनिक परिवहन प्रणाली ठीक किए बिना दिल्ली की सड़कों से निजी वाहनों को कम करने के प्रयोग में लगी आम आदमी पार्टी (आप) की सरकार न तो वादे के मुताबिक, 11 हजार बसों को सड़कों पर ला पाई और न ही रिंग रेलवे को कारगर बनाने के लिए कोई प्रयास करने के संकेत दिए हैं। जबकि 2005 में पहले राईड्स ने दिल्ली सरकार के कहने पर एक सर्वे किया था, जिसमें कहा गया कि दिल्ली की सार्वजनिक परविहन प्रणाली तभी कारगर होगी जब एक से अधिक तरह के सार्वजनिक परविहन प्रणाली चलाए जाएं। इसके लिए उन्होंने 575 किलोमीटर लंबे 46 कॉरिडोर बनाने का सुझाव दिया था।

दिल्ली में एसडीएम से मुख्य सचिव तक पदों पर काम करने वाले ओमेश सहगल सालों से कहते रहे हैं कि रिंग रेलवे को ठीक से लागू किया गया तो वह बस जितनी सस्ती और सर्वसुलभ हो जाएगी। लेकिन सार्वजनिक परिवहन की ठीक से प्राथमिकता तय न होने से बस के यात्रियों की संख्या आनुपातिक रूप से लगातार कम हो रही है। कभी दिल्ली में सार्वजनिक परिवहन से यात्रा करने वालों में बस के सवारियों का अनुपात 60 फीसद था। वह अब घटकर 40 फीसद रह गया है। अगर यही हाल रहा तो यह अनुपात 2020 में घटकर 20 फीसद रह जाने का खतरा है।

इसलिए जिस तरह से जरूरी बसों की संख्या बढ़ाने और उन्हें सड़कों पर सही गति से चलवाने के लिए बीआरटी कॉरिडोर बनाने की है उसी तरह रिंग रेलवे को व्यवस्थित करके चलवाने की है। पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित भी कहती हैं कि अगर केंद्र सरकार रिंग रेलवे को उपयोगी बनाने को तैयार है तो वास्तव में यह मेट्रो जैसा उपयोगी परिवहन प्रणाली बन जाएगा। अगर यह व्यवस्था हो जाए कि उसे मेट्रो और डीटीसी से जोड़ दिया जाए तो इसकी उपयोगिता बढ़ जाएगी। वे भी मानती हैं कि सड़कों पर से वाहनों की भीड़ जबरन नहीं हटाई जा सकती है।

लोगों को सार्वजनिक परिवहन का बेहतर विकल्प देकर ही ऐसा किया जा सकता है। जैसा राइड्स ने सुझाया था बस, मेट्रो के अलावा मोनो रेल, इलेक्ट्रिक ट्रॉली, रिंग रेलवे को विकसित करने की जरूरत है। इनमें रिंग रेलवे सबसे सस्ती परिवहन प्रणाली है और अगर केंद्र सरकार ने सही मायने में उस पर अमल किया तो बस के बाद रिंग रेलवे सही मायने में आम जन की सवारी बन जाएगी जिसकी ओर आप सरकार का अभी तक ध्यान नहीं गया है।

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रिंग रेल नेटवर्क हजरत निजामुद्दीन से शुरू होकर लाजपत नगर, सेवा नगर, लोदी कॉलोनी, सरोजिनी नगर, चाणक्यपुरी, सफदरगंज, सरदार पटेल मार्ग, बराड़ स्कॉवयर, इंद्रपुरी हाल्ट, नारायणा विहार, कीर्ति नगर, पटेल नगर, दया बस्ती, विवेकानंदपुरी, किशनगंज, सदर बाजार, शिवाजी ब्रिज और प्रगति मैदान होते हुए दोबारा निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन पर खत्म होता है। फिलहाल इस नेटवर्क में यात्रा करने में कुल 90 मिनट लगते हैं।

* 36 किमी के तहत 21 स्टेशनों को शामिल किया जाएगा।
* 4 महीने का समय मांगा है इस नेवटवर्क को
बेहतर बनाने के लिए।

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