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दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार की केंद्र सरकार से चल रही लड़ाई का खमियाजा तो दिल्ली के लोग भुगत ही रहे हैं सबसे ज्यादा परेशान दिल्ली में काम करने वाले अफसर हैं।
Author नई दिल्ली | January 4, 2016 02:04 am

बफादार बनने की सजा

दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार की केंद्र सरकार से चल रही लड़ाई का खमियाजा तो दिल्ली के लोग भुगत ही रहे हैं सबसे ज्यादा परेशान दिल्ली में काम करने वाले अफसर हैं। उनके लिए समस्या है कि वे नियम के हिसाब से काम करें या दिल्ली की सरकार के वे आदेश मानें जो नियम के हिसाब से ठीक नहीं हैं। जो सरकार अपनी बात नहीं मानने पर मुख्य सचिव को कारण बताओ नोटिस दे सकती है और एक वरिष्ठ अधिकारी के दफ्तर पर ताला लगा सकती है, वह कुछ भी कर सकती है। सरकार ने हर वर्ग को अपने और पराए में बांटा है। सबसे साफ बंटवारा तो अफसरशाही में ही है। इसीलिए कहा जा रहा है कि केजरीवाल के प्रमुख सचिव राजेंद्र कुमार पर सीबीआइ छापा का असली निशाना खुद मुख्यमंत्री केजरीवाल थे। इसी तरह से उनके खास माने जाने वाले कई अफसरों की घेराबंदी हो रही है। ठीक उसी तरह से केजरीवाल सरकार भी दूसरे खेमे के अफसरों को निशाना बना रही है। सरकार की बौखलाहट इसलिए भी बढ़ गई कि उनके आदेश को न मानने वाले अफसरों को निलंबित करने पर केंद्रीय गृह मंत्रालय ने उन्हें बहाल करके उन्हें काम पर मान लिया। इतना नहीं अधिकारियों ने हड़ताल करके उन्हें और चुनौती दे डाली। अब तो केजरीवाल ने सारे ही अफसरों को ठीक करने का एलान कर दिया है और कहा है कि वे नई भर्त्ती करेंगे। इससे और कुछ और हो न हो अफसरों की धड़ेबाजी तेज हो गई है।

प्रदूषण मुद्दा बना
पहली जनवरी से दिल्ली की सड़कों पर शुरू हुआ निजी कारों के सम-विषम अभियान के शुरुआती दिनों में वाहनों की रफ्तार कम दिखी। माना गया कि लोग साल के शुरू में छुट्टी मनाने दिल्ली से बाहर गए हैं। ज्यादातर लोग तो दो हजार रुपए चालान और उसके बाद होने वाली जलालत से परेशान होने के डर से घर से कम निकले या निकले तो वैकल्पिक इंतजाम करके निकले। मुख्यमंत्री ने तो योजना शुरू होते ही दो घंटे में इसे सफल बता दिया। प्रदूषण कम होने का दावा भी कर दिया गया। साल के आखिर से प्रदूषण कम होने की खबर आ ही रही है तो कम वाहन चलने पर उसमें कमी आना बड़ी बात नहीं है बड़ी बात तो यह लग रही है कि मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी इसे मुद्दा बना रही है कि उसने प्रदूषण कम करने के लिए कितना जोरदार अभियान चलाया।

केजरीवाल के मुरीद
सम-विषम पर तमाम माथापच्ची के बाद जब दिल्ली नगर निगम के भाजपा नेताओं को लगा कि इसमें किसी की दाल नहीं गलने वाली और यह सीधे सुप्रीम कोर्ट से निर्देशित मामला बनता है तो वे चुप ही नहीं हुए बल्कि केजरीवाल के मुरीद हो गए। दबी जुबान से भाजपा नेताओं ने कहा कि दिल्ली में प्रदूषण से रोकथाम के लिए शुरू की गई किसी भी योजना में वे साथ रहेंगे पर यह सफल होगा या नहीं इस पर संदेह है। निगम नेताओं का तर्क है कि जब तक वैकल्पिक व्यवस्था नहीं होगी तब तक सम-विषम पूरी तरह सफल नहीं हो सकता। बाबजूद इसके कुछ दिन के लिए तो केजरीवाल के मुरीद हो ही गए भाजपा के स्थानीय नेता।
पुलिस भी साथ
दिल्ली पुलिस पूरी तरह केजरीवाल के साथ है। कारण चाहे कोर्ट के डंडे का डर हो या फिर कुछ और पर सम-विषम ने पुलिस और केजरीवाल को एक कर दिया है। दरअसल इस फार्मूले से पहले पुलिस और केजरीवाल में छत्तीस का आंकड़ा था। केजरीवाल डाल-डाल तो पुलिस पात-पात चल रही थी पर अचानक सम-विषम के फार्मूले का खाका केजरीवाल ने जारी कर दिया। अब पुलिस समझ गई कि मामला हाथ से निकल जाएगा। आना-कानी का मतलब केजरीवाल का हंगामा। इससे अच्छा है कि इस फार्मूले में साथ हो लिया जाए और आगे विफल होने के बाद जग हंसाई होगी तो सरकार की ही होगी।
सम-विषम पर हिसाब
राजधानी में सम-विषम पर लोगों ने हिसाब लगाना शुरू कर दिया है। हर जगह कोई इसमें राजनीति की रोटी देख रहा है तो कोई इसे मौके की तरह भुनाना शुरू कर दिया है। एक ऐसी ही बानगी बेदिल को देखने को मिली। एक कंपनी ने हवा साफ करने के उपकरण बनाने के अपने प्रचार का जरिया इसे बनाते हुए दस कैब लगा दी जिसे कोई भी सेवा में ले सकता है वह भी दफ्तर जाने-आने के नाम पर। लेकिन कंपनी ने यह नहीं बताया कि यह कैब कहां खड़ी है।

टीवी पर आने की होड़
राजधानी में इलेक्ट्रानिक मीडिया के फे्र म में आने की ललक प्राय: हर कहीं हर किसी में दिखती है। खास कर नेताओं और युवा पीढ़ी में। फिर मौका कोई भी क्यों न हो। एक ऐसी ही बानगी सम-विषम योजना को लेकर भी दिखी। आव देखा न ताव कूद पड़े बयान देने के लिए। मामला राजधानी के एक गैर वीआइपी इलाके का है। यहां एक कैमरा मैन को कुछ सूट करते देख युवाओं के झुंड ने उसे घेर लिया और सम-विषम पर लगे राय जाहिर करने। पर वे तब दंग रह गए जब कैमरा मैन ने बताया कि वे चैनल से नहीं हैं शादी के लिए सूट पर जाना है। इसलिए फोन पर पूछ रहे थे कि सम-विषम के फेर में क्या सभी गाड़ियां बरात में जाएंगी। वह फोन सुन कर युवा उसे खबरनवीस समझ लिए और टीवी पर दिखने के लिए उसे घेर कर बोलने भी लगे।

ये स्वयंसेवी संगठन 

महिला आरक्षण के लिए तमाम मोर्चों पर लड़ाई लड़ने वाले स्वयंसेवी संगठन अब रस्म अदायगी के तौर पर इस मुद्दे को लेने लगे हैं। साल भर शांति से बैठने वाले इन संगठनों को जैसे ही छपने का कोई मौका चाहिए हो और संसद का सत्र चल रहा हो तो वे कुछ झंडे बैनर लेकर पहुंच जाते हैं। वे आरक्षण लागू करने की मांग करते प्रदर्शन करते हैं फि र शांति से बैठ जाते हैं। सरकार को भी लगता है कि अब वे अगले सत्र से पहले कुछ बोलने वाले हैं नहीं हैं फि र काहे की चिंता विधेयक ठंडे बस्ते में।

भीख मांगने वाले

दिल्ली में हर चौराहे पर भीख मांगते बच्चों को देख कर संवेदनशील लोगों का मन अजीब दुविधा में फं स जाता है। इसके लिए क्या ठीक है भीख देना या न देना यह सोचते एक खबरनवीस को देख एक महिला की दुविधा का खुलासा हुआ तो वह अपनी दलील के साथ आगे बढ़ गई कि खाने-पीने का सामान दे दें, पैसा नहीं।
-बेदिल

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