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दिल्ली मेरी दिल्लीः खींच लाई लालसा

यमुना किनारे आयोजित संस्कृति महोत्सव में इतने लोग कैसे जुटे होंगे और ये कौन लोग हैं? इस बारे में एकबुद्धिजीवी से पूछा तो उनका कहना था कि आध्यात्म मध्यवर्ग की जरूरत की चीज है।

Author नई दिल्ली | March 14, 2016 4:32 AM

यमुना किनारे आयोजित संस्कृति महोत्सव में इतने लोग कैसे जुटे होंगे और ये कौन लोग हैं? इस बारे में एकबुद्धिजीवी से पूछा तो उनका कहना था कि आध्यात्म मध्यवर्ग की जरूरत की चीज है। यह वर्ग मन से बहुत अस्थिर होता है क्योंकि इनको जीवन में बहुत कुछ पाने की लालसा होती है। इसलिए ये वर्ग श्री श्री जैसों से जुड़ा हुआ है। हर आध्यात्मिक आयोजन में ये जमकर पहुंचते हैं और कार्यक्रम की शोभा बढ़ाते हैं। अभी तक बुद्धिजीवी की पूरी बात समझ में नहीं आई थी, लेकिन जब कार्यक्रम के दो दिनों के अनुभवों को झकझोरा तो पाया कि मेट्रो स्टेशन के बाद कच्चे रास्ते पर चलकर मध्यवर्गीय लोग ही कार्यक्रम में शरीक होने जा रहे थे। इनको यह आयोजन रोजमर्रा के काम के बाद सुकून दे रहा था क्योंकि ये वर्ग ही बेमन नौकरियों में पीसा जाता है। ऐसे में इसकी आध्यात्मिक जरूरत ही इसको किसी का श्रोता बना देती है। नहीं तो किस रिक्शेवाले या कारपोरेट के पास समय है कि ऐसे आयोजनों में दर्शक बने।
अधूरा रहा सपना
आखिरकार रिटायरमेंट से चार महीने पहले वरिष्ठ आईएएस अधिकारी रमेश नेगी का दिल्ली तबादला हो ही गया। वे अरुणाचल प्रदेश के कार्यवाहक मुख्य सचिव थे। दिल्ली की सत्ता में दोबारा आने के बाद आप के नेताओं ने डीएम सपोलिया के रिटायर होने पर रमेश नेगी को मुख्य सचिव बनाने की मांग गृह मंत्रालय के सामने रखी थी। इसे इस आधार पर नहीं माना गया कि उनकी पदोन्नति केंद्रीय सचिव के पद पर नहीं हुई है। आप सरकार की दूसरी पसंद के नाते गोवा में तैनात केके शर्मा को दिल्ली का मुख्य सचिव बनाया गया। इतना ही नहीं, जिस वरिष्ठ अधिकारी को शर्मा की छुट्टी के दौरान कार्यवाहक मुख्य सचिव बनाने पर विवाद हुआ उन्हें गृह मंत्रालय ने नेगी को हटाकर अरुणाचल प्रदेश का मुख्य सचिव बना दिया। समस्या यह है कि केके शर्मा के रिटायर हुए बिना या उनसे कोई विवाद हुए बिना दूसरे को मुख्य सचिव बनाया नहीं जा सकता। नेगी अभी भी सुपर स्केल में नहीं आ पाए हैं, सालों कार्यवाहक मुख्य सचिव रहने के बाद चार महीने के लिए किसी विभाग का मुख्य सचिव बनना उनकी अवनति ही मानी जा रही है। अब आप की प्रशंसा का कुछ खामियाजा तो उन्हें भुगतना ही पड़ेगा।
जाने क्या होगा
दिसंबर में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के सबसे चहेते अधिकारी और उनके प्रमुख सचिव राजेंद्र कुमार के घर पर सीबीआई का छापा पड़ा। आप ने इसके खिलाफ आसमान सिर पर उठा लिया। इसमें कुछ गड़बड़ी तो मिली, लेकिन ज्यादा बड़ा मामला सामने नहीं आया। सीबीआई की किरकिरी होने लगी तो लगा कि अब राजेंद्र कुमार को मुक्ति मिलेगी, लेकिन फिर से दनादन कार्रवाई शुरू हो गई और अब सीबीआई की ओर से दावा किया जा रहा है कि जल्द ही अन्य मामलों का खुलासा होने वाला है। आगे पता नहीं क्या होगा, लेकिन राजेंद्र कुमार की परेशानी जरूर बढ़ जाएगी।
दावे की असलियत
नई दिल्ली नगर पालिका परिषद (एनडीएमसी) के मोबाइल ऐप के लोकार्पण में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और केंद्रीय शहरी विकास राज्यमंत्री बाबुल सुप्रीयो के हास-परिहास के बीच कई गंभीर बातें सामने आर्इं। जिस तरह से मुख्यमंत्री ने कहा कि बिना केंद्र सरकार के सहयोग से दिल्ली के विकास कार्य नहीं हो सकते। यह वास्तव में सही है। इसे अगर वे गंभीरता से समझ जाएं और केंद्र भी राजनीति से ऊपर उठकर सहयोग दे तभी दिल्ली के विकास की गाड़ी सही रफ्तार पकड़ सकती है। अन्यथा विकास केवल केंद्र के शासन वाले एनडीएमसी इलाके में ही दिखेगा। आप की सरकार चाहे जो दावा करे, लेकिन वास्तव में नई सरकार आने के बाद जिस रफ्तार से काम होना चाहिए था वह नहीं हो रहा है।
भेड़चाल से अलग
सफलता के पीछे बेतहाशा दौड़ने के बाद शांति व सुकून की तलाश में बाबाओं की शरण लेना, आधुनिक जीवन शैली का एक आम नमूना है। लेकिन जब वहां भी शांति न मिले तो क्या करें। हाल ही में दिल्ली में एक अध्यात्मिक गुरु द्वारा आयोजित विशाल सांस्कृतिक कार्यक्रम में ऐसा ही नजारा देखने को मिला। अव्यवस्था से परेशान एक महिला ने कहा, आए तो थे शांति की तलाश में, लेकिन बुरी तरह से परेशान होकर लौटना पड़ रहा है। यह सवाल करने पर कि एक अनुयायी होकर वह ऐसा कैसे कह सकती हैं, उनका जवाब था, भक्तिभाव रखती हूं, लेकिन अंधभक्ति नहीं। यह देख अच्छा लगा कि भेड़चाल से अलग और पेशे से डॉक्टर इस महिला ने तर्क और आस्था के बीच का संतुलन नहीं खोया था।
वन-वे हुआ फेल
आधी-अधूरी तैयारी के साथ शहर के दो मुख्य मार्गों को वन-वे करने का प्लान अब फेल साबित हो रहा है। वन-वे हुए दोनों रास्तों को जोड़ने वाले ज्यादातर वैकल्पिक रास्तों पर दुकानें, बस व ट्रक की पार्किंग होने और खुदाई का सिलसिला जारी होने के चलते मजबूरी में गलत दिशा में गाड़ी ले जाने वाले अब मनमानी पर उतर आए हैं। करीब डेढ़ महीने पहले पुलिस की सख्ती के साथ इन दोनों रास्तों पर वन वे की व्यवस्था लागू की गई थी, वह अब खत्म हो गई है। पुलिस भी सख्ती कर-करके थक चुकी है जिसके चलते हरौला और उद्योग मार्ग पर दोनों दिशाओं में न केवल रिक्शा बल्कि दोपहिया वाहन और कारें भी खुलेआम चलनी शुरू हो गई हैं।
लोकप्रियता की चाह
घर में नहीं दाने, अम्मा चली भुनाने, यह कहावत जेएनयू छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया को गोली मारने वाले को 11 लाख का इनाम देने की घोषणा करने वाले पूर्वांचल सेना के कथित अध्यक्ष पर सटीक बैठती है। जिसके खाते में 11 हजार भी न हों, वो 11 लाख देगा! किसी ने ठीक ही कहा कि यह मामला सिर्फ सस्ती लोकप्रियता हासिल करने का है। इसके लिए लोग कुछ भी कर सकते हैं।
पुलिस की दरियादिली
दिल्ली ट्रैफिक पुलिस कई बार मेहरबान सी हो जाती है। यह चर्चा दिल्ली-नोएडा बॉर्डर पर रात नौ बजे के बाद अक्सर सुनी जा सकती है। बता दें कि यह चर्चा उस बीच-बहस का हिस्सा है जब ट्रक वाले नो एंट्री खुलने से पहले ही दिल्ली की सड़कों पर दौड़ने लगते हैं। चुंगी पर जाम के अलावा नोएडा-दिल्ली रिंग रोड पर इन ट्रकों को नो एंट्री खुलने से पहले देखा जा सकता है। किसी ने कहा कि कई बार पुलिस ऐसे मामले में सगी ‘मित्र’ बन जाती है। ऐसे भी अंग्रेजी राज वाली पुलिसिया छवि बदलना भी तो नए पुलिसिंग सिस्टम का हिस्सा जो है!
-बेदिल

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